अर्जुन और चिड़िया की आँख
महान गुरु द्रोणाचार्य अपने युवा राजकुमारों की एक सीधी-सी परीक्षा लेते हैं। एक लकड़ी की चिड़िया पेड़ पर ऊँचे बैठी है। तीर चलाने से पहले वे हर एक से एक ही सवाल पूछते हैं। सिर्फ़ एक वही जवाब देता है जिसका उन्हें इंतज़ार है।
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- The Mahabharata
बहुत समय पहले, हस्तिनापुर के राज्य में, कुछ युवा राजकुमार वन में पढ़ने जाते थे।
वे एक सौ पाँच थे: राजा पांडु के पाँच पुत्र, जो पांडव कहलाते थे, और उनके सौ चचेरे भाई, कौरव। उनके गुरु थे द्रोणाचार्य, जो पूरे देश में धनुर्विद्या के सबसे बड़े आचार्य थे।
हर सुबह राजकुमार अभ्यास करते। वे निशानों पर तीर चलाते। वे तब तक धनुष खींचते जब तक उनकी बाँहें दुखने न लगतीं। कुछ ताक़तवर थे, कुछ फुर्तीले थे, और कुछ घमंडी थे। पर द्रोणाचार्य यह देखने की राह देख रहे थे कि उनमें से किसमें कुछ और ख़ास है।
पेड़ पर चिड़िया
एक दिन द्रोणाचार्य ने लकड़ी की एक छोटी-सी चिड़िया ली और उसे एक ऊँचे पेड़ की डाल पर बाँध दिया। वह इतनी अच्छी बनी थी कि नीचे से लगभग ज़िंदा लगती थी।
उन्होंने सभी राजकुमारों को पेड़ के नीचे इकट्ठा किया।
"अपने धनुष उठाओ," उन्होंने कहा। "तीर चढ़ाओ। चिड़िया के सिर पर निशाना साधो। पर जब तक मैं न कहूँ, तीर मत छोड़ना।"
राजकुमारों ने वैसा ही किया। एक सौ पाँच धनुष उठे। एक सौ पाँच तीर पेड़ की ओर तन गए।
"तुम्हें क्या दिख रहा है?"
द्रोणाचार्य पांडवों में सबसे बड़े, युधिष्ठिर की ओर मुड़े।
"युधिष्ठिर," उन्होंने कहा। "निशाना साधे रहो। अब बताओ, तुम्हें क्या दिख रहा है?"
युधिष्ठिर ने ध्यान से देखा। "गुरुदेव, मुझे चिड़िया दिख रही है," उन्होंने कहा। "वह पेड़ दिख रहा है जिस पर वह बैठी है। आप दिख रहे हैं, मेरे पास खड़े हुए, और मेरे भाई भी दिख रहे हैं।"
"धनुष नीचे करो," द्रोणाचार्य ने शांति से कहा। "एक ओर हट जाओ।"
युधिष्ठिर हैरान थे, पर उन्होंने आज्ञा मानी।
द्रोणाचार्य अगले राजकुमार की ओर मुड़े। "तुम्हें क्या दिख रहा है?"
"मुझे पेड़, डालियाँ, चिड़िया, आसमान दिख रहा है..."
"एक ओर हट जाओ।"
एक-एक करके द्रोणाचार्य ने सबसे यही सवाल पूछा। और एक-एक करके राजकुमारों ने उन्हें पत्तों और आसमान के बारे में, दूसरे राजकुमारों के बारे में, बादलों के बारे में, उड़ती चिड़ियों के बारे में, यहाँ तक कि ख़ुद गुरु के बारे में भी बताया। और एक-एक करके द्रोणाचार्य ने सबसे धनुष नीचे करने को कहा।
अर्जुन का जवाब
आख़िर में वे पांडव भाइयों में तीसरे, अर्जुन के पास आए।
अर्जुन बिल्कुल स्थिर खड़े थे। उनका धनुष खिंचा हुआ था। उनका तीर अडिग था। उनकी आँखें ज़रा भी नहीं हिल रही थीं।
"अर्जुन," द्रोणाचार्य ने कहा। "तुम्हें क्या दिख रहा है? क्या तुम्हें पेड़ दिख रहा है? क्या मैं दिख रहा हूँ? क्या तुम्हारे भाई दिख रहे हैं?"
"नहीं, गुरुदेव," अर्जुन ने कहा। "मुझे सिर्फ़ चिड़िया दिख रही है।"
"मुझे चिड़िया के बारे में बताओ।"
"मुझे पूरी चिड़िया नहीं दिख रही," अर्जुन ने धीरे से कहा। "मुझे सिर्फ़ उसका सिर दिख रहा है।"
द्रोणाचार्य के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
"चलाओ," उन्होंने कहा।
अर्जुन ने तीर छोड़ दिया। तीर हवा को चीरता हुआ गया और लकड़ी की चिड़िया के ठीक सिर में जा लगा, और चिड़िया डाल से नीचे गिर पड़ी।
राजकुमार देखते रह गए। द्रोणाचार्य ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें गले से लगा लिया। उसी पल वे जान गए कि यह शिष्य अपने युग का सबसे बड़ा धनुर्धर बनेगा।
दूसरों से क्या छूट गया
दूसरे राजकुमारों की आँखें भी अच्छी थीं। उनमें से कुछ अच्छे धनुर्धर भी थे। पर जब गुरु ने उनसे पूछा कि उन्हें क्या दिख रहा है, तो उनका मन हर जगह भटक रहा था: पेड़ पर, आसमान पर, एक-दूसरे पर।
अर्जुन का मन सिर्फ़ एक जगह था। वे यह नहीं सोच रहे थे कि कौन देख रहा है, या वे जीतेंगे या नहीं, या दूसरे क्या कहेंगे। बाक़ी सब धुंधला पड़ गया था, और सिर्फ़ लक्ष्य बचा था।
ऐसी एकाग्रता कोई जादू नहीं है। अर्जुन ने बरसों अभ्यास किया था, अक्सर तब, जब दूसरे सो रहे होते थे। कहा जाता है कि उन्होंने अँधेरे में तीर चलाना तक ख़ुद सीख लिया था। जब घड़ी आई, तो उनका मन जानता था कि क्या करना है।
इस कहानी के बारे में
महाभारत भारत के दो महाकाव्यों में से एक है, और लगभग एक लाख श्लोकों के साथ यह अब तक रची गई सबसे लंबी कविताओं में से एक है। परंपरा इसका श्रेय महर्षि वेदव्यास को देती है। द्रोणाचार्य की अपने शिष्यों की यह परीक्षा इसके पहले पर्व, आदि पर्व से है, और यह आज भी पूरे भारत में विद्यार्थियों को एकाग्रता की सीख के रूप में सुनाई जाती है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।