अर्जुन का संशय
एक महायुद्ध की सुबह, योद्धा अर्जुन मैदान के उस पार देखते हैं, दूसरी ओर अपने ही परिवार और गुरुओं को पाते हैं, और अपना धनुष नीचे रख देते हैं। इसके बाद उनके मित्र और सारथी कृष्ण ने उनसे जो कहा, वही भगवद्गीता बन गया।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Classic retold
- The Mahabharata (the Bhagavad Gita)
ध्यान दें: यह कहानी एक युद्ध की सुबह, रणभूमि पर घटती है। इसमें कोई लड़ाई नहीं है।
उत्तर भारत के एक चौड़े, समतल मैदान, कुरुक्षेत्र पर सूरज उग रहा था।
एक ओर पांडवों की सेना खड़ी थी। दूसरी ओर उनके चचेरे भाइयों, कौरवों की सेना खड़ी थी। हज़ारों-हज़ार सैनिक, घोड़े, रथ और हाथी मैदान के आर-पार एक-दूसरे के सामने थे। शंख बज रहे थे। नगाड़े गरज रहे थे। महायुद्ध शुरू होने ही वाला था।
सफ़ेद घोड़ों वाले एक रथ में पांडवों के सबसे बड़े धनुर्धर अर्जुन खड़े थे। लगाम थामे थे उनके सबसे प्रिय मित्र और मार्गदर्शक, कृष्ण।
"मुझे बीच में ले चलो"
"कृष्ण," अर्जुन ने कहा, "मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलो। मैं उन लोगों को देखना चाहता हूँ जिनसे मुझे लड़ना है।"
कृष्ण ने रथ आगे बढ़ाया और दोनों पक्षों के बीच खुली ज़मीन पर रोक दिया।
अर्जुन ने शत्रु सेना की ओर देखा। और उनका दिल ठंडा पड़ गया।
वहाँ भीष्म थे, उनके प्रिय पितामह, जो उन्हें बचपन से प्यार करते आए थे। वहाँ द्रोणाचार्य थे, उनके गुरु, जिन्होंने उन्हें धनुर्विद्या का सब कुछ सिखाया था। वहाँ उनके चचेरे भाई थे, चाचा थे, मित्र थे, उन परिवारों के पिता और पुत्र थे जिन्हें वे पूरी ज़िंदगी से जानते थे।
धनुष गिर पड़ता है
अर्जुन का मुँह सूख गया। उनके पैर काँपने लगे। उनका महान धनुष, गांडीव, उनके हाथ से फिसल गया।
"कृष्ण," उन्होंने कहा, "मुझसे यह नहीं होगा। जिन लोगों से मैं प्रेम करता हूँ, उनसे मैं कैसे लड़ूँ? अगर राज्य जीतने की क़ीमत अपने ही परिवार की जान हो, तो उस जीत में क्या सुख होगा? इससे तो अच्छा है कि वे मुझे हरा दें।"
और अर्जुन आँखों में आँसू भरे रथ में बैठ गए।
कृष्ण ने क्या कहा
कृष्ण ने अपने मित्र को बड़े स्नेह से देखा। फिर वे बोलने लगे, और उन्होंने जो कहा उसे पाठक दो हज़ार से भी ज़्यादा सालों से सहेजते आए हैं।
उन्होंने अर्जुन से कहा कि हर व्यक्ति के भीतर का असली स्वरूप, आत्मा, न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। शरीर बदलते हैं, जैसे हम अपने कपड़े बदलते हैं, पर आत्मा बनी रहती है। इसलिए जिस तरह अर्जुन शोक कर रहे थे, उस तरह शोक करने की ज़रूरत नहीं।
उन्होंने अर्जुन से कहा कि हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य होता है, दुनिया में उसका अपना काम। अर्जुन एक योद्धा थे, जो सही की रक्षा की शपथ ले चुके थे। डर या दुख के कारण उस कर्तव्य से भागना दया नहीं होती। वह बस हार मान लेना होता।
और फिर कृष्ण ने वह बात कही जिसके लिए गीता सबसे ज़्यादा जानी जाती है। तुम्हारा अधिकार अपना कर्म करने पर है, उन्होंने कहा, पर उसके फल पर तुम्हारा कोई दावा नहीं। सिर्फ़ इनाम के लिए काम मत करो। पर काम करना भी मत छोड़ो।
अपना कर्तव्य अच्छे से करो, कृष्ण ने कहा, और उसमें अपनी पूरी कोशिश लगा दो। फिर परिणाम को छोड़ दो। सफलता और असफलता, लाभ और हानि, सुख और दुख को एक ही स्थिर मन से देखो। जो ऐसा कर सकता है, वह हर तूफ़ान में शांत रहता है।
साफ़ मन
अर्जुन ने कृष्ण से बहुत से प्रश्न पूछे, और कृष्ण ने हर एक का उत्तर दिया। उन्होंने कर्तव्य और शांति के बारे में बात की, बेचैन मन को कैसे शांत करें इसके बारे में, एक अच्छा जीवन जीने का क्या अर्थ है इसके बारे में, और उस दिव्यता के बारे में जो सब चीज़ों में बसती है।
गीता बताती है कि एक पल ऐसा आया जब कृष्ण ने अर्जुन को अपना सच्चा, विराट रूप दिखाया: पूरा ब्रह्मांड, अपने सारे लोकों और सारे प्राणियों के साथ, उनके भीतर जगमगाता हुआ। अर्जुन अभिभूत हो गए, विनम्र हो गए, और वे समझ गए।
आख़िरकार अर्जुन के संशय दूर हो गए। उनका भ्रम ऐसे छँट गया, जैसे सूरज निकलने पर कोहरा।
"मेरे संशय दूर हो गए हैं," उन्होंने कृष्ण से कहा। "मैं वैसा ही करूँगा जैसा आप कहते हैं।"
उन्होंने अपना धनुष फिर से उठा लिया।
गीता आज भी क्यों महत्वपूर्ण है
भगवद्गीता सिर्फ़ 700 श्लोकों की है, विशाल महाभारत का एक छोटा-सा हिस्सा। पर यह दुनिया की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक बन गई है। महात्मा गांधी इसे अपने लिए माँ के समान बताते थे और कठिन समय में सांत्वना के लिए इसका सहारा लेते थे, और बहुत से वैज्ञानिकों, विचारकों और आम लोगों ने इसमें मार्गदर्शन पाया है।
इसकी मुख्य सीख ऐसी है जिसे कोई भी अपना सकता है: किसी विद्यार्थी की परीक्षा में, किसी कर्मचारी के काम में, किसी खिलाड़ी की दौड़ में या किसी माता-पिता के लंबे दिन में। अपनी पूरी कोशिश करो। फिर आगे जो होगा, उसके बारे में शांत रहो। बिना डर के काम करने का यही तरीक़ा है।
इस कहानी के बारे में
भगवद्गीता, "भगवान का गीत", महाभारत के छठे पर्व, भीष्म पर्व का हिस्सा है। यह कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर अर्जुन और कृष्ण के बीच संवाद के रूप में है। यह कहानी उसकी शुरुआत और उसकी कुछ सबसे जानी-मानी सीखों को ही सरल शब्दों में दोबारा सुनाती है। यह छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है, अनुवाद नहीं।