आनंद का वन
एक अमीर नौजवान वकील ने बारिश में कुष्ठ रोग से मरते एक आदमी को देखा, और वह डर गया। बाबा आमटे ने बाक़ी सारी ज़िंदगी उस डर को जीतने में लगा दी, और एक ऐसी बस्ती बसाई जहाँ दुनिया के ठुकराए हुए लोग इज़्ज़त से जी सकें।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- Biography
- 1910s–2000s
ध्यान दें: इस कहानी में गंभीर बीमारी और एक मृत्यु का ज़िक्र है।
ज़ोरों की बारिश हो रही थी, और नौजवान वकील जल्दी-जल्दी घर लौट रहा था।
सड़क किनारे, कीचड़ में, कुछ हिला। वह एक आदमी था। वह बारिश में पड़ा था, इतना कमज़ोर कि उठ न सके, उसका शरीर घावों से भरा था। उसकी उँगलियाँ लगभग गल चुकी थीं। बीमारी थी कुष्ठ रोग।
वकील रुक गया। बाद में उसने बताया कि उस पल उसने कुछ ऐसा महसूस किया जो ज़िंदगी में पहले कभी नहीं किया था। उसे डर लगा। वह तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गया।
उसका नाम था मुरलीधर देवीदास आमटे। दुनिया उन्हें बाबा आमटे के नाम से जानने वाली थी। और ख़ुद उनके कहे मुताबिक़, डर के उसी पल ने उनकी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
अमीर घर का बेटा
उनका जन्म दिसंबर 1914 में महाराष्ट्र के वर्धा ज़िले के हिंगणघाट में हुआ। उनका परिवार धनी ज़मींदार था। बचपन में शिकार के लिए उनकी अपनी बंदूक़ थी, और बाद में एक स्पोर्ट्स कार। उन्हें फ़िल्मों का शौक़ था और वे उनकी समीक्षाएँ लिखते थे।
उन्होंने क़ानून पढ़ा और वरोरा शहर में एक कामयाब वकील बन गए। पर उनका मन बेचैन रहता था। वे भारत की आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए, और 1942 में, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, उन्होंने गिरफ़्तार नेताओं का मुक़दमा लड़ा। उन्होंने कुछ समय सेवाग्राम में गांधीजी के आश्रम में बिताया। कहा जाता है कि गांधीजी ने उन्हें अभय साधक कहा था, यानी सत्य का निडर खोजी।
इसीलिए उस बरसाती सड़क पर लगे डर ने उन्हें भीतर तक बेचैन कर दिया। वे अंग्रेज़ों के सामने डटकर खड़े हुए थे। फिर एक बीमार, बेबस आदमी से उन्हें डर क्यों लगा?
लौटकर आना
उस आदमी का नाम था तुलशीराम। आमटे उसके पास लौटे। वे उसे छत के नीचे लाए, खाना खिलाया और उसकी देखभाल की, उसके घाव ख़ुद अपने हाथों से धोए। तुलशीराम ज़्यादा दिन नहीं जिए। पर आख़िर तक आते-आते आमटे का डर जा चुका था।
उन दिनों कुष्ठ रोगियों को उनके परिवार और गाँव निकाल बाहर करते थे। बहुत-से लोग मानते थे कि यह बीमारी कोई श्राप है और एक बार छू लेने से भी लग सकती है। मरीज़ आख़िरकार सड़क किनारे भीख माँगते, न दवा, न घर।
आमटे ने अपनी ज़िंदगी उन्हीं के नाम करने का फ़ैसला किया। वे कुष्ठ रोग का इलाज सीखने कलकत्ता गए। शोध में मदद के लिए, यह देखने के एक प्रयोग में कि क्या यह बीमारी एक से दूसरे में जा सकती है, उन्होंने एक मरीज़ के बैक्टीरिया का इंजेक्शन तक अपने शरीर में लगवाया।
उनकी पत्नी साधना हर क़दम पर उनके साथ रहीं। वे भी सुख-सुविधा में पैदा हुई थीं, और उन्होंने अपने पति के साथ यह ज़िंदगी चुनी।
आनंद का वन
1951 में, वरोरा के पास पथरीली, किसी के काम न आने वाली ज़मीन के एक टुकड़े पर, आमटे परिवार ने शुरुआत की। उनके साथ थे उनके दो छोटे बेटे, कुष्ठ रोग से पीड़ित छह मरीज़, एक लँगड़ी गाय और बहुत थोड़ा-सा पैसा। ज़मीन झाड़-झंखाड़, साँपों और बिच्छुओं से भरी थी। उन्होंने अपने हाथों से कुएँ खोदे।
उन्होंने उस जगह का नाम रखा आनंदवन, यानी आनंद का वन।
शुरू से ही बाबा आमटे दान-ख़ैरात नहीं चाहते थे। वे चाहते थे कि मरीज़ काम करें, खेती करें, निर्माण करें और कमाएँ, ताकि वे सिर उठाकर जी सकें। उनकी एक अक्सर दोहराई जाने वाली बात आनंदवन का मूलमंत्र बन गई: काम बनाता है, ख़ैरात बिगाड़ती है।
मरीज़ों ने ज़मीन साफ़ की और फ़सलें उगाईं। उन्होंने घर, कारख़ाने और एक अस्पताल बनाया। जैसे-जैसे दवाइयाँ बेहतर हुईं और कुष्ठ रोग का इलाज मुमकिन हुआ, आनंदवन बढ़ता गया। बरसों में यह एक पूरी बस्ती बन गया, हज़ारों लोगों का घर: कुष्ठ रोग से ठीक हुए लोग, नेत्रहीन, बधिर या विकलांग लोग, और उनके परिवार। वहाँ खेत थे, स्कूल थे, कॉलेज थे और उसका अपना एक ऑर्केस्ट्रा भी।
आगे बढ़ते क़दम
बाबा आमटे आनंदवन पर नहीं रुके। 1973 में परिवार ने गढ़चिरोली के घने जंगलों में हेमलकसा में माडिया गोंड आदिवासियों के लिए एक प्रकल्प शुरू किया, जिनके पास न कोई डॉक्टर था, न स्कूल। उनके बेटे प्रकाश और प्रकाश की पत्नी मंदाकिनी, दोनों डॉक्टर, वहाँ रहने और काम करने चले गए। उनके बड़े बेटे विकास और विकास की पत्नी भारती ने आनंदवन सँभाला।
1980 के दशक में, सत्तर पार की उम्र में और रीढ़ की एक चोट के दर्द के बावजूद, जिसकी वजह से बैठना भी बहुत मुश्किल था, उन्होंने नौजवानों की लंबी साइकिल यात्राओं की अगुवाई की, कन्याकुमारी से कश्मीर तक और पूर्वोत्तर से गुजरात तक। इन यात्राओं का नाम था भारत जोड़ो, ताकि देश को जोड़ा जा सके। बाद में वे नर्मदा नदी के किनारे रहने चले गए, ताकि उन गाँववालों का साथ दे सकें जिनके घर बड़े बाँधों में डूबने वाले थे। वे वहाँ बरसों रहे।
उन्हें बहुत-से सम्मान मिले, जिनमें 1985 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, 1986 में पद्म विभूषण, 1990 में टेम्पलटन पुरस्कार और 1999 में गांधी शांति पुरस्कार शामिल हैं। पुरस्कार की रक़म उन्होंने अपने काम में लगा दी।
डर का अंत
बाबा आमटे का निधन फ़रवरी 2008 में आनंदवन में हुआ, तिरानवे बरस की उम्र में। उन्हें वहीं दफ़नाया गया, उन लोगों के बीच जिनके साथ उन्होंने ज़िंदगी गुज़ारी थी।
वे अक्सर कहते थे कि उन्होंने अपना काम दूसरों की मदद के लिए नहीं, बल्कि अपने डर को जीतने के लिए शुरू किया था। वह डर बस एक पल का था। उससे जो आनंद का वन उपजा, वह आज भी बढ़ रहा है।
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रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फ़ाउंडेशन और टेम्पलटन पुरस्कार, दोनों उनकी जीवनी प्रकाशित करते हैं। आनंदवन चलाने वाली संस्था, महारोगी सेवा समिति, अपनी वेबसाइट पर अपना इतिहास साझा करती है। उनके बेटे प्रकाश आमटे की मराठी आत्मकथा प्रकाशवाटा हेमलकसा की कहानी कहती है।