भीष्म की प्रतिज्ञा
एक युवा राजकुमार देखता है कि उसके पिता चुप और उदास रहने लगे हैं, और चुपचाप इसका कारण पता करता है। पिता को उनकी चाही हुई ख़ुशी देने के लिए राजकुमार एक ऐसी प्रतिज्ञा करता है जो इतनी बड़ी है कि देवता भी पुकार उठते हैं। वह उसे जीवन भर निभाता है।
- 3 मिनट की कहानी
- Ages 9+
- Classic retold
- The Mahabharata
यमुना नदी के किनारे, एक बूढ़े मछुआरे ने अपने सामने खड़े युवा राजकुमार को देखा और सिर हिलाया।
"तुम भले आदमी हो," उसने कहा। "पर एक दिन तुम्हारे भी बेटे होंगे। और तुम्हारे बेटे मेरी बेटी के बेटों से सिंहासन छीन सकते हैं।"
राजकुमार एक पल चुप रहा। फिर उसने अपना हाथ उठाया और एक ऐसी प्रतिज्ञा की जिसने पूरे महाभारत की दिशा तय कर दी।
नदी का बेटा
राजकुमार का नाम देवव्रत था। वह हस्तिनापुर के राजा शांतनु और नदी की देवी गंगा का पुत्र था। गंगा बहुत पहले राजा को छोड़कर चली गई थीं, पर उन्होंने अपने बेटे को ख़ुद पाला था और फिर उसे उसके पिता को लौटा दिया था, बड़ा, विद्वान और वीर।
शांतनु की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने देवव्रत को युवराज बनाया, और प्रजा उसे प्यार करने लगी। चार साल तक पिता और पुत्र साथ-साथ ख़ुशी से रहे।
राजा का रहस्य
एक दिन राजा शांतनु यमुना के किनारे घूम रहे थे, जब उन्हें हवा में एक मीठी सुगंध महसूस हुई। उसके पीछे-पीछे चलते हुए वे एक बहुत सुंदर युवती के पास पहुँचे, जो अपनी नाव में यात्रियों को नदी पार कराती थी। उसका नाम सत्यवती था, और वह मछुआरों के मुखिया की बेटी थी।
राजा को उसी पल उससे प्रेम हो गया, और वे उसके पिता के पास उसका हाथ माँगने गए।
मछुआरों का मुखिया राज़ी हो गया, पर एक शर्त पर। सत्यवती से जो बेटा पैदा होगा, वही शांतनु के बाद राजा बनेगा।
शांतनु यह नहीं मान सके। उनका एक बेटा पहले से था, युवराज, जिसे वे प्यार करते थे और जिसने कोई ग़लती नहीं की थी। इसलिए वे बिना कुछ कहे घर लौट आए।
पर वे सत्यवती को भूल नहीं सके। वे दुबले और चुप होते गए, और अकेले बैठे विचारों में खोए रहते।
देवव्रत को पता चलता है
देवव्रत ने देखा कि उनके पिता दुखी हैं। उन्होंने कारण पूछा, पर राजा ने कुछ नहीं बताया। तो राजकुमार एक बूढ़े मंत्री के पास गए जो राजा के साथ रहा था, और मंत्री ने उन्हें सच बता दिया।
देवव्रत ने एक पल भी नहीं सोचा। उन्होंने दरबार के कुछ बुज़ुर्ग योद्धाओं को साथ लिया और सीधे नदी किनारे मछुआरे के घर पहुँच गए।
वहाँ उन्होंने अपने पिता की ओर से सत्यवती का हाथ माँगा। और उन्होंने पहली प्रतिज्ञा की। सत्यवती से जन्मा बेटा ही राजा बनेगा। उन्होंने, देवव्रत ने, सिंहासन पर अपना अधिकार छोड़ दिया।
एक अंतहीन वचन
मछुआरों का मुखिया प्रभावित हुआ, पर अब भी चिंतित था। उसने कहा कि देवव्रत का वचन सिर्फ़ देवव्रत के लिए है। एक दिन देवव्रत के अपने बच्चों का क्या होगा? वे ताक़तवर हो सकते हैं, और सिंहासन चाह सकते हैं।
तो देवव्रत ने वहाँ मौजूद सबके सामने दूसरी प्रतिज्ञा की। वे कभी विवाह नहीं करेंगे। जब तक जिएँगे, उनकी कोई संतान नहीं होगी।
कथा कहती है कि उसी पल आकाश से फूल बरसे, और देवताओं और ऋषियों ने उन्हें एक नया नाम देकर पुकारा: भीष्म। इसका अर्थ है "भीषण प्रतिज्ञा वाला", क्योंकि वह वचन इतना कठिन था।
फिर देवव्रत सत्यवती की ओर मुड़े और आदर के साथ उन्हें अपने पिता के पास चलने का निमंत्रण दिया।
पिता का उपहार
जब राजा शांतनु को पता चला कि उनके बेटे ने उनके लिए क्या कुछ त्याग दिया है, तो उनका मन भर आया। आशीर्वाद के रूप में उन्होंने भीष्म को एक दुर्लभ वरदान दिया: मृत्यु उनके पास तब तक नहीं आएगी जब तक वे स्वयं उसे आने न दें।
शांतनु ने सत्यवती से विवाह किया, और उनके बेटे हुए। भीष्म ने राज्य के संरक्षक बनकर उनकी सेवा की, और बाद में उनके बच्चों और पोतों की भी।
उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा कभी नहीं तोड़ी। न तब, जब सिंहासन ख़ाली पड़ा था, और न तब, जब बरसों बाद स्वयं सत्यवती ने परिवार की भलाई के लिए उनसे इसे छोड़ने को कहा। वे नहीं माने।
एक लंबी छाया
इस प्रतिज्ञा ने भीष्म को हस्तिनापुर का सबसे सम्मानित व्यक्ति बना दिया। पर इसने उन्हें अपने लंबे जीवन के अंत तक सिंहासन से बाँधे भी रखा। जब कौरवों और पांडवों के बीच बड़ा झगड़ा हुआ, तो वे पांडव भाइयों से गहरा प्रेम करते थे, फिर भी वे उसी दरबार के साथ खड़े रहे जिसकी सेवा की उन्होंने शपथ ली थी।
इसीलिए लोग उनकी कहानी को दो तरह से याद करते हैं। कुछ लोग एक ऐसा बेटा देखते हैं जिसने पिता के प्रेम में सब कुछ त्याग दिया। दूसरे देखते हैं कि एक बड़ा वचन कैसे पीढ़ियों तक किसी के हाथ बाँध सकता है। दोनों बातें सच हैं, और इसीलिए यह कहानी आज भी सुनाई जाती है।
इस कहानी के बारे में
यह कहानी महाभारत के आदि पर्व से है। आज भी भारत में "भीष्म प्रतिज्ञा", यानी भीष्म जैसा वचन, ऐसे वादे को कहते हैं जिसे इंसान हर क़ीमत पर निभाता है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।