बीरबल की खिचड़ी
बादशाह अकबर से इनाम पाने के लिए एक ग़रीब आदमी पूरी रात बर्फ़ीली झील में खड़ा रहता है। पर दरबार कहता है कि दूर जलते एक दीये ने उसे गरमी दी, और उसे कुछ नहीं मिलता। फिर बीरबल अपनी खिचड़ी पकाने बैठते हैं।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 6–10
- Fable & folk tale
- Mughal India, 16th century
आगरा में किसी को इतनी ठंडी सर्दी याद नहीं थी।
पहाड़ियों से ठंडी हवा उतर रही थी। सुबह-सुबह महल के बाग़ों पर पाला चमकता था। और शहर के बाहर की झील का पानी इतना ठंडा था कि उसे छूने भर से उँगलियाँ दुखने लगती थीं।
बादशाह की चुनौती
एक सुबह बादशाह अकबर ने झील में हाथ डुबोया, और झट से बाहर खींच लिया।
"बाप रे!" उन्होंने कहा। "मुझे नहीं लगता कोई आदमी पूरी रात उस पानी में खड़ा रह सकता है।"
फिर उन्हें एक विचार आया। वे अपने दरबारियों की ओर मुड़े।
"मैं एक हज़ार सोने के सिक्कों का इनाम दूँगा," उन्होंने ऐलान किया, "उसे, जो सूरज ढलने से सूरज उगने तक इस झील में गर्दन तक डूबा खड़ा रह सके।"
दरबारी काँप उठे और सिर हिला दिया। कोई कोशिश नहीं करना चाहता था।
पर कुछ दिन बाद, एक ग़रीब धोबी महल में आया। उसका नाम गंगू था। उसका परिवार भूखा था, और उसके कपड़े पतले और पैबंद लगे थे।
"जहाँपनाह," उसने कहा, "मैं करूँगा।"
एक लंबी, ठंडी रात
उस शाम, जैसे ही सूरज ढला, गंगू बर्फ़ीली झील में तब तक चलता गया जब तक पानी उसकी गर्दन तक नहीं आ गया। सिपाही किनारे पर खड़े उस पर नज़र रखते रहे।
रात लंबी, अँधेरी और जमा देने वाली थी। गंगू के दाँत किटकिटा रहे थे। उसका बदन काँप रहा था। पर दूर, महल की एक मीनार की खिड़की में एक छोटा-सा दीया जल रहा था। गंगू ने अपनी आँखें उस नन्ही रोशनी पर टिका दीं, अपने बच्चों के बारे में सोचा, और हिम्मत नहीं हारी।
जब सूरज उगा, तब भी वह वहीं खड़ा था।
सिपाहियों ने उसे बाहर निकलने में मदद की, कंबल में लपेटा, और बादशाह के सामने ले आए।
"उस दीये ने तुम्हें गरमी दी"
"शाबाश!" अकबर ने कहा। "पर बताओ, तुमने यह कैसे कर दिखाया?"
"जहाँपनाह, मैं मीनार के उस दीये को देखता रहा," गंगू ने कहा। "उसी ने मुझे रात काटने में मदद की।"
एक दरबारी, जो जलने वाला और ओछा था, आगे बढ़ा।
"दीया!" उसने कहा। "तो इसे दीये से गरमी मिली, जहाँपनाह! यह सच में पूरी रात ठंड में खड़ा ही नहीं रहा। यह इनाम का हक़दार नहीं।"
अकबर ने भौंहें सिकोड़ीं। फिर, सबको हैरान करते हुए, उन्होंने सिर हिला दिया। "शायद यह सच है," उन्होंने कहा। "कोई इनाम नहीं।"
बेचारा गंगू ख़ाली हाथ महल से बाहर चला गया।
बादशाह के सबसे समझदार मंत्री बीरबल यह सब सुन रहे थे। उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। पर उस शाम वे दरबार नहीं आए।
बीरबल की खिचड़ी
अगले दिन भी बीरबल दरबार नहीं आए। उसके अगले दिन भी नहीं।
आख़िरकार अकबर ने एक हरकारे को वजह पता करने भेजा।
"बीरबल कहते हैं कि वे नहीं आ सकते," हरकारे ने बताया, "क्योंकि वे अपनी खिचड़ी पका रहे हैं। जैसे ही वह तैयार होगी, वे आ जाएँगे।"
उसके अगले दिन भी वही जवाब आया। "उनकी खिचड़ी अभी तैयार नहीं हुई।"
अकबर हैरान थे। खिचड़ी पकने में तो थोड़ी ही देर लगती है! तो वे अपने सारे दरबारियों के साथ ख़ुद बीरबल के घर गए।
उन्होंने बीरबल को बाग़ में बैठा पाया। एक ऊँचे पेड़ की डालियों में, बहुत ऊपर, चावल और दाल से भरी मिट्टी की एक हाँडी लटक रही थी। और बहुत नीचे, ज़मीन पर, एक नन्ही-सी आग जल रही थी।
"बीरबल!" अकबर हँस पड़े। "क्या तुम पागल हो गए हो? वह आग तो बहुत ज़्यादा दूर है। तुम्हारी खिचड़ी ऐसे कभी नहीं पकेगी!"
बीरबल उठे और झुककर सलाम किया।
"जहाँपनाह," उन्होंने नरमी से कहा, "अगर महल की मीनार में दूर जलता एक दीया बर्फ़ीली झील में खड़े आदमी को गरमी दे सकता है, तो यह आग भी ज़रूर मेरी खिचड़ी पका सकती है।"
बादशाह समझ गए
अकबर की हँसी रुक गई। एक पल के लिए वे कुछ नहीं बोले।
फिर वे थोड़ा झेंपते हुए मुस्कुराए।
"तुम ठीक कहते हो, बीरबल," उन्होंने कहा। "मैं ग़लत था। वह बेचारा आदमी पूरी रात ठंड में खड़ा रहा, और उस दीये ने उसे उम्मीद के सिवा कुछ नहीं दिया।"
उसी दिन गंगू को महल में वापस बुलाया गया। बादशाह ने उसे वे हज़ार सोने के सिक्के दिए जो उसने कमाए थे, और देरी के लिए माफ़ी माँगी।
और बीरबल? उन्होंने अपनी हाँडी पेड़ से उतारी, और आग पर ठीक से अपनी खिचड़ी पकाई। और उसे बादशाह के साथ बाँटकर खाया।
इस कहानी के बारे में
बादशाह अकबर और उनके हाज़िरजवाब मंत्री बीरबल की कहानियाँ भारत की सबसे प्यारी लोककथाओं में से हैं। अकबर और बीरबल असली लोग थे जो 1500 के दशक में रहते थे, पर ये मज़ेदार कहानियाँ क़िस्सागोओं ने गढ़ीं और आगे बढ़ाईं, और ये कई अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती हैं। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।