कौओं की गिनती
बादशाह अकबर अपने दरबार से एक ऐसा सवाल पूछते हैं जिसका जवाब कोई दे ही नहीं सकता। शहर में कितने कौए रहते हैं? बीरबल तुरंत जवाब दे देते हैं।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 5–9
- Fable & folk tale
- Mughal India, 16th century
महल का बग़ीचा कौओं से भरा था।
वे दीवारों पर क़तार में बैठे थे। वे घास के मैदानों पर फुदक रहे थे। वे आम के पेड़ों पर झगड़ रहे थे और फ़व्वारों के किनारे ऐसे अकड़कर चल रहे थे, जैसे यह जगह उन्हीं की हो। जब भी कोई सेवक खाने की थाली लेकर निकलता, दर्जन भर काले सिर उसे देखने के लिए घूम जाते।
उस सुबह बादशाह अकबर अपने दरबारियों के साथ बग़ीचे में टहल रहे थे, और उनका मन खेलने का था।
"काँव!" एक कौए ने ठीक उनके सिर के ऊपर कहा।
"तुम भी काँव," बादशाह ने कहा। फिर वे रुक गए, और उनकी आँखों में एक चमक आ गई।
एक बहुत कठिन सवाल
वे अपने पीछे चल रहे दरबारियों की ओर मुड़े।
"बताओ," उन्होंने कहा। "हमारे शहर में कितने कौए हैं?"
दरबारियों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
"कितने कौए, जहाँपनाह?" एक ने कहा।
"कितने कौए," अकबर ने कहा। "ठीक-ठीक कितने। मुझे एक संख्या चाहिए।"
दरबारियों ने पेड़ों की ओर देखा। उन्होंने दीवारों की ओर देखा। उन्होंने आसमान की ओर देखा, जहाँ और भी कौए छतों के ऊपर चक्कर काट रहे थे और काँव-काँव कर रहे थे।
उनमें से एक उँगलियों पर गिनने लगा। "एक, दो, तीन, चार... अरे, वह तो उड़ गया। एक, दो..."
दूसरे ने कहा, "जहाँपनाह, सबको गिनने में सौ आदमियों को सौ दिन लग जाएँगे।"
तीसरे ने कहा, "जहाँपनाह, कौए गिनवाने के लिए चुपचाप बैठते थोड़े ही हैं!"
अकबर हाथ बाँधकर इंतज़ार करते रहे। कोई उन्हें संख्या नहीं बता सका।
बीरबल आते हैं
तभी बीरबल बग़ीचे के रास्ते पर चलते हुए आए।
बीरबल बादशाह के मंत्री और उनके अच्छे दोस्त थे। वे अपनी हाज़िरजवाबी और नेक दिल के लिए पूरे राज्य में मशहूर थे, और उन्हें मात देना बहुत मुश्किल था।
"आह, बीरबल!" अकबर ने कहा। "शायद तुम हमारी मदद कर सको। मेरे दरबारी मुझे नहीं बता पा रहे कि हमारे शहर में कितने कौए रहते हैं। क्या तुम बता सकते हो?"
बीरबल ने पेड़ों की ओर नज़र उठाकर देखा तक नहीं।
"ज़रूर, जहाँपनाह," उन्होंने अदब से कहा। "शहर में पंचानबे हज़ार चार सौ तिरसठ कौए हैं।"
दरबारी हक्के-बक्के रह गए। बादशाह की भौंहें ऊपर चढ़ गईं।
"पंचानबे हज़ार चार सौ तिरसठ?" अकबर ने कहा। "ठीक इतने ही?"
"ठीक इतने ही, जहाँपनाह।"
अगर तुम ग़लत निकले तो?
अकबर एक चालाक-सी मुस्कान मुस्कुराए। उन्हें लगा कि आख़िरकार उन्होंने अपने दोस्त को पकड़ लिया है।
"और अगर मैं अपने आदमियों को गिनने भेजूँ," उन्होंने कहा, "और उन्हें इससे ज़्यादा कौए मिलें तो?"
"तो जहाँपनाह," बीरबल ने कहा, "इसका मतलब है कि दूसरे शहरों के कुछ कौए यहाँ अपने रिश्तेदारों से मिलने आए हैं।"
दरबारी मुँह पर हाथ रखकर खी-खी करने लगे।
"अच्छा," अकबर ने कहा। "और अगर मेरे आदमियों को इससे कम कौए मिलें तो?"
बीरबल ने सिर झुकाया। "तो जहाँपनाह, इसका मतलब है कि हमारे कुछ कौए दूसरे शहरों में अपने रिश्तेदारों से मिलने गए हैं।"
एक पल के लिए बग़ीचे में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
फिर बादशाह अकबर ने सिर पीछे करके ठहाका लगाया। वे इतनी ज़ोर से हँसे कि दीवार पर बैठे सारे कौए एक साथ घबराकर काँव-काँव करते हुए हवा में उड़ गए, और दरबारी भी उनके साथ इतना हँसे कि उन्हें अपनी आँखें पोंछनी पड़ीं।
"बीरबल," बादशाह ने अब भी हँसते हुए कहा, "तुमने एक ऐसे सवाल का जवाब दे दिया जिसका कोई जवाब ही नहीं है, और तुम्हें ग़लत साबित करना भी नामुमकिन बना दिया!"
यह जवाब अच्छा क्यों था
उस दिन बाद में, एक नौजवान दरबारी बीरबल को ढूँढ़ता हुआ आया।
"हुज़ूर," उसने कहा, "मेरी समझ में नहीं आया। आप सच में तो नहीं जान सकते कि कितने कौए हैं। क्या आपने वह संख्या यूँ ही गढ़ दी?"
बीरबल मुस्कुराए। "बेशक गढ़ दी," उन्होंने कहा। "शहर के हर कौए को कोई नहीं गिन सकता। कौए ख़ुद इतनी देर टिककर बैठते ही नहीं।"
"तो आपने यही क्यों नहीं कह दिया?"
"क्योंकि बादशाह असल में कौओं के बारे में नहीं पूछ रहे थे," बीरबल ने कहा। "वे हमारे साथ एक खेल खेल रहे थे, यह देखने के लिए कि जब कोई आसान जवाब न हो, तो कौन जल्दी और ख़ुशमिज़ाजी से सोच पाता है। तुममें से कुछ लोग परेशान हो गए। कुछ गिनने लगे। मैंने उनके साथ खेल खेलने का फ़ैसला किया।"
उन्होंने ऊपर कौओं की ओर देखा, जो फिर से दीवार पर ऐसे आ बैठे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"जब कोई तुमसे ऐसा सवाल पूछे जिसका जवाब नहीं दिया जा सकता," उन्होंने कहा, "तो अक्सर उसे नाराज़ करने से बेहतर है उसे मुस्कुरा देना। और हमेशा बेहतर है कि रुककर सोचो कि वह असल में जानना क्या चाहता है।"
नौजवान दरबारी देर तक इस बारे में सोचता रहा। फिर उसने दीवार की ओर देखा।
"पंचानबे हज़ार चार सौ तिरसठ," उसने कहा, "और मेहमान अलग से।"
और बीरबल हँस पड़े।
इस कहानी के बारे में
अकबर 1556 से 1605 तक भारत के मुग़ल बादशाह थे, और बीरबल उनके भरोसेमंद दरबारियों में से एक थे। वे असली लोग थे, लेकिन उनके बारे में सैकड़ों चतुराई भरी कहानियाँ लोककथाएँ हैं, जो सदियों से पूरे भारत में परिवारों में सुनी-सुनाई जाती रही हैं। हर कहने वाले के साथ ब्योरे बदल जाते हैं, और कौओं की संख्या भी लगभग हर रूप में अलग होती है। यह कहानी का एक छोटा और सरल किया हुआ रूप है।