फिर से नाच
सोलह साल की उम्र में सुधा चंद्रन एक उभरती हुई शास्त्रीय नृत्यांगना थीं। फिर एक सड़क हादसे ने उनका पैर छीन लिया। सबने मान लिया कि उनके नाचने के दिन ख़त्म हो गए। उन्होंने नहीं माना।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- Biography
- 1960s–1980s
ध्यान दें: इस कहानी में एक सड़क हादसे, गंभीर चोट और एक पैर खोने का ज़िक्र है।
उसके टख़नों पर बँधे घुँघरू हर क़दम पर छनकते थे। मृदंग ताल दे रहा था, और मंच पर नाचती लड़की अपने हाथों, आँखों और पैरों को एक साथ चलाते हुए, बिना एक भी शब्द बोले, एक कहानी सुना रही थी।
यह भरतनाट्यम था, भारत के सबसे पुराने शास्त्रीय नृत्यों में से एक। और इसे नाचने वाली लड़की, सुधा चंद्रन, बहुत छोटी उम्र से इसे सीख रही थी।
नाच उसके लिए शौक़ नहीं था। वह उसकी ज़िंदगी का केंद्र था।
शुरू से ही नृत्यांगना
सुधा बंबई में, जो अब मुंबई है, एक ऐसे परिवार में पलीं जिसकी जड़ें तमिलनाडु में थीं। उनके माता-पिता ने जल्दी ही ताल के लिए उनका लगाव पहचान लिया और उनके लिए एक नृत्य-गुरु ढूँढ़ा। भरतनाट्यम सीखने में बरसों का धीरज भरा अभ्यास लगता है। पैरों की चाल तेज़ और सटीक होती है, मुद्राएँ नीचे झुककर मज़बूती से साधी जाती हैं, और हाथों के हर इशारे का एक अर्थ होता है।
सुधा घंटों अभ्यास करतीं। पढ़ाई के साथ-साथ वे मंच पर प्रस्तुति देने लगीं, और किशोर उम्र तक वे कई कार्यक्रम दे चुकी थीं। जिन्होंने उन्हें नाचते देखा, वे कहते थे कि एक नृत्यांगना के रूप में उनका भविष्य सचमुच उज्ज्वल है।
हादसा
1981 में, जब सुधा सोलह साल की थीं, वे अपने परिवार के साथ तमिलनाडु में सफ़र कर रही थीं। जिस बस में वे थे, उसका एक्सीडेंट हो गया।
सुधा बच गईं, लेकिन उनके दाएँ पैर में गहरी चोट आई। पहले लगा कि घाव ऐसा नहीं है जो ज़िंदगी बदल दे। लेकिन उसमें गंभीर संक्रमण फैल गया, और गैंग्रीन हो गया। उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों को घुटने के नीचे से उनका दायाँ पैर काटना पड़ा।
वे सोलह साल की थीं, और उन्होंने लगभग पूरी ज़िंदगी नाचना सीखने में लगाई थी। अब लगता था कि सब ख़त्म हो गया। मिलने आने वाले लोग प्यार से पेश आते, लेकिन उनमें से ज़्यादातर एक ही बात सोचते थे। उन्हें अपनी ज़िंदगी में कुछ और करने का रास्ता ढूँढ़ना होगा।
जयपुर फ़ुट
ठीक होते समय सुधा ने राजस्थान के जयपुर के एक डॉक्टर, डॉ. पी. के. सेठी, के बारे में पढ़ा। उन्होंने एक नक़ली पैर बनाने में मदद की थी, जिसे जयपुर फ़ुट कहा जाता है। वह सस्ता, हल्का और लचीला था। उस ज़माने के कई नक़ली अंगों से अलग, उसके साथ लोग उकड़ूँ बैठ सकते थे, पालथी मारकर बैठ सकते थे और नंगे पैर चल सकते थे, जैसा भारत में लोग अक्सर करते हैं।
सुधा जयपुर गईं। डॉ. सेठी ने उन्हें नया पैर लगाया।
उस पर चलना सीखना ही काफ़ी मुश्किल था। उस पर नाचना सीखना तो बिल्कुल अलग बात थी। भरतनाट्यम नंगे पैर नाचा जाता है, घुटनों को गहराई तक मोड़कर और पैरों को ज़मीन पर ज़ोर से थपथपाकर। अब हर थाप का मतलब था दर्द, वहाँ जहाँ नक़ली पैर उनके अपने पैर से जुड़ता था। उन्होंने इंटरव्यू में बताया है कि कई बार अभ्यास के दौरान उनके पैर से ख़ून बहने लगता था।
फिर भी वे अभ्यास करती रहीं। उन्होंने लगभग शुरुआत से फिर सीखना शुरू किया, जैसे वे कोई नई छोटी छात्रा हों। उन्होंने सीखा कि संतुलन कैसे बनाएँ, कैसे पैर टिकाएँ, और उस पैर पर भरोसा कैसे करें जिसे वे महसूस नहीं कर सकती थीं।
फिर से मंच पर
1980 के दशक की शुरुआत में, हादसे के कुछ साल बाद, सुधा चंद्रन बंबई में एक मंच पर पूरा भरतनाट्यम कार्यक्रम पेश करने उतरीं।
दर्शक उनकी कहानी जानते थे। बहुत-से लोग यह सोचते हुए आए थे कि क्या वे सचमुच ऐसा कर पाएँगी। कुछ शायद तरस खाकर आए थे, या बस जिज्ञासा से। उन्होंने पूरा कार्यक्रम नाचा, उसी तेज़ पद-चाल और उन्हीं गहरी, मज़बूत मुद्राओं के साथ, जिन्हें सीखने में उन्होंने अपना बचपन लगाया था। जब कार्यक्रम ख़त्म हुआ, तो पूरा हॉल उनके सम्मान में खड़ा हो गया।
अख़बारों ने उनकी कहानी पूरे भारत में पहुँचाई। जिस लड़की से कहा गया था कि उसके नाचने के दिन ख़त्म हो गए, वह फिर से नाच रही थी, मंच पर, सैकड़ों लोगों के सामने।
मयूरी
उनकी कहानी फ़िल्मी दुनिया तक पहुँची। 1985 में मयूरी नाम की एक तेलुगु फ़िल्म ने उनकी ज़िंदगी की कहानी सुनाई, और सुधा ने उसमें ख़ुद अपनी भूमिका निभाई। उन्हें हादसे, अस्पताल और फिर से नाचने के लंबे संघर्ष का अभिनय करना पड़ा, यानी कैमरे के सामने अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन साल दोबारा जीने पड़े।
फ़िल्म बहुत सफल हुई और जल्द ही हिंदी में दोबारा बनाई गई। अपने अभिनय के लिए सुधा को भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में एक विशेष पुरस्कार मिला।
यहीं से फ़िल्मों और टेलीविज़न में एक अभिनेत्री के रूप में उनका लंबा करियर शुरू हुआ, जो दशकों तक चला। लेकिन उन्होंने ख़ुद को नृत्यांगना कहना कभी नहीं छोड़ा, और वे मंच पर नाचती रहीं।
भारत में विकलांगता के साथ जी रहे बहुत-से लोगों के लिए उनकी कहानी उम्मीद का स्रोत बन गई। उसने दिखाया कि एक अंग खोने का मतलब एक सपना खोना नहीं होता।
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फ़िल्म मयूरी (1985) सुधा चंद्रन की कहानी सुनाती है, जिसमें मुख्य भूमिका उन्होंने ख़ुद निभाई है। जिस नक़ली पैर ने उन्हें फिर से नाचने में मदद की, उसके बारे में जानने के लिए जयपुर फ़ुट और जयपुर की उस संस्था के बारे में पढ़िए, जिसने दुनिया भर में बहुत बड़ी संख्या में लोगों को यह पैर मुफ़्त लगाया है।