← Back to stories

Reflection

वह दार्शनिक जिसने राजा से हटने को कहा

दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी ने एक गरीब दार्शनिक से कहा कि वह जो चाहे माँग ले। उसका जवाब दो हज़ार से भी ज़्यादा सालों से याद किया जा रहा है।

  • 3 मिनट का पाठ
  • Ages 12+
  • Historical narrative
  • 4th century BCE
इस भाषा में पढ़ें

प्राचीन यूनान में एक आदमी रहता था जिसके पास लगभग कुछ भी नहीं था।

उसका नाम डायोजनीज़ था। पुराने लेखक बताते हैं कि एथेंस में वह मिट्टी के एक बड़े मटके में सोता था, उस तरह के मटके में जिसमें शराब या तेल रखा जाता था, और जो एक मंदिर के पास करवट के बल पड़ा था। बाद में वह कोरिंथ में रहने लगा। वह एक खुरदुरा चोगा पहनता था। उसके पास खाने के टुकड़ों के लिए एक झोली थी और पानी पीने के लिए लकड़ी का एक प्याला।

कहते हैं कि एक दिन उसने एक बच्चे को अंजुली में भरकर पानी पीते देखा। डायोजनीज़ ने अपने प्याले की ओर देखा, कहा कि सादगी में एक बच्चा उससे आगे निकल गया, और प्याला फेंक दिया।

वह विचारकों के एक समूह से था जिसे बाद में सिनिक कहा गया। उनका मानना था कि लोग जिन चीज़ों के पीछे भागते हैं, जैसे धन, शोहरत, बढ़िया कपड़े और दूसरों की अच्छी राय, उनमें से ज़्यादातर बेकार हैं, और अच्छा जीवन सादगी और ईमानदारी से, प्रकृति के अनुसार जीने से मिलता है। डायोजनीज़ अपनी तीखी ज़ुबान, अपने अजीब बर्ताव और किसी के आगे न झुकने के लिए मशहूर था।

युवा राजा

लगभग उसी समय, करीब 336 ईसा पूर्व में, बीस साल का एक नौजवान यूनान के उत्तर में स्थित मकदूनिया का राजा बना। उसका नाम सिकंदर था। कुछ ही सालों में वह फ़ारसी साम्राज्य को जीत लेने वाला था और अपनी सेनाओं को भारत तक ले जाने वाला था। इतिहास उसे सिकंदर महान कहने वाला था।

जब वह कोरिंथ आया, तो यूनानी नगरों के नेता वहाँ इकट्ठा हुए और फ़ारस के ख़िलाफ़ उसकी लड़ाई में उसका साथ देने को राज़ी हो गए। राजनेता और दार्शनिक युवा राजा से मिलने और उसे बधाई देने के लिए दौड़े चले आए।

डायोजनीज़ नहीं आया।

प्लूटार्क, वह यूनानी लेखक जिसने लगभग चार सौ साल बाद सिकंदर की जीवनी लिखी, बताता है कि डायोजनीज़ उस समय कोरिंथ के क्रेनियन नाम के एक उपनगर में रहता था, और उसने सिकंदर पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। तो सिकंदर खुद उससे मिलने गया।

धूप में

सिकंदर ने देखा कि बूढ़ा दार्शनिक ज़मीन पर लेटा धूप की गरमाहट का मज़ा ले रहा है।

जब डायोजनीज़ ने इतने सारे लोगों को अपनी ओर आते देखा, तो वह थोड़ा-सा उठा और सिकंदर की ओर देखा। राजा ने उसका अभिवादन किया और पूछा कि क्या उसे कुछ चाहिए। दुनिया का सबसे ताकतवर नौजवान सामने खड़ा था, और कुछ भी देने को तैयार था।

प्लूटार्क के अनुसार, डायोजनीज़ ने जवाब दिया:

"हाँ, ज़रा मेरी धूप से हट जाओ।"

बस इतना ही। उसने न पैसा माँगा, न ज़मीन, न सम्मान। उसने राजा से एक तरफ़ हटने को कहा, क्योंकि उसकी परछाईं बीच में आ रही थी।

सिकंदर ने क्या कहा

लौटते समय सिकंदर के साथी हँसने लगे और बूढ़े का मज़ाक उड़ाने लगे। लेकिन सिकंदर पर उस जवाब का गहरा असर हुआ। प्लूटार्क लिखता है कि जो आदमी उसे इतनी हिकारत से देखता था, उसके स्वाभिमान और बड़प्पन से वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने कहा, "सच कहता हूँ, अगर मैं सिकंदर न होता, तो डायोजनीज़ होता।"

ये दोनों आदमी इससे ज़्यादा अलग हो ही नहीं सकते थे। एक को पूरी दुनिया चाहिए थी। दूसरे को बस इतना चाहिए था कि उसे धूप में पड़ा रहने दिया जाए। फिर भी ऐसा लगा कि राजा ने उस भिखारी में कुछ ऐसा पहचान लिया था जिसे वह जीत नहीं सकता था: एक ऐसा इंसान जो पूरी तरह आज़ाद था।

क्या यह सच है?

इतिहासकार पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि यह मुलाकात ठीक वैसे ही हुई थी जैसे बताई जाती है। प्लूटार्क सदियों बाद लिख रहा था, और डायोजनीज़ के बारे में बहुत-सी कहानियाँ उन लोगों ने गढ़ीं या सजाईं जो या तो उसके प्रशंसक थे या उसका मज़ाक उड़ाते थे। कुछ प्राचीन लेखकों ने तो यह भी दावा किया कि सिकंदर और डायोजनीज़ एक ही दिन, 323 ईसा पूर्व में, मरे थे, जो किसी तथ्य से ज़्यादा एक अच्छी कहानी लगती है।

लेकिन यह कहानी दो हज़ार से भी ज़्यादा सालों से इसलिए बची हुई है, क्योंकि यह कुछ कहती है। सिकंदर आगे चलकर यूनान से भारत तक फैले एक साम्राज्य पर राज करने वाला था, और बत्तीस साल की उम्र में मर जाने वाला था। परंपरा के अनुसार, डायोजनीज़ बहुत बूढ़ा होने तक जिया, हमेशा की तरह गरीब, और उतना ही आज़ाद।

और पढ़ने के लिए

प्लूटार्क की Life of Alexander (सिकंदर की जीवनी) पब्लिक डोमेन अनुवादों में ऑनलाइन मुफ़्त उपलब्ध है। डायोजनीज़ लैर्टियस, जो मिलते-जुलते नाम वाले एक प्राचीन लेखक थे पर उनका डायोजनीज़ से कोई रिश्ता नहीं था, उनके इकट्ठा किए गए डायोजनीज़ के किस्से और भी कई यादगार कहानियों से भरे हैं, हालाँकि इनमें से बहुत-सी निश्चित रूप से किंवदंतियाँ हैं।

Want to read more?

This story is told briefly. For the full, detailed account, these books and records go deeper:

  1. Plutarch, translated by Bernadotte Perrin, Life of Alexander (Parallel Lives), chapter 14. Loeb Classical Library / Harvard University Press, 1919.
  2. Diogenes Laërtius, translated by R. D. Hicks, Lives of Eminent Philosophers, Book VI (Diogenes). Loeb Classical Library, 1925.
  3. translated by Robin Hard, Diogenes the Cynic: Sayings and Anecdotes. Oxford World's Classics, 2012.

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

This story is awaiting final editorial fact-checking. If you spot an error, please let us know.

Shared on 1Kahani for reading and awareness. All credit for the research belongs to the authors and records listed under "Want to read more?". Based on ancient accounts, which may be part legend; the one quoted line is from Plutarch's ancient biography.

Have a copyright concern about this story? Tell us.

Download for Kindle & e-readers

Read next

ReflectionFable & folk tale

The Golden Touch

A god offers King Midas any wish he likes, and the king already loves gold more than anything. By the next morning, everything he touches shines.

4 min readAll agesAncient Greece
ReflectionFable & folk tale

The Sage and the Scorpion

An old sage sees a scorpion struggling in the river and reaches in to save it. It stings him. He reaches in again.

4 min readAges 8+Traditional India
ReflectionFable & folk tale

The Shortest Line

Emperor Akbar draws a line on the floor and sets his court a puzzle. Make it shorter, he says, without touching it.

4 min readAll agesMughal India, 16th century