ताँगे से एमडीएच तक
1947 में सियालकोट के एक नौजवान मसाला विक्रेता शरणार्थी बनकर लगभग ख़ाली हाथ दिल्ली पहुँचे। उन्होंने अपना ज़्यादातर पैसा एक ताँगे पर लगा दिया और दो आने की सवारी पर मुसाफ़िर ढोने लगे। फिर वे उसी एक काम की ओर लौटे जो वे जानते थे।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 11+
- Biography
- 1920s–2020
ध्यान दें: इस कहानी में 1947 के भारत-विभाजन की हिंसा और उथल-पुथल का ज़िक्र है।
1947 की शरद ऋतु में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर एक ताँगा, यानी दो पहियों वाली घोड़ा-गाड़ी, खड़ा था। ताँगेवाला सवारियों को आवाज़ दे रहा था। करोल बाग़ का किराया था दो आने।
ताँगेवाला बीस-पच्चीस साल का एक नौजवान था। कुछ महीने पहले तक वह पंजाब के सियालकोट में अपने परिवार की चलती हुई मसालों की दुकान पर काम करता था। अब सियालकोट एक दूसरे देश में था, और वह दिल्ली में एक शरणार्थी था, एक ऐसे घोड़े के साथ जिसे सँभालना उसे मुश्किल से आता था।
उसका नाम था धर्मपाल गुलाटी।
सियालकोट की दुकान
धर्मपाल का जन्म 1923 में सियालकोट में हुआ। उनके पिता, चुन्नी लाल गुलाटी, मसालों की एक छोटी-सी दुकान चलाते थे। शहर के लोग उनके पिता को "महाशय" कहते थे, जो इज़्ज़त का एक लक़ब है, और इसलिए दुकान महाशियाँ दी हट्टी, यानी महाशय की दुकान, के नाम से जानी जाने लगी। वह अपनी देगी मिर्च, यानी गहरे लाल रंग की मिर्च पाउडर, के लिए आस-पास मशहूर थी।
धर्मपाल को स्कूल में मन नहीं लगता था। पाँचवीं जमात के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। उनके पिता ने उन्हें कोई हुनर सिखाने की कोशिश की, और उन्होंने कई काम आज़माए: शीशों का, साबुन का, कपड़े का, चावल का और बढ़ईगीरी का। इनमें से कोई काम टिका नहीं।
आख़िर में वे परिवार की दुकान पर लौट आए, और वहाँ उन्हें एक ऐसा काम मिला जिसमें वे अच्छे थे। उन्होंने अच्छी मिर्चें और मसाले चुनना, उन्हें पीसना और मिलाना सीखा, और उन ग्राहकों से बात करना भी जो बार-बार लौटकर आते थे।
विभाजन
अगस्त 1947 में भारत आज़ाद हुआ, और ज़मीन बँट गई। सियालकोट पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
उसके बाद के महीने उपमहाद्वीप के इतिहास के सबसे भयानक महीनों में से थे। करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़कर नई सरहद पार करने पर मजबूर होना पड़ा, दोनों ओर से। समुदायों के बीच हुई हिंसा में लाखों लोग मारे गए। रेलगाड़ियाँ लाशों से भरी हुई स्टेशनों पर पहुँचती थीं।
गुलाटी परिवार सिर्फ़ उतना ही सामान लेकर सियालकोट से निकला जितना वे उठा सकते थे। वे अमृतसर के एक शरणार्थी कैंप से होते हुए दिल्ली पहुँचे, सितंबर 1947 में। शहर उन जैसे लोगों से भरा हुआ था, जिन्होंने अपने घर, अपनी दुकानें और अपनी जमा-पूँजी खो दी थी।
दो आने की सवारी
धर्मपाल के पास लगभग पंद्रह सौ रुपये थे। उन्होंने उनमें से छह सौ से ज़्यादा रुपये एक ताँगे और घोड़े पर लगा दिए, और रेलवे स्टेशन से करोल बाग़ के बीच सवारियाँ ढोने लगे।
यह मुश्किल और अनिश्चित काम था। सवारियाँ कम थीं, दूसरे ताँगेवाले ज़्यादा तजुर्बेकार थे, और कुछ दिन तो वे बहुत कम कमा पाते। वे दुकानदार रह चुके थे, और कोचवान की गद्दी पर उन्हें अपनापन महसूस नहीं होता था।
लगभग दो महीने बाद उन्होंने ताँगा बेच दिया। उन्होंने तय किया कि वे वही एक काम करेंगे जो वे सचमुच जानते थे।
लकड़ी का एक खोखा
उस पैसे से उन्होंने करोल बाग़ की अजमल ख़ाँ रोड पर लकड़ी का एक छोटा-सा खोखा ख़रीदा। उसके ऊपर उन्होंने घर वाले पुराने नाम का बोर्ड लगाया: महाशियाँ दी हट्टी ऑफ़ सियालकोट, देगी मिर्च वाले।
उस बोर्ड से फ़र्क़ पड़ा। सियालकोट से आए बहुत-से शरणार्थी आस-पास बस गए थे, और उन्होंने वह नाम पहचान लिया। वे उस मिर्च पाउडर की क्वालिटी जानते थे जो उनके परिवार बरसों से ख़रीदते आए थे। वे खोखे पर आए, और उन्होंने दूसरों को बताया।
परिवार ख़ुद मसाले पीसता था और क्वालिटी ऊँची रखता था। धीरे-धीरे कारोबार बढ़ा। 1950 के दशक में धर्मपाल ने पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक में एक दुकान खोली, और फिर कीर्ति नगर में एक छोटा-सा कारख़ाना।
एमडीएच
दशकों में महाशियाँ दी हट्टी, जिसे छोटा करके एमडीएच कहा गया, भारत के सबसे जाने-पहचाने मसाला ब्रांडों में से एक बन गया। अपने जाने-पहचाने रंगों वाले उसके पैकेट देश भर की रसोइयों में और दुनिया भर की भारतीय दुकानों में मिलने लगे।
ज़िंदगी के आख़िरी बरसों में धर्मपाल गुलाटी ख़ुद एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए। वे कंपनी के अपने टेलीविज़न विज्ञापनों में आते, पगड़ी और सफ़ेद मूँछों वाले एक बुज़ुर्ग। बहुत-से लोग उन्हें बस मसालों के विज्ञापन वाले दादाजी के रूप में जानते थे।
उन्होंने बहुत कुछ लौटाया भी। अपने पिता के नाम पर बने एक धर्मार्थ ट्रस्ट के ज़रिए उन्होंने दिल्ली में अपनी माँ, माता चानन देवी, के नाम पर बने एक अस्पताल की मदद की, साथ ही स्कूलों की और ज़रूरतमंद लोगों की भी।
2019 में भारत सरकार ने उन्हें व्यापार और उद्योग में उनके काम के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया। दिसंबर 2020 में सत्तानवे साल की उम्र में दिल्ली में उनका निधन हुआ।
लौटने का रास्ता
लोग अक्सर उनकी कहानी एक बड़ी कामयाबी की कहानी के रूप में सुनाते हैं। लेकिन याद रखने लायक़ हिस्सा इससे शांत है। एक नौजवान, जिसने अपना घर और अपना शहर खो दिया था, उसने जीने के लिए कुछ नया आज़माया, देखा कि वह उसके लिए ठीक नहीं है, और बिना किसी अहंकार के उस छोटे, सधे हुए काम की ओर लौट आया जो उसने अपने पिता की दुकान पर सीखा था।
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यास्मिन ख़ान की The Great Partition 1947 का, और नई सरहदें पार करने वाले शरणार्थियों का, एक साफ़ और संवेदनशील इतिहास है। एमडीएच की वेबसाइट सियालकोट से दिल्ली तक कंपनी की कहानी बताती है। भारत सरकार के पद्म पुरस्कारों के रिकॉर्ड में महाशय धर्मपाल गुलाटी के सम्मान का ज़िक्र है।