लाइटहाउस वाले की बेटी
1838 में सितंबर की एक तूफ़ानी सुबह, पौ फटने से पहले, एक नौजवान लड़की ने लाइटहाउस की खिड़की से चट्टानों पर टूटा पड़ा एक जहाज़ देखा। ग्रेस डार्लिंग और उसके पिता एक छोटी-सी चप्पू वाली नाव लेकर तूफ़ान में निकल पड़े।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- Historical narrative
- 1830s
ध्यान दें: इस कहानी में एक जहाज़ के डूबने और यात्रियों की मौत का ज़िक्र है, जिनमें दो बच्चे भी थे।
पूरी रात लाइटहाउस के चारों ओर हवा गरजती रही थी। लहरें नीचे की चट्टानों से टकरातीं और फुहारें दीवारों पर ऊँची उछालतीं।
ग्रेस डार्लिंग अपनी खिड़की से देख रही थी। सुबह पाँच बजे से कुछ पहले, धुँधली-सी रोशनी में, उसे लगभग एक मील दूर बिग हारकर नाम के एक नीचे टापू की चट्टानों पर कुछ काला-सा दिखा। वह एक जहाज़ का मलबा था।
उसने अपने पिता को आवाज़ दी।
चट्टान पर बसा परिवार
ग्रेस बाईस बरस की थी। वह अपने माता-पिता के साथ लॉन्गस्टोन लाइटहाउस में रहती थी, जो इंग्लैंड के उत्तर-पूर्व में नॉर्थम्बरलैंड के तट के पास, फ़ार्न द्वीपों के एक नंगे, पथरीले द्वीप पर था। उसके पिता, विलियम डार्लिंग, लाइटहाउस के रखवाले थे। ग्रेस वहीं समुद्री पक्षियों और सीलों के बीच बड़ी हुई थी, और रात भर बड़े दीये को जलाए रखने में हाथ बँटाती थी।
परिवार द्वीपों के आसपास के समुद्र को बहुत अच्छी तरह जानता था। वे जानते थे कि वह कितनी जल्दी रंग बदल सकता है, और उन चट्टानों पर कितने जहाज़ डूब चुके थे।
फ़ॉरफ़ारशायर का डूबना
वह जहाज़ था फ़ॉरफ़ारशायर, एक भाप का जहाज़ जो हल से स्कॉटलैंड के डंडी तक यात्रियों और माल को ले जा रहा था। उसमें लगभग साठ लोग सवार थे।
रात में उसके बॉयलर रिसने लगे थे, और उसके इंजन बंद हो गए थे। बिना ताक़त के तूफ़ान उसे द्वीपों की ओर धकेलता ले गया। सुबह चार बजे के आसपास वह चट्टान से टकराया और दो टुकड़ों में टूट गया। जहाज़ का पिछला आधा हिस्सा लगभग फ़ौरन बह गया, और उसमें सवार ज़्यादातर लोग समुद्र में खो गए।
क्रू के कुछ लोग जहाज़ की एक नाव में निकल भागने में कामयाब रहे, और बाद में पास से गुज़रते एक जहाज़ ने उन्हें उठा लिया। पर कुछ लोग अब भी उस चट्टान से चिपके हुए थे जहाँ जहाज़ का अगला आधा हिस्सा आ फँसा था।
तूफ़ान के बीच
जैसे-जैसे उजाला बढ़ा, ग्रेस और उसके पिता को बिग हारकर पर कुछ आकृतियाँ हिलती दिखीं। कुछ लोग अब भी ज़िंदा थे।
समुद्र इतना उफन रहा था कि मुख्य भूमि से लाइफ़बोट जल्दी नहीं आ सकती थी। अगर कोई उन लोगों तक समय रहते पहुँच सकता था, तो वह डार्लिंग परिवार ही था। उनके पास बस एक कोबल था, लकड़ी की एक छोटी, खुली चप्पू वाली नाव। और उसे खेने वाले बस दो लोग थे।
ग्रेस और उसके पिता नाव में बैठे, दोनों ने एक-एक चप्पू थामा, और तूफ़ान में नाव खेते हुए निकल पड़े। वे सीधे पार नहीं जा सकते थे, क्योंकि लहरें बहुत बेक़ाबू थीं। इसके बजाय वे द्वीपों की आड़ में घूमकर लंबे रास्ते से गए, उफनते पानी में लगभग एक मील।
आख़िरकार वे चट्टान के पास पहुँचे। उसके पिता कूदकर चट्टान पर चले गए। ग्रेस को अकेले नाव को स्थिर रखना था, ज़ोर-ज़ोर से चप्पू चलाते हुए, ताकि वह चट्टानों से टकराकर चूर-चूर न हो जाए।
चट्टान पर नौ लोग
नौ लोग बचे थे। वे ठिठुरे हुए, भीगे हुए और बेदम थे। उनमें एक औरत थी, मिसेज़ सारा डॉसन। रात में उसके दो छोटे बच्चे उसकी बाँहों में दम तोड़ चुके थे।
छोटी-सी नाव सबको एक साथ नहीं ले जा सकती थी। पहले फेरे में ग्रेस और उसके पिता पाँच लोगों को लाइटहाउस ले गए, जिनमें मिसेज़ डॉसन और एक घायल आदमी थे। फिर विलियम डार्लिंग और बचाए गए क्रू के दो आदमी बाक़ी चार को लाने के लिए नाव खेकर लौटे, जबकि ग्रेस वहीं रुक गई। सभी नौ लोग सुरक्षित लाइटहाउस पहुँचा दिए गए।
तूफ़ान कई दिन चलता रहा। बचे हुए लोगों को लाइटहाउस में ही रुकना पड़ा, और ग्रेस और उसकी माँ ने उनकी देखभाल की, उन्हें सूखे कपड़े, गर्म खाना और बिस्तर दिए। मुख्य भूमि की लाइफ़बोट का क्रू, जो बचाव के बाद पहुँचा था, उसे भी वहीं रुकना पड़ा, और उनमें ग्रेस का भाई भी था।
मशहूर
कुछ ही हफ़्तों में पूरे ब्रिटेन ने ग्रेस डार्लिंग का नाम सुन लिया।
अख़बारों ने कहानी छापी। चित्रकार उसका चित्र बनाने लाइटहाउस तक आए। उस पर कविताएँ और गीत लिखे गए। लोगों ने उसे चिट्ठियाँ लिखीं, तोहफ़े भेजे, और उसके बालों की लटें माँगीं। महारानी विक्टोरिया ने उसे पचास पाउंड भेजे। उसे और उसके पिता दोनों को उनकी बहादुरी के लिए पदक दिए गए।
ग्रेस को यह शोहरत मुश्किल लगी। वह एक शांत, संकोची नौजवान लड़की थी, और वह अपने परिवार के साथ लाइटहाउस पर अपनी आम ज़िंदगी जीते रहना चाहती थी।
अफ़सोस, उसके पास ज़्यादा समय नहीं था। 1842 में, बचाव के सिर्फ़ चार साल बाद, उसे तपेदिक हो गया। उसी साल अक्टूबर में, छब्बीस बरस की उम्र में, उसकी मौत हो गई। उसे बैमबरा के गिरजाघर के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस गाँव में जहाँ वह पैदा हुई थी, जहाँ से समुद्र दिखाई देता है।
आज वह छोटी-सी नाव, जिसे उसने उस सुबह खेया था, बैमबरा के ग्रेस डार्लिंग संग्रहालय में रखी है, जिसे रॉयल नेशनल लाइफ़बोट इंस्टिट्यूशन चलाता है।
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ह्यू कनिंघम की Grace Darling: Victorian Heroine उसकी कहानी सुनाती है और बताती है कि वह इतनी मशहूर क्यों हुई। जेसिका मिटफ़र्ड की Grace Had an English Heart एक और जीवंत वृत्तांत है। बैमबरा में आरएनएलआई का ग्रेस डार्लिंग संग्रहालय उसका इतिहास बताता है और उसकी नाव दिखाता है।