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True Stories

वह युद्ध जो ख़त्म ही नहीं हुआ

1974 में, एक नौजवान यात्री एक जापानी सैनिक को ढूँढ़ने फ़िलीपींस के एक द्वीप के जंगल में गया। हिरू ओनोदा वहाँ उनतीस साल से दूसरा विश्व युद्ध लड़ रहा था। कोई भी उसे यक़ीन नहीं दिला पाया था कि युद्ध ख़त्म हो चुका है।

  • 4 मिनट की कहानी
  • Ages 12+
  • Historical narrative
  • 1940s–1970s

ध्यान दें: यह कहानी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद की है, और इसमें छिपे हुए सैनिकों द्वारा गाँववालों की हत्या और सैनिकों की मौत का ज़िक्र है।

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नौजवान जंगल में अपने अलाव के पास बैठा इंतज़ार करता रहा।

यह फ़रवरी 1974 था। उसका नाम था नोरियो सुज़ुकी, और वह रोमांच पसंद करने वाला एक जापानी छात्र था। वह फ़िलीपींस के एक छोटे, पहाड़ी द्वीप लुबांग पर एक ऐसे आदमी को ढूँढ़ने आया था जिसके बारे में बहुत-से लोग मानते थे कि वह मर चुका है।

एक रात पेड़ों के बीच से एक आकृति निकली, हाथ में राइफ़ल लिए। उसने पैबंद लगी, बदरंग फ़ौजी वर्दी पहनी थी। वह दुबला था, उसकी आँखें तेज़ थीं, और उसकी उम्र पचास से ऊपर थी।

वह इंपीरियल जापानी सेना का लेफ़्टिनेंट हिरू ओनोदा था। और जहाँ तक उसका सवाल था, दूसरा विश्व युद्ध अब भी जारी था।

हुक्म

ओनोदा का जन्म 1922 में जापान के वाकायामा में हुआ। युद्ध के दौरान उसे ख़ुफ़िया अफ़सर की ट्रेनिंग दी गई, एक ख़ास स्कूल में जहाँ सैनिकों को जासूसी करना, छिपना और दुश्मन की सीमा के पीछे लड़ना सिखाया जाता था।

दिसंबर 1944 में उसे लुबांग भेजा गया। अमेरिकी और फ़िलीपीनी सेनाएँ उतरने वाली थीं, और जापान युद्ध हार रहा था। उसे हुक्म था कि दुश्मन की रफ़्तार धीमी करे, जो कुछ हो सके तबाह करे, और लड़ता रहे। उससे कहा गया कि वह कभी हथियार न डाले, और कभी अपनी जान न ले। उसके कमांडिंग अफ़सर मेजर योशिमी तानिगुची ने, जैसा ओनोदा ने बाद में लिखा, वादा किया कि चाहे कुछ भी हो, वे उसे लेने वापस आएँगे।

फ़रवरी 1945 में दुश्मन उतर आया। द्वीप पर तैनात ज़्यादातर जापानी सैनिक मारे गए या पकड़े गए। ओनोदा तीन और सैनिकों के साथ पहाड़ियों में भाग निकला।

जंगल में पर्चे

अगस्त 1945 में जापान ने हथियार डाल दिए, और युद्ध ख़त्म हो गया। पर ओनोदा को लेने कोई नहीं आया।

जल्द ही जंगल पर पर्चे गिराए गए, जिनमें जापानी सैनिकों से कहा गया था कि युद्ध ख़त्म हो चुका है और वे बाहर आ जाएँ। ओनोदा और उसके साथियों ने उन्हें ध्यान से पढ़ा और तय किया कि यह दुश्मन की चाल है। उन्हें भाषा ग़लत लगी। उन्होंने सोचा, असली जापानी हुक्म ऐसा नहीं लिखा होता।

बरस बीतते गए। और पर्चे आए, अख़बार आए, और बाद में जापान से उनके परिवारों की चिट्ठियाँ और तस्वीरें भी, जो हवा से गिराई गईं। खोजी दलों ने लाउडस्पीकर से उन्हें पुकारा। हर बार उन आदमियों ने यक़ीन न करने की कोई न कोई वजह ढूँढ़ ली। ओनोदा को धोखे की उम्मीद रखना सिखाया गया था। "दुश्मन" जितनी ज़्यादा कोशिश करता, उसे उतना ही पक्का यक़ीन होता जाता कि यह एक जाल है।

तो वे छिपे रहे। वे जंगल में रहते, एक जगह से दूसरी जगह जाते, कच्चे-पक्के ठिकानों में सोते। वे केले और नारियल खाते, और नीचे के खेतों से चावल चुराते और मवेशी मारते।

नुक़सान

यह सिर्फ़ सहनशक्ति की कहानी नहीं है। ओनोदा मानता था कि वह युद्ध में है, और वह युद्ध में लड़ रहे सैनिक की तरह ही पेश आया। बरसों तक उसने और उसके साथियों ने द्वीप के किसानों पर हमले किए, उनकी फ़सलें और गोदाम जलाए, और जो लोग मिले उन पर गोलियाँ चलाईं। लगभग तीस द्वीपवासी मारे गए, और उससे कहीं ज़्यादा घायल हुए। लुबांग के लोगों के लिए पहाड़ियों में छिपे वे आदमी दशकों तक चलने वाला एक आतंक थे।

एक-एक करके ओनोदा के साथी छूटते गए। 1949 में उनमें से एक चुपचाप चला गया और उसने ख़ुद को हवाले कर दिया। 1954 में एक और खोजी दल से मुठभेड़ में गोली लगकर मारा गया। 1972 में उसका आख़िरी साथी, किंशिची कोज़ुका, फ़िलीपीनी पुलिस के साथ गोलीबारी में मारा गया।

अब ओनोदा अकेला था। जापान ने उसे मरा हुआ मानकर एक बार आधिकारिक रूप से मृत घोषित कर दिया था। जब कोज़ुका की मौत की ख़बर जापान पहुँची, तो लोगों को एहसास हुआ कि ओनोदा शायद अब भी ज़िंदा है।

हुक्म आता है

नोरियो सुज़ुकी ने उसे ढूँढ़ने की ठान ली थी। और सही जगह डेरा डालकर इंतज़ार करते-करते, वह उसे ढूँढ़ने में कामयाब रहा।

दोनों आदमी रात भर बातें करते रहे। सुज़ुकी ने उसे बताया कि युद्ध लगभग तीस साल पहले ख़त्म हो चुका है। ओनोदा ने सुना। पर उसने कहा कि वह तभी बाहर आएगा जब कोई वरिष्ठ अफ़सर ख़ुद आकर उसे उसके हुक्म से मुक्त करे।

सुज़ुकी सबूत के तौर पर अपनी और ओनोदा की साथ की तस्वीरें लेकर जापान लौटा। जापानी सरकार ने ओनोदा के पुराने कमांडिंग अफ़सर मेजर तानिगुची को ढूँढ़ निकाला, जो अब किताबें बेचने का काम करते थे।

मार्च 1974 में तानिगुची हवाई जहाज़ से लुबांग पहुँचे। जंगल में उन्होंने ओनोदा को एक हुक्म पढ़कर सुनाया, जिसने आधिकारिक रूप से उसका मिशन ख़त्म कर दिया। तभी जाकर ओनोदा ने माना कि युद्ध ख़त्म हो चुका है।

उसने अपनी तलवार, अपनी राइफ़ल और अपने कारतूस सौंप दिए। राइफ़ल अब भी चलती थी। उसने उन सारे बरसों में उसे बड़ी सावधानी से सँभालकर रखा था।

उसके बाद

फ़िलीपींस के राष्ट्रपति फ़र्डिनेंड मार्कोस ने उसे हत्याओं के लिए माफ़ कर दिया, क्योंकि वह मानता था कि वह अब भी युद्ध में है। पर लुबांग के बहुत-से परिवारों ने अपने प्रियजन खोए थे, और माफ़ी से उनका दुख ख़त्म नहीं हुआ।

ओनोदा एक ऐसे जापान में लौटा जिसे वह मुश्किल से पहचान पाया, गाड़ियों, गगनचुंबी इमारतों और टेलीविज़न से भरा हुआ। उसे वहाँ घुलने-मिलने में मुश्किल हुई। वह ब्राज़ील चला गया और मवेशियों का एक फ़ार्म चलाने लगा। बाद में वह जापान लौटा और एक नेचर स्कूल खोला, जहाँ वह नौजवानों को डेरा डालना और जंगल में ज़िंदा रहना सिखाता था।

जनवरी 2014 में, इक्यानबे बरस की उम्र में, टोक्यो में उसकी मौत हुई।

उसकी कहानी अक्सर वफ़ादारी की कहानी के रूप में सुनाई जाती है। यह इस बात की कहानी भी है कि एक अकेला, ग़लत यक़ीन कितनी बड़ी क़ीमत वसूल सकता है, उस इंसान से भी जो उसे पकड़े रहता है और उसके आसपास के सबसे भी।

और पढ़ना चाहते हैं?

ओनोदा ने अपनी कहानी ख़ुद No Surrender: My Thirty-Year War में सुनाई, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद चार्ल्स एस. टेरी ने किया। मार्च 1974 में दुनिया भर के अख़बारों ने उसके हथियार डालने की ख़बर दी, और 2014 में उसकी मौत पर लंबे श्रद्धांजलि लेख लिखे।

Want to read more?

This story is told briefly. For the full, detailed account, these books and records go deeper:

  1. Hiroo Onoda, translated by Charles S. Terry, No Surrender: My Thirty-Year War. Kodansha International, 1974.
  2. Reports on Hiroo Onoda's surrender. The New York Times and other newspapers, 1974.
  3. Obituaries of Hiroo Onoda. The Guardian, The New York Times and other newspapers, 2014.

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

This story is awaiting final editorial fact-checking. If you spot an error, please let us know.

Shared on 1Kahani for reading and awareness. All credit for the research belongs to the authors and records listed under "Want to read more?". Based on Onoda's own memoir and published reports; no quotations have been invented.

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