आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए?
एक किसान से कहा जाता है कि एक दिन में वह जितनी ज़मीन का चक्कर लगा ले, वह सब एक छोटी-सी कीमत पर उसकी हो जाएगी। ज़्यादा पाने की चाह पर टॉल्स्टॉय की मशहूर नीति-कथा।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Classic retold
- 1880s
ध्यान दें: इस कहानी में एक अचानक मौत का ज़िक्र है।
पाखोम एक किसान था, और उसे अपनी ज़िंदगी से बस एक ही शिकायत थी।
"अगर मेरे पास ढेर सारी ज़मीन होती," उसने एक शाम अँगीठी के ऊपर लेटे-लेटे कहा, "तो मैं खुद शैतान से भी न डरता।"
और शैतान, जो अँगीठी के पीछे बैठा था, उसने यह सुन लिया।
"ठीक है," शैतान ने सोचा। "चलो, हम दोनों में एक छोटा-सा मुकाबला हो जाए। मैं तुम्हें काफ़ी ज़मीन दूँगा, और उसी ज़मीन के ज़रिए तुम्हें अपने कब्ज़े में कर लूँगा।"
थोड़ी और
कुछ ही समय बाद, गाँव के पास ज़मीन की मालकिन एक महिला ने उसे बेचने का फ़ैसला किया। पाखोम ने अपना एक-एक सिक्का जोड़ा, एक बछेड़ा और अपनी आधी मधुमक्खियाँ बेच दीं, बाकी पैसा उधार लिया और चालीस एकड़ ज़मीन खरीद ली।
शुरू में वह बहुत खुश था। जब वह अपने खेतों में हल चलाने जाता, या अपनी उगती फ़सल देखने जाता, तो उसका दिल खुशी से भर जाता। उसकी ज़मीन पर उगी घास दूसरी घास से अलग लगती थी। फूल ज़्यादा चटकीले लगते थे।
लेकिन जल्दी ही पड़ोसियों के मवेशी उसके चरागाहों में घुस आने लगे, और वह अदालत गया, झगड़े किए, और अपने दोस्त खो दिए। उसकी ज़मीन तो बढ़ गई थी, लेकिन उसका सुकून घट गया था।
फिर एक मुसाफ़िर ने उसे दूर, वोल्गा के उस पार की एक जगह के बारे में बताया, जहाँ ज़मीन उपजाऊ थी और हर बसने वाले को खूब ज़मीन मिलती थी। तो पाखोम ने सब कुछ बेच दिया और वहाँ चला गया, और वहाँ उसके पास पहले से तीन गुना ज़मीन हो गई।
शुरू में वह संतुष्ट रहा। लेकिन कुछ समय बाद वह सोचने लगा, "काश, किराए की ज़मीन के बजाय मेरे पास अपनी और ज़मीन होती, तब तो मैं सच में मज़े में रहता।"
पेशकश
एक दिन एक घूमते-फिरते व्यापारी ने उसे बश्किरों की ज़मीन के बारे में बताया। बश्किर एक ऐसी जाति थे जो बड़े, खुले स्टेपी के मैदानों में रहते थे।
"उनके पास इतनी ज़मीन है कि एक साल में भी उसका चक्कर न लगा सकें," व्यापारी ने कहा। "और वे सीधे-सादे लोग हैं। मैंने उनसे तेरह हज़ार एकड़ ज़मीन एक हज़ार रूबल में खरीदी।"
उस रात पाखोम को ठीक से नींद ही नहीं आई। कुछ ही दिनों में वह एक नौकर और ढेर सारे तोहफ़ों के साथ निकल पड़ा।
बश्किरों ने उसका प्यार से स्वागत किया। उन्होंने उसे चाय और भेड़ का मांस खिलाया-पिलाया और उसकी माँग सुनी। फिर उनका मुखिया बोला।
"हमारी कीमत हमेशा एक ही रहती है," उसने कहा। "एक दिन के एक हज़ार रूबल।"
पाखोम कुछ समझा नहीं। "दिन कैसा नाप हुआ? उसमें कितने एकड़ होते हैं?"
"हम दिन के हिसाब से बेचते हैं," मुखिया ने कहा। "एक दिन में तुम जितनी ज़मीन का चक्कर लगा लो, वह एक हज़ार रूबल में तुम्हारी। लेकिन एक शर्त है। अगर सूरज डूबने तक तुम उसी जगह वापस नहीं पहुँचे जहाँ से चले थे, तो तुम्हारा पैसा गया।"
चलना
भोर होते ही वे स्टेपी में एक छोटी-सी पहाड़ी पर चढ़े। मुखिया ने अपनी लोमड़ी की खाल वाली टोपी ज़मीन पर रख दी।
"यही निशान होगा," उसने कहा। "यहीं से चलो और यहीं लौट आओ। जितनी ज़मीन का तुम चक्कर लगाओगे, वह सब तुम्हारी होगी।"
पाखोम ने अपना पैसा टोपी में रखा, कोनों पर निशान लगाने के लिए एक फावड़ा लिया और उगते सूरज की ओर चल पड़ा।
हवा ठंडी थी और चलना आसान था। एक हज़ार कदम चलने के बाद उसने अपने रास्ते का निशान लगाने के लिए एक गड्ढा खोदा, और आगे बढ़ता रहा। वह जितना आगे जाता, ज़मीन उतनी ही बढ़िया लगती। "थोड़ा और आगे चलता हूँ," उसने सोचा। "इतनी अच्छी ज़मीन छोड़ देना अफ़सोस की बात होगी।"
सूरज और ऊपर चढ़ आया। उसने अपना कोट और जूते उतार दिए। थोड़ी रोटी खाई और कुछ पानी पिया। फिर उसने पहला मोड़ लिया, और फिर दूसरा। लेकिन हर बार जब उसे कोई अच्छा निचला हिस्सा दिखता, या कोई नम चरागाह जहाँ अलसी उग सके, तो वह उसे भी शामिल करने के लिए लंबा घेरा लगा लेता।
जब आख़िरकार वह वापसी के लिए मुड़ा, तो पहाड़ी बहुत दूर थी, और सूरज ढलने लगा था।
सूर्यास्त
पाखोम जल्दी-जल्दी चलने लगा। उसके पैर कट गए थे और उनमें चोटें थीं। उसकी टाँगें कमज़ोर पड़ने लगीं। वह आराम करना चाहता था, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई।
"हाय रे," उसने सोचा। "मैंने बहुत ज़्यादा हथियाना चाहा और पूरा मामला ही बिगाड़ दिया।"
उसने अपना कोट और जूते, अपनी पानी की कुप्पी और अपनी टोपी फेंक दी। बस सहारे के लिए फावड़ा रखा। वह दौड़ने लगा। उसकी साँस फूलने लगी। उसका दिल हथौड़े की तरह धड़क रहा था। मुँह सूख गया था और सीना जल रहा था। उसे मरने का डर लग रहा था, लेकिन वह रुक नहीं सकता था।
"इतनी दूर दौड़ने के बाद," उसने सोचा, "अगर अब रुक गया तो लोग मुझे मूर्ख कहेंगे।"
सूरज धरती के किनारे को छू रहा था। उसे पहाड़ी पर बश्किर दिखाई दे रहे थे, जो हाथ हिला-हिलाकर उसे पुकार रहे थे। उसे ज़मीन पर रखी फ़र की टोपी दिखाई दे रही थी, जिसमें पैसा रखा था।
अपनी आख़िरी ताकत लगाकर उसने खुद को आगे झोंक दिया और उसके हाथ टोपी तक पहुँच गए।
"वाह, क्या बढ़िया आदमी है!" मुखिया चिल्लाया। "इसने बहुत ज़मीन पा ली!"
पाखोम का नौकर उसे उठाने दौड़ा। लेकिन उसके मुँह से खून बह रहा था। पाखोम मर चुका था।
बश्किरों ने अफ़सोस में ज़ुबान से च-च की आवाज़ की।
उसके नौकर ने फावड़ा उठाया और इतनी लंबी कब्र खोदी कि पाखोम उसमें लेट सके, और उसे वहीं दफ़ना दिया।
सिर से एड़ी तक छह फ़ुट, बस इतनी ही ज़मीन उसे चाहिए थी।
इस कहानी के बारे में
युद्ध और शांति (War and Peace) और आन्ना करेनिना (Anna Karenina) के लेखक लियो टॉल्स्टॉय (1828–1910) ने यह नीति-कथा 1886 में आम रूसी पाठकों के लिए लिखी थी। कहा जाता है कि जेम्स जॉयस ने इसे दुनिया के साहित्य की सबसे महान कहानी कहा था। यह कहानी का छोटा किया हुआ रूप है; पूरी मूल कहानी पब्लिक डोमेन में है।