किसा गोतमी और सरसों का दाना
एक जवान माँ अपने बच्चे को लिए दरवाज़े-दरवाज़े भटकती है, ऐसी दवा माँगती हुई जो उसे वापस ला दे। बुद्ध उससे कहते हैं कि वे मदद कर सकते हैं, अगर वह उनके लिए एक छोटी-सी चीज़ ले आए।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- Fable & folk tale
- Ancient India, c. 5th century BCE
ध्यान दें: यह कहानी एक जवान माँ के दुख के बारे में है, जिसके छोटे बेटे की मृत्यु हो गई है।
बहुत पहले, सावत्थी नगर में गोतमी नाम की एक जवान स्त्री रहती थी।
वह एक ग़रीब परिवार से थी, और इतनी दुबली थी कि लोग उसे किसा गोतमी कहते थे, यानी "दुबली गोतमी"। जब उसका ब्याह एक धनी घराने में हुआ, तो उसके पति के घरवाले उसे नीची नज़र से देखते थे। वे आपस में फुसफुसाते कि वह कहाँ से आई है, और उसे यह बात भूलने नहीं देते थे।
फिर उसके एक बेटा हुआ, और सब कुछ बदल गया।
नन्हा बेटा
अब वह परिवार के वारिस की माँ थी। फुसफुसाहटें थम गईं। आँगन में लोग उसे देखकर मुस्कुराने लगे। और गोतमी ने, जिसके पास कभी ज़्यादा कुछ नहीं रहा था, अपना पूरा दिल अपने बच्चे पर उँडेल दिया।
वह एक चंचल, हँसता-खेलता नन्हा लड़का बन गया। उसने चलना सीखा, फिर दौड़ना, और वह हर जगह दौड़ता फिरता, और गोतमी कभी उससे दूर न होती।
फिर, जब वह अभी बहुत छोटा ही था, वह बीमार पड़ गया। सब कुछ बहुत जल्दी हुआ। थोड़े ही समय में, उसकी मृत्यु हो गई।
मेरे बेटे के लिए दवा
गोतमी इसे स्वीकार नहीं कर पाई।
उसने किसी को उस नन्हे शरीर को अपने पास से ले जाने नहीं दिया। उसने अपने बेटे को कमर पर उठाया, जैसे वह उसकी ज़िंदगी के हर दिन उसे उठाती आई थी, और सावत्थी की गलियों में निकल पड़ी।
वह घर-घर गई। हर दरवाज़े पर वह एक ही बात पूछती: क्या उनके पास उसके बेटे के लिए कोई दवा है? वह बीमार है, वह कहती। ज़रूर किसी के पास, कहीं न कहीं, कोई ऐसी दवा होगी जो उसे ठीक कर दे।
लोग उसकी गोद में बच्चे को देखते और पीछे हट जाते। कुछ ने मुँह फेर लिया। कुछ ने उससे कड़वे बोल बोले। कुछ ने बस सिर हिला दिया, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आया कि क्या कहें।
आख़िर में वह एक ऐसे आदमी के पास पहुँची जिसने उसे करुणा से देखा, और नरमी से बात की। उसके पास कोई दवा नहीं है, उसने कहा। पर कोई है जिसके पास शायद हो। बुद्ध नगर के पास ठहरे हुए थे। उसे उनके पास जाना चाहिए।
सरसों का एक दाना
गोतमी अपने बेटे को उस जगह ले गई जहाँ बुद्ध उपदेश दे रहे थे। वह वहाँ जुटे लोगों के बीच से रास्ता बनाती आगे बढ़ी, और उसने उनसे वही माँगा जो वह सबसे माँगती आई थी, अपने बच्चे के लिए एक दवा।
बुद्ध ने उसे लौटाया नहीं। उन्होंने उससे यह नहीं कहा कि वह नासमझ है, या कि बच्चा मर चुका है। उन्होंने उसे बड़ी करुणा से देखा और कहा कि वे मदद कर सकते हैं।
उन्होंने उससे कहा कि वह नगर में वापस जाए और उनके लिए सरसों के कुछ दाने ले आए।
गोतमी का दिल उछल पड़ा। सरसों तो दुनिया की सबसे आम चीज़ थी। भारत की हर रसोई में होती थी।
पर एक बात और थी, बुद्ध ने कहा। सरसों ऐसे घर से आनी चाहिए जहाँ कभी किसी की मृत्यु न हुई हो।
घर-घर
गोतमी जल्दी-जल्दी सावत्थी लौटी, बेटा अब भी उसकी कमर पर था।
पहले घर पर उसने सरसों माँगी, और घर की स्त्री फ़ौरन लाने चली गई। तभी गोतमी को याद आया। "क्या इस घर में कभी किसी की मृत्यु हुई है?" उसने पूछा।
स्त्री ने उसे अजीब नज़रों से देखा। हुई तो है। उसके ससुर की मृत्यु यहीं हुई थी, पिछले साल ही।
गोतमी ने उसका धन्यवाद किया, और सरसों नहीं ली।
अगले घर में दादी थीं। उसके अगले में एक शिशु, बरसों पहले। उसके अगले में एक भाई, एक पत्नी, एक बेटा। हर कोई उसकी मदद करना चाहता था। हर किसी ने सरसों देनी चाही। और हर किसी के पास, जब उसने वह सवाल पूछा, कोई न कोई ऐसा था जिसे उन्होंने खोया था।
वह दिन भर चलती रही। अमीर घर और ग़रीब घर, बड़े और छोटे। जवाब हमेशा वही था।
शाम
शाम होते-होते गोतमी थक चुकी थी। वह गली में रुक गई और अपने चारों ओर खिड़कियों में जलाए जा रहे दीयों को देखने लगी, एक के बाद एक, घर के बाद घर।
और वह समझ गई।
वह अकेली नहीं थी। वह कभी अकेली थी ही नहीं। उनमें से हर दरवाज़े के पीछे, कोई न कोई वहाँ बैठ चुका था जहाँ वह आज बैठी थी। उसने देखा कि जीवित लोग हमेशा मरे हुओं से कम होते हैं। इनमें से हर घर में मृत्यु आई थी, जैसे उसके घर आई थी।
कथाएँ कहती हैं कि तब उसके दिल में कुछ शांत हो गया। वह अपने बेटे को नगर से बाहर उस जगह ले गई जहाँ मृतकों को रखा जाता था, और वहीं उसने उसे विदा किया।
फिर वह ख़ाली हाथ बुद्ध के पास लौट आई।
उन्होंने उससे पूछा कि क्या उसे सरसों का दाना मिला। उसने कहा कि नहीं मिला, और अब उसे उसकी ज़रूरत भी नहीं है। उसने वह सीख लिया था जो सिखाने के लिए उन्होंने उसे भेजा था।
इस कहानी के बारे में
किसा गोतमी एक बौद्ध भिक्षुणी बनीं, और परंपरा उन्हें आरंभिक संघ की ज्ञानी स्त्रियों में से एक के रूप में याद करती है। उनकी अपनी गाथाएँ थेरीगाथा में सुरक्षित हैं, जो बौद्ध भिक्षुणियों की कविताओं का प्राचीन संग्रह है, और उनकी कहानी थेरीगाथा और धम्मपद की पुरानी टीकाओं में सुनाई जाती है। अलग-अलग कथाओं में ब्योरे अलग हैं। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।