कृष्ण और सुदामा
पाठशाला में दो लड़के सब कुछ बाँटते हैं। बरसों बाद, एक सोने की नगरी का राजा है और दूसरा इतना ग़रीब कि उसका परिवार अक्सर भूखा रहता है। सुदामा चिवड़े की एक छोटी-सी पोटली लेकर महल की ओर चल पड़ते हैं। क्या उनका पुराना मित्र उन्हें याद भी करेगा?
- 4 मिनट का पाठ
- All ages
- Classic retold
- The Bhagavata Purana
बहुत समय पहले, उज्जैन नगर के पास ऋषि सांदीपनि के वन-आश्रम में दो लड़के साथ-साथ पढ़ते थे।
उनमें से एक थे कृष्ण, एक राजकुमार। दूसरे थे सुदामा, एक ग़रीब ब्राह्मण परिवार के बेटे। पर आश्रम में न कोई राजकुमार था, न कोई ग़रीब। वे साथ-साथ फ़र्श बुहारते, साथ-साथ पानी लाते, साथ-साथ पढ़ते और साथ-साथ हँसते। वे सबसे अच्छे दोस्त बन गए।
जब उनकी पढ़ाई पूरी हुई, तो उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाकर विदा ली और अपनी-अपनी राह चल पड़े।
दो अलग ज़िंदगियाँ
बरस बीतते गए।
कृष्ण द्वारका के राजा बन गए, समुद्र किनारे बसी सोने की एक सुंदर नगरी, जो महलों और बाग़ों से भरी थी।
सुदामा ग़रीब ही रहे। वे एक सीधे-सादे, विद्वान व्यक्ति थे, पर उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक छोटी-सी झोंपड़ी में रहते थे, और अक्सर सबके लिए पूरा खाना नहीं होता था। उनके कपड़े पुराने और फटे हुए थे।
एक दिन उनकी पत्नी ने उनसे कहा, "आप हमेशा कहते हैं कि द्वारका के राजा कृष्ण आपके सबसे प्यारे मित्र थे। आप उनसे मिलने क्यों नहीं जाते? वे दयालु और उदार हैं। वे ज़रूर हमारी मदद करेंगे।"
सुदामा संकोची थे। वे अपने मित्र के पास मदद माँगने नहीं जाना चाहते थे। पर उनकी पत्नी बच्चों को लेकर चिंतित थीं। और सुदामा ने सोचा, "कम से कम कृष्ण का चेहरा तो फिर से देख लूँगा।"
"मैं ख़ाली हाथ नहीं जा सकता," उन्होंने कहा। "एक राजा के लिए मैं क्या भेंट ले जाऊँ?"
उनकी पत्नी पड़ोसियों के पास गईं और चार मुट्ठी चिवड़ा, यानी पोहा, उधार ले आईं। उन्होंने उसे पुराने कपड़े के एक छोटे-से टुकड़े में बाँध दिया। उनके पास बस यही था।
सोने के फाटक पर
सुदामा कई दिनों तक पैदल चलकर द्वारका पहुँचे। वहाँ पहुँचकर वे सोने के महलों और फाटक पर खड़े शानदार पहरेदारों को देखते रह गए। उन्होंने अपने धूल भरे पैरों और फटे कपड़ों को देखा, और चिवड़े की छोटी-सी पोटली को बगल में कसकर दबा लिया।
"कृष्ण अब एक बड़े राजा हैं," उन्होंने सोचा। "शायद उन्हें मैं याद भी न होऊँ।"
पर जब कृष्ण ने सुना कि सुदामा नाम का एक ग़रीब ब्राह्मण फाटक पर है, तो वे अपने सिंहासन से उछलकर उठे और जल्दी से उनसे मिलने बाहर आए।
उन्होंने अपने पुराने मित्र को बाँहों में भर लिया और बड़ी देर तक गले लगाए रखा। उनकी आँखों में आँसू थे।
राजा पैर धोते हैं
कृष्ण सुदामा का हाथ पकड़कर उन्हें अंदर ले गए। उन्होंने उन्हें अपने राजसी पलंग पर बिठाया। अपने हाथों से उन्होंने सुदामा के थके, धूल भरे पैर धोए, जबकि महल की रानियाँ उन्हें पंखा झलती रहीं और उनके लिए भोजन लाती रहीं।
दोनों मित्र घंटों अपने पाठशाला के दिनों की बातें करते रहे: वह समय जब वे अपने गुरु के लिए लकड़ियाँ बीनते हुए एक भयानक तूफ़ान में फँस गए थे, और कैसे वे मदद आने तक पूरी रात एक-दूसरे का हाथ थामे रहे थे।
फिर कृष्ण मुस्कुराए। "और मेरे लिए क्या लाए हो, मित्र?"
सुदामा को शर्म आई। जिस राजा के पास सब कुछ है, उसे वे सादे चिवड़े की चंद मुट्ठियाँ कैसे दें? उन्होंने छोटी-सी पोटली अपने पीछे छिपा ली।
पर कृष्ण ने उसे देख लिया। उन्होंने हँसते हुए हाथ बढ़ाकर उसे ले लिया, और पुराने कपड़े की गाँठ खोली।
"चिवड़ा!" उन्होंने कहा, मानो उन्हें दुनिया का सबसे अनमोल ख़ज़ाना मिल गया हो। और उन्होंने बड़े आनंद से एक मुट्ठी खा ली।
उन्होंने दूसरी मुट्ठी की ओर हाथ बढ़ाया। पर रानी रुक्मिणी ने धीरे से उनका हाथ थाम लिया, मानो कह रही हों: एक मुट्ठी काफ़ी है। कृष्ण अपने मित्र को वह सब पहले ही दे चुके थे जिसकी उन्हें ज़रूरत थी।
घर वापसी
सुदामा उस रात महल में रुके। अगली सुबह कृष्ण उनके साथ फाटक तक गए और बड़े प्रेम से उन्हें विदा किया।
उन्होंने सुदामा को घर ले जाने के लिए कुछ नहीं दिया। और सुदामा ने, जिन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा था, कुछ नहीं माँगा। वे ख़ुशी-ख़ुशी लौट चले, यह सोचते हुए, "मेरा मित्र कितना दयालु है। उन्होंने मुझे धन नहीं दिया, शायद इसलिए कि मुझे घमंड न हो जाए।"
पर जब सुदामा अपने गाँव पहुँचे, तो उन्हें अपनी छोटी-सी झोंपड़ी नहीं मिली।
उसकी जगह एक सुंदर घर खड़ा था, महल की तरह चमकता हुआ, चारों ओर बाग़ों से घिरा। उनकी पत्नी और बच्चे सुंदर कपड़ों में, ख़ुशी से हँसते हुए उनसे मिलने बाहर आए।
कृष्ण ने चुपचाप, बिना एक शब्द कहे, अपने मित्र को सब कुछ दे दिया था, ताकि सुदामा को कभी यह महसूस न करना पड़े कि उन्होंने माँगा था।
सुदामा ने आँखों में आँसू भरे अपना नया घर देखा। पर वे सादगी से ही रहे, जैसे हमेशा रहते आए थे। उनके लिए सबसे क़ीमती चीज़ धन नहीं था। वह यह जानना था कि इतने बरसों बाद भी उनका मित्र उन्हें उतना ही प्यार करता था।
इस कहानी के बारे में
यह कहानी भागवत पुराण के दसवें स्कंध से है, जो भारत के सबसे प्रिय पवित्र ग्रंथों में से एक है। मूल ग्रंथ में कृष्ण के ग़रीब मित्र को बस एक ब्राह्मण मित्र कहा गया है; सुदामा नाम बाद की परंपरा से आया है, जिसमें यह कहानी अनगिनत बार गाई, चित्रित और दोबारा सुनाई गई है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।