मालिक और नौकर
सर्दियों की एक दोपहर एक अमीर व्यापारी और उसका नौकर एक सौदा पक्का करने स्लेज पर निकलते हैं। फिर बर्फ़ीला तूफ़ान आ जाता है। बर्फ़ में बीती एक रात की, और एक आदमी आख़िरकार अपने बारे में जो जान पाता है उसकी, टॉल्स्टॉय की महान कहानी।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- Classic retold
- 1870s Russia
ध्यान दें: इस कहानी में एक जानलेवा बर्फ़ीला तूफ़ान और एक मृत्यु है।
सर्दियों की उस दोपहर वसीली आंद्रेयेविच ब्रेख़ुनोव के दिमाग़ में बस एक ही ख़याल था, और वह था पैसा।
वह रूस के एक गाँव का व्यापारी था, मीलों दूर तक का सबसे अमीर आदमी। उसकी एक सराय थी, एक दुकान थी और ढेर सारी ज़मीन, और वह हमेशा और की तलाश में रहता। अब उसने सुना था कि एक ज़मींदार पेड़ों का एक झुरमुट सस्ते में बेचना चाहता है। अगर वह आज ही, किसी और से पहले, चला जाए, तो बढ़िया मुनाफ़ा कमा सकता था।
मौसम बिगड़ रहा था। उसकी पत्नी ने रुक जाने की मिन्नत की। पर वसीली आंद्रेयेविच रुकने वाला नहीं था। उसने अपनी स्लेज मँगवाई, और अपने कामगार निकिता को बुलाया।
नौकर
निकिता कोई पचास बरस का था, धीमी आवाज़ वाला एक भला किसान, जो हर काम कर लेता था और कभी शिकायत नहीं करता था। कभी वह बहुत शराब पीता था, पर उसने छोड़ दी थी। वह साल भर वसीली आंद्रेयेविच के यहाँ काम करता था।
उसका मालिक उसे ठगता था। वह निकिता को उसके काम की असली क़ीमत के आधे से भी कम देता, और वह भी ज़्यादातर अपनी ही दुकान के सामान के रूप में, अपने ही तय किए दामों पर। निकिता यह जानता था। पर उसे परिवार का पेट पालना था, जाने को कोई बेहतर जगह नहीं थी, और उसे झगड़ा करना पसंद नहीं था। इसलिए वह चुप रहता।
निकिता ने मुख़ोर्ती को जोता, वह मज़बूत कुम्मैत घोड़ा जिससे उसे बहुत प्यार था, अपना पुराना कोट पहना और अपने मालिक के बगल में स्लेज पर चढ़ गया, जो दो-दो फ़र के कोटों में लिपटा था।
सफ़ेदी में भटकते हुए
वे खुले खेतों के पार चल पड़े। जल्द ही हवा तेज़ हो गई। बर्फ़ सड़क पर घूमती हुई उड़ने लगी और रास्ते के निशान छिप गए। थोड़ी ही देर में उन्हें बिल्कुल नहीं दिख रहा था कि सड़क किधर जाती है।
वे राह से भटक गए और संयोग से एक गाँव जा पहुँचे। वे फिर चले, फिर रास्ता भूले और, हैरानी की बात, ठीक उसी गाँव में लौट आए। वहाँ एक परिवार ने उन्हें भीतर बुलाया, अँगीठी के पास गर्माया और चाय पिलाई। मेज़बान ने मिन्नत की कि वे रात वहीं रुक जाएँ।
निकिता का बहुत मन था रुकने का। पर वसीली आंद्रेयेविच ने झुरमुट के बारे में सोचा, मुनाफ़े के बारे में, और दूसरे ख़रीदारों के बारे में। उसने ज़िद की कि वे आगे बढ़ें।
तो वे फिर तूफ़ान में निकल पड़े। अँधेरा हो रहा था। जल्द ही वे फिर भटक गए, और इस बार पूरी तरह। मुख़ोर्ती को रास्ता नहीं मिल रहा था। आख़िरकार वे एक सुनसान खेत के बीचोंबीच रुक गए, और उनके चारों ओर बर्फ़ जमा होती गई।
लंबी रात
निकिता से जो बन पड़ा, उसने किया। उसने एक डंडे पर निशानी के लिए कपड़ा बाँधा, घोड़े को ढका, और स्लेज के पिछले हिस्से में थोड़े-से पुआल पर बैठ गया। अपने पतले कोट में वह हड्डियों तक ठिठुर रहा था। ईश्वर जो भी भेजे, उसके लिए वह चुपचाप तैयार था। अगर वह मर भी गया, उसने सोचा, तो यह कोई बहुत बुरी बात नहीं होगी।
वसीली आंद्रेयेविच को चैन नहीं आ रहा था। वह अपने गर्म फ़र में स्लेज पर बैठा अपने पैसे, अपनी ज़मीन और अपनी योजनाओं का हिसाब लगाता रहा। उसे अपनी बनाई हर चीज़ पर घमंड था। वह यहाँ, बर्फ़ से ढके खेत में, चंद पेड़ों की ख़ातिर मरना नहीं चाहता था।
आख़िरकार डर ने उसे जकड़ लिया। एक शब्द कहे बिना, वह घोड़े पर चढ़ा और अँधेरे में निकल गया, निकिता को पीछे स्लेज में छोड़कर।
वह ज़्यादा दूर नहीं गया। घोड़ा बर्फ़ में भटकता रहा, और वे एक चक्कर में घूम गए। वसीली आंद्रेयेविच यह देखकर सहम गया कि वह वहीं लौट आया है जहाँ से चला था, स्लेज के पास। घोड़ा उसे वापस ले आया था।
गर्माहट
निकिता बर्फ़ से ढका स्लेज में पड़ा था। उसने कमज़ोर आवाज़ में मालिक से कहा कि वह मर रहा है। उसने कहा कि उसकी बक़ाया मज़दूरी उसके परिवार को दे दी जाए, और उसे माफ़ कर दिया जाए।
वसीली आंद्रेयेविच एक पल खड़ा उसे देखता रहा।
फिर, बिना सोचे, उसने कुछ ऐसा किया जो उसने ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। उसने निकिता के ऊपर से बर्फ़ हटाई। उसने अपने फ़र के कोट खोले और अपने नौकर के ऊपर लेट गया, उसे गर्म रखने के लिए अपने ही शरीर से ढक लिया।
वहाँ लेटे-लेटे उसने महसूस किया कि उसके नीचे निकिता गर्म हो रहा है। और वसीली आंद्रेयेविच पर एक अजीब-सी ख़ुशी छा गई। अब उसे न पैसे का ख़याल था, न झुरमुट का, न अपनी दुकान का। उसे बस यह महसूस हो रहा था कि निकिता ज़िंदा है, और किसी तरह वह ख़ुद भी। वह चुपचाप लेटा रहा, उसका दिल भरा हुआ था, और बर्फ़ दोनों को ढकती रही।
सुबह
सुबह किसानों को स्लेज बर्फ़ के एक ढेर में दबी मिली, एक गाँव से बस थोड़ी ही दूर।
वसीली आंद्रेयेविच मर चुका था, जहाँ लेटा था वहीं जमकर। मुख़ोर्ती भी रात में मर गया था। पर अपने मालिक के शरीर के नीचे, निकिता ज़िंदा था।
पाले की वजह से उसके पैर की कुछ उँगलियाँ जाती रहीं। पर वह बीस बरस और जिया, पहले की तरह काम करता रहा। जब उसका समय आया, तो वह घर पर, देव-प्रतिमाओं के नीचे, अपने परिवार के बीच शांति से चल बसा।
इस कहानी के बारे में
लियो टॉल्स्टॉय (1828–1910), युद्ध और शांति और आन्ना करेनिना के रूसी लेखक, ने "मालिक और नौकर" 1895 में लिखी, अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दौर में, जब वे आस्था, मृत्यु और दूसरों के लिए प्रेम के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लिख रहे थे। यह संस्करण एक छोटी, सरल पुनर्कथा है।