मुल्ला नसरुद्दीन और कोट
मुल्ला नसरुद्दीन अपने धूल भरे काम के कपड़ों में एक अमीर आदमी की दावत में पहुँचते हैं, और कोई उन्हें बैठने तक को नहीं कहता। तो वे कपड़े बदलने घर जाते हैं, और लौटकर पूरी महफ़िल को एक सबक़ सिखाते हैं।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 8+
- Fable & folk tale
- Medieval Anatolia
पूरे शहर को पता था कि सबसे अमीर सौदागर एक दावत दे रहा है।
हफ़्ते भर से उसके घर पर गाड़ियाँ आ रही थीं, जिनमें चावल की बोरियाँ, ख़ूबानियों की टोकरियाँ और ताँबे के बड़े-बड़े देग लदे थे। दावत की रात उसके बाग़ के हर पेड़ पर लालटेनें टँगी थीं, और भुनते गोश्त और केसर की ख़ुशबू गली तक तैर रही थी।
सबको बुलाया गया था। और ज़ाहिर है, उनमें मुल्ला नसरुद्दीन भी थे।
सीधे खेतों से
नसरुद्दीन ने दिन भर एक पड़ोसी की दीवार ठीक करवाने में मदद की थी। जब तक उन्हें दावत याद आई, सूरज ढलने लगा था। घर जाकर कपड़े बदलने का समय नहीं था।
तो उन्होंने अपने पुराने कोट से, जिसकी दोनों कोहनियों पर पैबंद लगे थे और किनारी उधड़ी हुई थी, सबसे ज़्यादा धूल झाड़ी, और जैसे थे वैसे ही सौदागर के घर चल दिए।
दरवाज़े पर एक नौकर ने उन्हें सिर से पाँव तक देखा और बिना एक शब्द कहे अंदर जाने दिया।
अंदर बड़ा कमरा रेशम और बढ़िया ऊन पहने लोगों से भरा था। फ़र्श पर क़ालीन बिछे थे। दीवारों के साथ गाव-तकिए लगे थे। बीच में, एक लंबे सफ़ेद दस्तरख़्वान पर, पकवान सजाए जा रहे थे: घी से चमकता पुलाव, दही के कटोरे, तंदूर से अभी-अभी निकली गरम रोटियाँ, और चीनी बुरकी मिठाइयों की तश्तरियाँ।
नसरुद्दीन दरवाज़े पर खड़े होकर इंतज़ार करने लगे कि कोई उन्हें किसी जगह तक ले जाए।
कोई नहीं आया।
जैसे दिखते ही न हों
वे कमरे के एक कोने में गए। वहाँ बैठे मेहमानों ने ज़रा-सा कंधा फेर लिया और बातें करते रहे। वे दूसरे कोने में गए। एक आदमी ने अपना गाव-तकिया इस तरह खिसका लिया कि उसके पास कोई जगह ही न बचे।
मेज़बान, किसी बड़े मेहमान के साथ हँसता हुआ, ठीक उनके पास से गुज़र गया, और उसने उनकी तरफ़ देखा तक नहीं।
नौकर सबसे अच्छे पकवान दस्तरख़्वान के ऊपरी सिरे पर ले गए, जहाँ क़ाज़ी और साहूकार बैठे थे। नसरुद्दीन दरवाज़े के पास खड़े रह गए, जहाँ से ठंडी हवा आती थी, और उनके सामने खाने की ख़ुशबू के सिवा कुछ नहीं था।
उन्होंने थोड़ी देर और इंतज़ार किया। फिर वे चुपचाप बाहर निकल आए।
कपड़े बदले
नसरुद्दीन घर गए, मुँह-हाथ धोए, और पलंग के पैताने रखा लकड़ी का पुराना संदूक़ खोला।
उसकी तली में, कपड़े में लिपटी, उनकी इकलौती बढ़िया चीज़ रखी थी: गहरे नीले ऊन का एक लंबा कोट, जिसके कॉलर और कफ़ पर सुनहरे धागे की कढ़ाई थी। यह बरसों पहले किसी ने तोहफ़े में दिया था। वे इसे शायद ही कभी पहनते थे।
उन्होंने उसे पहना। सिर पर एक साफ़ सफ़ेद पगड़ी बाँधी। एक पल के लिए दीवार पर टँगे छोटे-से आईने में ख़ुद को देखा। फिर वे दावत में लौट आए।
इस बार दरवाज़े वाला नौकर झुककर सलाम करने लगा और उनके आने की ख़बर देने आगे दौड़ा।
मेज़बान ख़ुद बाँहें फैलाए कमरे के उस पार से आया। "मुल्ला! आइए, आइए! क्या इज़्ज़त बख़्शी आपने! आइए, यहाँ बैठिए, मेरे पास।"
वह नसरुद्दीन को दस्तरख़्वान के ऊपरी सिरे पर सबसे अच्छी जगह ले गया और सबसे नरम गाव-तकिए पर बिठाया। बाक़ी मेहमान खिसककर जगह बनाने लगे। एक नौकर पुलाव की तश्तरी लेकर दौड़ा आया, फिर दूसरा भुना गोश्त लेकर, फिर भाप उड़ाता, ख़ुशबूदार शोरबे का एक प्याला।
खा, मेरे कोट!
कमरे में ख़ामोशी छा गई, सब इंतज़ार कर रहे थे कि ख़ास मेहमान खाना शुरू करें।
नसरुद्दीन ने शोरबे का प्याला उठाया। एक पल उसे देखा। फिर, बड़ी सावधानी से, उसमें से थोड़ा-सा अपने नीले कोट की कढ़ाई वाली आस्तीन पर उँडेल दिया।
उन्होंने मुट्ठी भर चावल लिए और अपनी जेब में भर लिए। गोश्त का एक टुकड़ा उठाया और धीरे से अपने कॉलर में खोंस दिया।
"खा, मेरे कोट," उन्होंने प्यार से कहा। "खा! खा!"
मेज़बान उन्हें घूरने लगा। मेहमान उन्हें घूरने लगे।
"मुल्ला," आख़िर मेज़बान ने कहा, "आप यह क्या कर रहे हैं?"
नसरुद्दीन ने बिल्कुल शांत होकर ऊपर देखा।
"एक घंटा पहले," उन्होंने कहा, "मैं अपने पुराने कोट में इस घर आया था, और किसी ने मुझे रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं पूछा। अब मैं यह कोट पहनकर लौटा हूँ, और मुझे कमरे की सबसे अच्छी जगह और सबसे अच्छा खाना दिया जा रहा है। तो मुझे साफ़ समझ आ गया कि आज रात आपने नसरुद्दीन को नहीं बुलाया था। आपने कोट को बुलाया था। कम से कम मैं इतना तो कर ही सकता हूँ कि उसे उसका खाना मिल जाए।"
महफ़िल ने क्या सुना
पहले कोई नहीं हँसा। जिस आदमी ने अपना गाव-तकिया खिसकाया था, उसने अपनी थाली की तरफ़ नज़रें झुका लीं। मेज़बान का चेहरा लाल हो गया।
फिर, धीरे-धीरे, मेज़बान थोड़ा शर्मिंदा होकर मुस्कुराने लगा। उसने नसरुद्दीन का हाथ थामा, और कहा कि उससे बेवक़ूफ़ी हुई, और उनसे माफ़ करने और खाना खाने की गुज़ारिश की।
कहते हैं कि नसरुद्दीन ने खाया, और बड़े मज़े से खाया। और कहते हैं कि सौदागर की अगली दावत में, दस्तरख़्वान के ऊपरी सिरे के पास हर उस आदमी के लिए एक जगह रखी गई जो काम से धूल में सना हुआ आए।
इस कहानी के बारे में
नसरुद्दीन होजा, जिन्हें दक्षिण एशिया में मुल्ला नसरुद्दीन के नाम से जाना जाता है, हज़ारों कहानियों के समझदार मसख़रे हैं, जो तुर्की से ईरान, मध्य एशिया और भारत तक सुनाई जाती हैं। हो सकता है इस नाम के कोई असली उस्ताद तेरहवीं सदी में अनातोलिया में रहे हों, पर ज़्यादातर कहानियाँ सैकड़ों सालों में कहानी सुनाने वालों ने जोड़ीं। यह उनमें से सबसे मशहूर कहानियों में से एक है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।