वह जो रुकी रही
सितंबर 1986 में, कराची में हथियारबंद लोगों ने यात्रियों से भरे एक विमान पर क़ब्ज़ा कर लिया। केबिन क्रू की प्रमुख बंबई की एक नौजवान लड़की थी, जिसका तेईसवाँ जन्मदिन दो दिन दूर था। नीरजा भनोट ने आख़िरी पल तक अपना फ़र्ज़ निभाया।
- 3 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- True story
- 1980s
ध्यान दें: इस कहानी में एक विमान अपहरण, गोलीबारी, और यात्रियों की तथा ख़ुद नीरजा की मृत्यु का ज़िक्र है। इसे नरमी से, बिना भयानक ब्यौरों के सुनाया गया है।
सुबह-सुबह कराची हवाई अड्डे की हवाई पट्टी पर बड़ा जेट विमान खड़ा था। यात्री अभी भी अपनी सीटों पर बैठ रहे थे। उड़ान बंबई से आई थी, और आगे फ़्रैंकफ़र्ट और न्यूयॉर्क जाने वाली थी।
तभी एक वैन विमान के पास आकर रुकी। उसमें से चार आदमी कूदे, हवाई अड्डे के सुरक्षा गार्डों जैसे कपड़े पहने। उनके पास बंदूक़ें थीं। वे दौड़ते हुए सीढ़ियाँ चढ़े और विमान के भीतर घुस गए।
यह 5 सितंबर 1986 का दिन था। पैन ऍम फ़्लाइट 73 में यात्री और क्रू मिलाकर लगभग चार सौ लोग सवार थे। और केबिन क्रू की प्रमुख बाईस बरस की थी।
बंबई की एक लड़की
उसका नाम था नीरजा भनोट। उसका जन्म 1963 में चंडीगढ़ में हुआ और वह बंबई में बड़ी हुई, जहाँ उसके पिता पत्रकार थे। वह हँसमुख और मिलनसार थी, उसे फ़िल्में और संगीत पसंद थे, और उसने विज्ञापनों में मॉडल के रूप में काम किया था।
एक कम उम्र की दुखभरी शादी टूट चुकी थी, और वह अपने माता-पिता के पास घर लौट आई थी। फिर उसने अमेरिकी एयरलाइन पैन ऍम में फ़्लाइट अटेंडेंट की ट्रेनिंग ली, और थोड़े ही समय में तरक़्क़ी करके सीनियर पर्सर बन गई, यानी अपनी उड़ानों पर केबिन क्रू की अगुवा।
पहली चेतावनी
जब बंदूक़धारी भीतर घुसे, नीरजा ने फ़ौरन क़दम उठाया। उसने कॉकपिट को अपहरण का तय संकेत भेज दिया।
उसकी चेतावनी की वजह से कॉकपिट में बैठे तीनों पायलट छत के एक दरवाज़े से निकल भागने में कामयाब रहे। उनके बिना विमान उड़ान नहीं भर सकता था। अपहरणकर्ता उसे ज़बरदस्ती किसी दूसरे देश ले जाना चाहते थे। अब वह ज़मीन पर ही अटका था।
अपहरणकर्ता एक उग्रवादी गुट के थे। उन्होंने विमान उड़ाने के लिए नया क्रू माँगा। ज़मीन पर अधिकारी उनसे बात करते रहे और घंटे बीतते गए। शुरू में ही उन्होंने एक नौजवान यात्री को गोली मार दी और उसे दरवाज़े से बाहर धकेल दिया, यह दिखाने के लिए कि वे मज़ाक़ नहीं कर रहे।
पासपोर्ट
अपहरणकर्ताओं ने केबिन क्रू को सबके पासपोर्ट इकट्ठा करने का हुक्म दिया। वे विमान में सवार अमेरिकियों को ढूँढ़ना चाहते थे।
नीरजा और दूसरी अटेंडेंट क़तार-दर-क़तार गईं और पासपोर्ट जमा किए। पर उन्होंने चुपचाप उनमें से बहुत-से, ख़ासकर अमेरिकी पासपोर्ट, सीटों के नीचे और कूड़े की एक नली में छिपा दिए, ताकि अपहरणकर्ता उन यात्रियों को छाँट न सकें।
उस लंबे, गर्म दिन भर क्रू काम करता रहा। उन्होंने खाना और पानी बाँटा। उन्होंने डरे हुए यात्रियों को ढाढ़स बँधाया, जिनमें छोटे बच्चों वाले बहुत-से परिवार भी थे। उन्होंने अपना काम ऐसे किया जैसे यह कोई आम उड़ान हो, जबकि यह कुछ भी आम नहीं थी।
बत्तियाँ बुझ गईं
यह गतिरोध लगभग सोलह घंटे चला। जैसे-जैसे शाम रात में बदली, विमान की बिजली जवाब देने लगी। बत्तियाँ मद्धम हुईं, और फिर बुझ गईं।
अँधेरे में अपहरणकर्ता घबरा गए। वे भरे हुए केबिन में गोलियाँ चलाने लगे और विस्फोटक फोड़ने लगे।
उस अफ़रातफ़री में नीरजा ने एक आपातकालीन दरवाज़ा खोल दिया। बचाव की स्लाइड खुलकर नीचे बिछ गई, और वह यात्रियों को बाहर रात में उतारने लगी। वह ख़ुद स्लाइड से नीचे उतरकर सुरक्षित हो सकती थी। उसने ऐसा नहीं किया। वह वहीं रुकी रही, लोगों को बाहर निकालती रही।
बचे हुए लोगों के बयानों के मुताबिक़, जब उसे गोली लगी, तब वह तीन बच्चों को गोलियों से बचाने के लिए उनकी ढाल बनी हुई थी।
विमान में सवार ज़्यादातर लोग बच निकले। पर उस रात लगभग बीस लोगों की जान चली गई। नीरजा उनमें से एक थी। दो दिन बाद उसका तेईसवाँ जन्मदिन होता।
याद
अपहरणकर्ता पकड़े गए और बाद में जेल भेजे गए।
भारत ने नीरजा को अशोक चक्र से सम्मानित किया, जो शांति के समय में बहादुरी का देश का सबसे बड़ा सम्मान है। वह इसे पाने वाली अब तक की सबसे कम उम्र की इंसान थी। पाकिस्तान और अमेरिका ने भी उसे सम्मानित किया। बरसों बाद, 2004 में, भारत ने उसकी याद में एक डाक टिकट जारी किया।
उसके परिवार ने बीमे की रक़म और अपनी जमा-पूँजी से उसके नाम पर एक ट्रस्ट बनाया। हर साल यह ट्रस्ट नीरजा भनोट पुरस्कार उन औरतों को देता है जिन्होंने अन्याय के सामने साहस दिखाया हो, अक्सर ऐसी औरतें जो घर में होने वाली क्रूरता के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं, जैसे वह कभी ख़ुद खड़ी हुई थी।
2016 में नीरजा नाम की एक हिंदी फ़िल्म ने उसकी कहानी नई पीढ़ी तक पहुँचाई। उसे देखने वाले बहुत-से लोग कराची की उस रात के बहुत बाद पैदा हुए थे।
उन्होंने वही सीखा जो उन यात्रियों ने सीखा था। जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब उस नौजवान प्रमुख ने साथ नहीं छोड़ा।
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भारत सरकार की गैलेंट्री अवॉर्ड्स वेबसाइट पर उसके अशोक चक्र का ब्यौरा दर्ज है। सितंबर 1986 में भारत और दुनिया भर के अख़बारों ने अपहरण की विस्तार से ख़बरें छापीं, और 2016 की फ़िल्म नीरजा उसकी ज़िंदगी पर आधारित है।