प्रह्लाद की आस्था
दुनिया का सबसे शक्तिशाली राजा आदेश देता है कि सब सिर्फ़ उसी की पूजा करें। सिर्फ़ एक व्यक्ति मना करता है, और वह है उसका अपना छोटा-सा बेटा। राजा कुछ भी कर ले, वह बालक को न डरा पाता है, न उसका प्रेम रोक पाता है।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 8+
- Classic retold
- The Vishnu Purana and the Bhagavata Purana
ध्यान दें: इस कहानी में एक पिता है जो अपने बेटे को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश करता है, और एक क्रूर राजा का अंत।
राजा अपने सिंहासन पर आगे झुका और अपने छोटे बेटे की ओर देखकर मुस्कुराया।
"बताओ," उसने कहा, "तुम्हारे गुरु ने तुम्हें सबसे अच्छी बात क्या सिखाई है?"
बालक ने बिना डरे जवाब दिया। उसने कहा कि उसने सबसे अच्छी बात यह सीखी है कि विष्णु से प्रेम करो, जिनका न कोई आदि है न अंत, और जो हर प्राणी में बसते हैं।
राजा के चेहरे से मुस्कान ग़ायब हो गई।
वह राजा जो भगवान बनना चाहता था
राजा का नाम हिरण्यकशिपु था, दैत्यों का शक्तिशाली शासक। लंबी और कठोर तपस्या से उसने बड़ी शक्तियाँ पाई थीं। उसने धरती, आकाश और पाताल लोकों को जीत लिया था, और देवताओं को उनके घरों से निकाल दिया था।
अब उसने एक क़ानून बनाया। कोई किसी देवता की पूजा नहीं करेगा। सबको उसकी पूजा करनी होगी।
ज़्यादातर लोगों ने डर के मारे बात मान ली। पर उसके अपने महल में कोई था जिसने नहीं मानी: उसका बेटा, प्रह्लाद।
धीरजवान शिष्य
प्रह्लाद को राज्य के सबसे अच्छे गुरु के पास भेजा गया। वह विनम्र और ध्यान देने वाला था, और उसे जो कुछ सिखाया गया, उसने सब सीखा। पर जब भी कोई उससे पूछता कि सबसे ज़रूरी क्या है, वह हमेशा एक ही जवाब देता। विष्णु हर चीज़ में हैं, वह कहता, गुरु में, राजा में, यहाँ तक कि उन लोगों में भी जो विष्णु से नफ़रत करते हैं।
गुरु डर से काँप उठे। उन्होंने बालक को डाँटा और उसे फिर से पढ़ाया। फिर भी प्रह्लाद ने उसी नरमी से वही जवाब दिया।
आख़िरकार राजा का धीरज टूट गया। अगर उसका बेटा आज्ञा नहीं मानेगा, उसने कहा, तो उसके बेटे को मिटा देना होगा।
उसे कुछ छू न सका
आगे जो हुआ, वह पुराने ग्रंथों में चमत्कारों की एक लड़ी की तरह सुनाया गया है।
राजा के सैनिक हथियार लेकर प्रह्लाद पर टूट पड़े, पर हथियार टूट गए और उसे चोट न पहुँचा सके। उस पर साँप छोड़े गए, पर वे उसका कुछ न बिगाड़ सके। बड़े-बड़े हाथी उसे कुचलने भेजे गए, पर वे भी नहीं कुचल सके। उसे आग में डाला गया, और लपटें उसे ठंडी लगीं, जैसे कमल की पंखुड़ियों का बिछौना।
इस पूरे समय प्रह्लाद न चिल्लाया, न लड़ा। उसने अपना मन विष्णु पर टिकाए रखा, और उसके मन में कोई नफ़रत नहीं थी, उनके लिए भी नहीं जो उसे चोट पहुँचा रहे थे।
वह बालक जिसने अपने दुश्मनों के लिए प्रार्थना की
फिर राजपुरोहितों ने बालक को नष्ट करने के लिए एक भयानक मंत्र-प्रयोग किया। पर वह प्रयोग उल्टा पुरोहितों पर ही लौट आया, और वे ज़मीन पर गिर पड़े।
प्रह्लाद ख़ुश नहीं हुआ। वह दौड़कर उनके पास गया और प्रार्थना करने लगा। उसने कहा कि अगर उसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, अगर वह सबमें विष्णु को देखता है, उनमें भी जो उसे चोट पहुँचाना चाहते हैं, तो ये पुरोहित जीवित हो जाएँ।
और पुरोहित उठ खड़े हुए, जीवित और भले-चंगे। उन्होंने बालक को आशीर्वाद दिया और राजा के पास लौट गए।
समुद्र और पहाड़
फिर भी राजा ने हार नहीं मानी। उसने बेटे के खाने में ज़हर मिलवाया, पर उससे उसे कोई नुक़सान नहीं हुआ। उसने उसे महल की ऊँची दीवारों से नीचे फिंकवाया, पर धरती ने उसे कोमलता से थाम लिया।
आख़िर में प्रह्लाद को बाँधकर समुद्र में फेंक दिया गया, और उसके ऊपर बड़ी-बड़ी चट्टानें लाद दी गईं।
पानी के गहरे तल में बालक ने पूरे मन से प्रार्थना की। और विष्णु उसके सामने प्रकट हुए। रस्सियाँ खुल गईं, चट्टानें लुढ़ककर हट गईं, और प्रह्लाद समुद्र से ऊपर उठ आया।
दो वरदान
विष्णु बालक से प्रसन्न हुए और उससे वरदान माँगने को कहा।
प्रह्लाद ने बस इतना माँगा कि विष्णु के प्रति उसका प्रेम कभी कम न हो, इस जीवन में भी, किसी और जीवन में भी।
विष्णु ने वह वर दे दिया, और एक और वरदान माँगने को कहा।
इस बार प्रह्लाद ने कुछ ऐसा माँगा जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उसके पिता ने उससे नफ़रत की थी और बार-बार उसे चोट पहुँचाने की कोशिश की थी। प्रह्लाद ने माँगा कि उसके पिता को इसके लिए क्षमा मिल जाए, और वे उस पाप से मुक्त हो जाएँ।
विष्णु ने वह भी दे दिया।
क्रूर राजा का अंत
भागवत पुराण में यह कहानी एक प्रसिद्ध दृश्य के साथ ख़त्म होती है। राजा ने बेटे का मज़ाक़ उड़ाते हुए पूछा कि क्या उसका यह विष्णु सामने वाले पत्थर के खंभे में भी है। उसने खंभे पर प्रहार किया। उसमें से नरसिंह प्रकट हुए, विष्णु का एक रूप जो आधा मनुष्य और आधा सिंह था, और राजा की क्रूरता का लंबा राज आख़िरकार ख़त्म हो गया।
उसके बाद प्रह्लाद राजा बना। उसने दया से राज किया, और विष्णु से प्रेम करना कभी नहीं छोड़ा।
इस कहानी के बारे में
प्रह्लाद की कहानी विष्णु पुराण के पहले भाग में सुनाई गई है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद एच. एच. विल्सन ने 1840 में किया था, और भागवत पुराण के सातवें स्कंध में भी, जिसमें नरसिंह और खंभे का वर्णन है। प्रह्लाद की बुआ होलिका की कहानी, जिसने उसे जलाने की कोशिश की और ख़ुद जल गई, बाद की परंपरा से आती है और हर साल होली के त्योहार पर याद की जाती है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।