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Epics

सावित्री और सत्यवान

एक राजकुमारी वन के एक आश्रम में रहने वाले युवक से विवाह करना चुनती है, तब भी जब एक ऋषि उसे बताते हैं कि उसके पास जीने को सिर्फ़ एक साल है। जब आख़िरी दिन आता है, तो वह उसके साथ वन में जाती है, और उसका साथ नहीं छोड़ती।

  • 4 मिनट की कहानी
  • Ages 10+
  • Classic retold
  • The Mahabharata

ध्यान दें: इस कहानी में एक युवा पति की मृत्यु है, और मृत्यु के देवता यमराज से एक भेंट।

इस भाषा में पढ़ें

युवक पेड़ों के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखे लेटा था, और उसकी साँसें धीमी और शांत होती जा रही थीं।

सावित्री चीख़ी नहीं। उसे पूरे एक साल से पता था कि यह दोपहर आएगी। और अब, वन की ढलती रोशनी में, उसने ऊपर देखा तो एक लंबी आकृति को अपने सामने खड़ा पाया, लाल वस्त्र पहने, हाथ में फंदा लिए।

वे यमराज थे, मृत्यु के देवता।

राजकुमारी जिसने ख़ुद चुना

उस दिन से बहुत पहले, मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। बरसों उन्होंने प्रार्थना की, और आख़िरकार उनके घर एक बेटी का जन्म हुआ। उन्होंने उसका नाम सावित्री रखा।

वह इतनी तेजस्वी और गरिमामयी बनकर बड़ी हुई कि दूसरे राज्यों के राजकुमार उससे झिझकते थे। कोई उसका हाथ माँगने नहीं आया। तो उसके पिता ने कुछ ऐसा किया जो उस ज़माने में अनोखा था। उन्होंने उससे कहा कि वह यात्रा करे, ख़ुद देखे, और अपना पति ख़ुद चुने।

सावित्री राजा के बूढ़े मंत्रियों के साथ निकली, आश्रमों और वनों में घूमी। जब वह घर लौटी, तो उसने पिता को अपना फ़ैसला बताया।

उसने कहा कि वन के एक आश्रम में द्युमत्सेन नाम के एक राजा रहते हैं। उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी, और दुश्मनों ने उनका राज्य छीन लिया था, इसलिए अब वे अपनी पत्नी और बेटे के साथ जंगल में रहते थे। बेटे का नाम सत्यवान था। वह सच्चा, नम्र और दयालु था। सावित्री ने उसे चुना था।

ऋषि की चेतावनी

उस समय नारद मुनि राजा के पास बैठे थे। नाम सुनते ही उनका चेहरा उतर गया।

नारद ने कहा कि सत्यवान में हर अच्छा गुण है। पर एक भयानक बात है। ठीक एक साल बाद, आज ही के दिन, सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी।

राजा ने बेटी से विनती की कि वह दोबारा चुने।

सावित्री एक पल चुप रही। फिर उसने कहा कि इंसान एक ही बार चुनता है। उसने अपना दिल दे दिया है, और वह उसे वापस नहीं लेगी, चाहे उसके पति की उम्र लंबी हो या छोटी।

नारद ने देखा कि वह अपने निश्चय से नहीं हटेगी, और उन्होंने इस विवाह को आशीर्वाद दिया।

वन में एक साल

तो सावित्री ने सत्यवान से विवाह किया और आश्रम में रहने चली गई। उसने अपने गहने और सुंदर वस्त्र उतार रखे और वन के लोगों की तरह सादे कपड़े पहनने लगी। उसने अपने नेत्रहीन ससुर और अपनी सास की सेवा की, और सब उसे प्यार करने लगे।

पर वह नारद के शब्द कभी नहीं भूली। चुपचाप वह दिन गिनती रही।

जब सिर्फ़ तीन दिन बचे, तो उसने एक कठिन व्रत शुरू किया, दिन-रात खड़ी रहकर, कुछ भी खाए बिना। उसके सास-ससुर चिंतित हुए, पर वह नहीं रुकी।

आख़िरी सुबह, सत्यवान ने लकड़ी काटने के लिए अपनी कुल्हाड़ी उठाई। सावित्री ने साथ चलने की इजाज़त माँगी। उसने पहले कभी ऐसा नहीं माँगा था। सत्यवान मान गया, और दोनों साथ-साथ घने वन में चले गए।

काम करते-करते सत्यवान के सिर में अचानक तेज़ दर्द उठा। उसे कमज़ोरी महसूस हुई, और वह लेट गया। सावित्री ज़मीन पर बैठ गई और उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।

तभी यमराज आए।

मृत्यु के साथ चलना

यमराज ने उससे स्नेह से कहा कि सत्यवान का समय आ गया है। उन्होंने सत्यवान के प्राण निकाले, अँगूठे से बड़ा नहीं एक नन्हा-सा रूप, और दक्षिण की ओर, अपने लोक की तरफ़ चल पड़े।

सावित्री उठी और उनके पीछे चल दी।

यमराज ने उससे लौट जाने को कहा। एक पत्नी जो कुछ कर सकती थी, वह सब उसने कर दिया था। पर सावित्री चलती रही, और चलते-चलते बोलती रही। उसने मित्रता के बारे में बात की, और इस बारे में कि अच्छे लोग कैसे दुनिया को थामे रखते हैं, और कैसे साथ चले गए कुछ क़दम भी दो लोगों को मित्र बना देते हैं।

यमराज उसकी बातों से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे एक वरदान देने को कहा, उसके पति के प्राणों के सिवा कुछ भी।

उसने अपने ससुर की आँखों की रोशनी लौटाने का वर माँगा। यमराज ने वह दे दिया। और वह फिर भी चलती रही।

उन्होंने दूसरा वरदान देने को कहा। उसने माँगा कि उसके ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें लौटा दिया जाए। यमराज ने वह भी दे दिया। और वह फिर भी चलती रही।

उन्होंने तीसरा वरदान देने को कहा। उसने माँगा कि उसके अपने पिता को, जिनकी इकलौती संतान वही थी, कई बेटों का आशीर्वाद मिले। दे दिया गया।

हर क़दम के साथ उसकी बातें और गहरी होती गईं, और यमराज का मन पिघल गया। उन्होंने चौथा वरदान देने को कहा। सावित्री ने अपनी कई संतानें माँगीं, सत्यवान की संतानें।

यमराज ने बिना सोचे वह वर दे दिया।

आख़िरी वरदान

तब सावित्री ने नरमी से कहा कि ऐसा वरदान उसके पति के बिना कभी पूरा नहीं हो सकता। और इस तरह उसने वह एक चीज़ माँगी जो वह शुरू से चाहती थी: सत्यवान के प्राण।

मृत्यु के देवता नाराज़ नहीं हुए। वे प्रशंसा से भर उठे। उन्होंने सत्यवान को मुक्त कर दिया, और दोनों को साथ-साथ लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया।

सावित्री अकेली लौटकर पेड़ों के नीचे उसी जगह पहुँची। वह बैठ गई और सत्यवान का सिर फिर से अपनी गोद में रख लिया। और वह जाग उठा, जैसे किसी लंबी नींद से, और पूछने लगा कि उसने उसे इतनी देर तक सोने क्यों दिया।

वे हाथ में हाथ डाले अँधेरे वन से होकर घर लौटे। आश्रम में उन्होंने पाया कि द्युमत्सेन फिर से देख सकते थे। जल्द ही दूत यह ख़बर लेकर आए कि उनका राज्य उनकी राह देख रहा है।

इस कहानी के बारे में

यह कहानी महाभारत के वन पर्व से है, जहाँ मार्कंडेय ऋषि इसे वनवास में रह रहे युधिष्ठिर को सुनाते हैं। बाद की परंपरा में, भारत के कई हिस्सों में विवाहित स्त्रियाँ उसकी याद में वट सावित्री का व्रत रखती हैं और बरगद के पेड़ के पास प्रार्थना करती हैं। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।

Original author & credit

Retold from The Mahabharata, Vana Parva (The Book of the Forest) by Traditionally attributed to the sage Vyasa (composed over many centuries, c. 400 BCE–400 CE), in the English translation by Kisari Mohan Ganguli (1883–1896). The original is in the public domain. This shortened retelling is shared for reading and awareness, and all credit for the story belongs to its original author. In the Mahabharata, the sage Markandeya tells this story to Yudhishthira during the years of exile. The link between Savitri and the banyan tree, kept in the Vat Savitri fast, comes from later tradition.

Read the original free →

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For the full story and its background, try these:

  1. translated by Kisari Mohan Ganguli, The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa. Project Gutenberg (public domain).

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

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