सात दोस्त और दस हज़ार रुपये
1981 में पुणे के सात युवा इंजीनियरों ने दस हज़ार रुपयों से एक सॉफ़्टवेयर कंपनी शुरू की, जो उनमें से एक की पत्नी से उधार लिए गए थे। बरसों तक उनके पास न पैसा था, न ज़्यादा ग्राहक, और सरकारी काग़ज़ी कार्रवाई का कोई अंत नहीं था। इन्फ़ोसिस की शुरुआत ऐसे हुई।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Biography
- 1980s–1990s
1981 की गर्मियों में, पुणे के एक युवा इंजीनियर ने घर आकर अपनी पत्नी से कहा कि वे अपनी पक्की नौकरी छोड़कर कुछ दोस्तों के साथ एक सॉफ़्टवेयर कंपनी शुरू करना चाहते हैं।
बस एक दिक़्क़त थी। उनमें से किसी के पास पैसे नहीं थे।
उनकी पत्नी सुधा भी इंजीनियर थीं। वे चुपचाप अपनी तनख़्वाह से मुसीबत के दिनों के लिए बचत करती आ रही थीं। उन्होंने अपनी सारी जमा-पूँजी, दस हज़ार रुपये, उन्हें दे दिए और कहा कि आगे बढ़ो।
पहली कोशिश, जो नाकाम रही
एन. आर. नारायण मूर्ति कर्नाटक के एक स्कूल मास्टर के बेटे थे। उन्होंने पहले इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और फिर कानपुर के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से कंप्यूटर साइंस पढ़ी थी, और पेरिस में कंप्यूटर सिस्टम पर काम किया था।
वे पहले एक बार कंपनी चलाने की कोशिश कर चुके थे, और वह कामयाब नहीं हुई थी। उन्होंने सीखा था कि सिर्फ़ अच्छा विचार काफ़ी नहीं होता। अब वे बंबई और पुणे की एक सॉफ़्टवेयर फ़र्म में काम कर रहे थे, जहाँ उनकी मुलाक़ात कुछ होशियार, उम्र में छोटे साथियों से हुई थी।
कुल सात संस्थापक थे: नारायण मूर्ति, नंदन नीलेकणि, एस. गोपालकृष्णन, एस. डी. शिबूलाल, के. दिनेश, एन. एस. राघवन और अशोक अरोड़ा। वे बीस-तीस की उम्र के थे, और ज़्यादातर आम मध्यमवर्गीय परिवारों से आते थे। 2 जुलाई 1981 को उन्होंने अपनी कंपनी, इन्फ़ोसिस कंसल्टेंट्स, रजिस्टर कराई, जिसका दफ़्तर पुणे में मूर्ति परिवार का छोटा-सा फ़्लैट था।
मुश्किल साल
1980 के दशक की शुरुआत का भारत टेक्नोलॉजी का कारोबार शुरू करने के लिए मुश्किल जगह था। सरकार आयात पर कड़ी नज़र रखती थी, और लगभग हर चीज़ के लिए इजाज़त लेनी पड़ती थी।
एक टेलीफ़ोन कनेक्शन मिलने में बहुत लंबा वक़्त लग सकता था। एक कंप्यूटर मँगाने का मतलब था महीनों तक अर्ज़ियाँ, चिट्ठियाँ और दिल्ली के सरकारी दफ़्तरों के चक्कर। ग्राहकों से मिलने विदेश जाने के लिए इजाज़त चाहिए थी, और विदेशी मुद्रा भी, जो मुश्किल से मिलती थी।
संस्थापक बहुत लंबे घंटे काम करते थे। उनका पहला बड़ा ग्राहक अमेरिका में था, इसलिए उनमें से कुछ लंबे-लंबे समय तक अपने परिवारों से दूर रहे, किफ़ायत से गुज़ारा करते हुए और ग्राहक की जगह पर काम करते हुए। जो घर पर रहे, वे भी उतनी ही मेहनत करते रहे। इस बीच सुधा मूर्ति इस बात पर राज़ी हुईं कि वे ख़ुद कंपनी में शामिल नहीं होंगी, हालाँकि वे किसी भी संस्थापक जितनी ही क़ाबिल थीं। उन्होंने अपने दो छोटे बच्चों की देखभाल का ज़्यादातर ज़िम्मा ख़ुद उठाया, ताकि उनके पति अपना सब कुछ काम को दे सकें। यह एक त्याग था, जिसके बारे में उन्होंने बाद में खुलकर बात की।
1983 में कंपनी बैंगलोर आ गई। वह अब भी छोटी थी, और पैसों की तंगी हमेशा बनी रहती थी।
वह रात जब वे हार मानने वाले थे
1989 तक, शुरुआत के आठ साल बाद भी, इन्फ़ोसिस एक मामूली कंपनी थी। एक अमेरिकी फ़र्म के साथ साझेदारी अभी-अभी ख़त्म हुई थी। संस्थापकों में से एक, अशोक अरोड़ा, ने अलग होने का फ़ैसला किया। बाक़ी थक चुके थे। उनके छोटे-छोटे परिवार थे, और वे देख चुके थे कि दूसरी नौकरियों में उनके दोस्त कहीं कम फ़िक्र के साथ कहीं ज़्यादा पैसा कमा रहे थे।
संस्थापक कंपनी को बेचने या बंद करने पर बात करने के लिए मिले। कई तो सब छोड़ देने को तैयार थे।
नारायण मूर्ति ने सुना। फिर उन्होंने कहा कि अगर वे जाना चाहते हैं, तो वे उनके शेयर ख़रीद लेंगे और अकेले आगे बढ़ेंगे। उन्हें अब भी उस चीज़ पर भरोसा था जो वे मिलकर बना रहे थे।
आख़िर में बाक़ी लोगों ने रुकने का फ़ैसला किया।
सबके लिए एक हिस्सा
बरसों के सब्र का फल 1990 के दशक में मिलने लगा। 1991 में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खोलनी शुरू की, और बहुत-सी पुरानी पाबंदियाँ हटा दी गईं। अचानक एक सॉफ़्टवेयर कंपनी कंप्यूटर मँगा सकती थी, आसानी से लोगों को नौकरी पर रख सकती थी, और दुनिया भर के ग्राहकों के साथ काम कर सकती थी।
1993 में इन्फ़ोसिस ने भारत में अपने शेयर आम जनता के लिए जारी किए। उसने एक ऐसा काम भी किया जो उस ज़माने में अनोखा था: उसने सिर्फ़ संस्थापकों और मैनेजरों को ही नहीं, बल्कि अपने बहुत-से कर्मचारियों को भी शेयर दिए। जब कंपनी बढ़ी, तो हज़ारों आम इंजीनियरों, सेक्रेटरियों और यहाँ तक कि ड्राइवरों ने भी पाया कि उनके पास कोई क़ीमती चीज़ है।
1999 में इन्फ़ोसिस अमेरिका के नैस्डैक स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी। वह भारत की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक बन गई, जिसमें लाखों लोग काम करते हैं।
जो उन्होंने सँभालकर रखा
संस्थापक जितना अपने बनाए के लिए जाने गए, उतना ही अपने बर्ताव के लिए भी। उन्होंने कंपनी को खुलेपन और ईमानदारी से चलाने की कोशिश की, अपने हिसाब-किताब बहुत विस्तार से छापे और रिश्वत देने से इनकार किया। नारायण मूर्ति अपनी सादगी भरी ज़िंदगी के लिए मशहूर थे।
सुधा मूर्ति आगे चलकर इन्फ़ोसिस फ़ाउंडेशन की अगुवाई करने लगीं, जो स्कूलों, अस्पतालों, पुस्तकालयों और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करता है, और वे बच्चों और बड़ों के लिए कहानियाँ लिखने वाली एक बेहद प्यारी लेखिका बनीं।
आज बहुत-से लोग उन दस हज़ार रुपयों को याद करते हैं। संस्थापकों को ज़्यादातर याद रहती थीं वे दोस्तियाँ, वे लंबी रातें, और वह पल जब वे सब छोड़कर जाने ही वाले थे।
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नारायण मूर्ति की A Better India: A Better World में काम और मूल्यों पर उनके भाषण और विचार संकलित हैं। चित्रा बनर्जी दिवाकरुणी की An Uncommon Love सुधा और नारायण मूर्ति की शादी और इन्फ़ोसिस के शुरुआती बरसों की कहानी बताती है।