सुरंग में सत्रह दिन
2023 में दिवाली की सुबह हिमालय में एक सुरंग धँस गई और इकतालीस मज़दूर चट्टानों की दीवार के पीछे फँस गए। बड़ी-बड़ी मशीनें हार गईं। आख़िर में, आख़िरी कुछ मीटर हाथों से खोदे गए।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- True story
- 2020s
ध्यान दें: इस कहानी में कई दिनों तक ज़मीन के भीतर फँसे मज़दूरों का ज़िक्र है।
12 नवंबर 2023 की सुबह के पाँच बजे से कुछ ऊपर का समय था, और पूरे भारत में परिवार दिवाली, यानी रोशनी के त्योहार, के लिए जाग रहे थे।
उत्तराखंड में एक पहाड़ के भीतर गहराई में, मज़दूरों की एक पाली एक नई सड़क-सुरंग में काम में लगी थी। यह सुरंग उत्तरकाशी ज़िले में सिलक्यारा के पास पहाड़ियों के नीचे खोदी जा रही थी, ताकि हिमालय के तीर्थ यमुनोत्री का सफ़र छोटा हो सके।
फिर, प्रवेश-द्वार से क़रीब दो सौ मीटर भीतर, छत ढह गई। टनों चट्टान और मिट्टी भरभराकर गिरी और सुरंग को एक दीवार से दूसरी दीवार तक भर दिया।
उसके पीछे, इकतालीस आदमी बाहर की दुनिया से कट गए।
अँधेरे में ज़िंदा
आदमी दबे नहीं थे। वे मलबे के उस पार थे, सुरंग के एक लंबे तैयार हिस्से में, कोई दो किलोमीटर का, जिसमें अब भी बत्तियाँ थीं और पानी आ रहा था। पर उनके और खुली हवा के बीच लगभग साठ मीटर मोटी मलबे की दीवार खड़ी थी।
वे आठ अलग-अलग राज्यों से थे, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, हिमाचल प्रदेश और ख़ुद उत्तराखंड से। ज़्यादातर मज़दूर थे, जो रोज़ी कमाने घर से बहुत दूर आए थे।
क़िस्मत से, पानी ले जाने वाला एक पतला पाइप मलबे के आर-पार जाता था। बचाने वालों ने उसमें से ऑक्सीजन भेजनी शुरू की। उन्होंने उसमें से मुरमुरे, सूखे मेवे और दवाइयाँ भेजीं। और उन्होंने उसमें आवाज़ लगाई, और भीतर से आदमियों की जवाबी आवाज़ सुनी। सभी इकतालीस ज़िंदा थे।
भीतर, आदमी एक-दूसरे का हौसला बनाए रहे। उनकी पाली के सुपरवाइज़र गब्बर सिंह नेगी, एक तजुर्बेकार सुरंग-कर्मी, की सबको शांत रखने के लिए ख़ूब तारीफ़ हुई। आदमी सुरंग में ऊपर-नीचे टहलते, हल्की-फुल्की कसरत करते और घर की बातें करते। बाद में उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी यह भरोसा नहीं छोड़ा कि कोई न कोई आएगा।
मशीनें
बाहर, बचाव का एक बहुत बड़ा अभियान शुरू हुआ। सैनिक, इंजीनियर, आपदा राहत दल और सुरंग विशेषज्ञ पहाड़ की ढलान पर जमा हुए। फँसे हुए आदमियों के परिवार पूरे भारत से पहुँचे और सुरंग के मुहाने पर इंतज़ार करने लगे।
योजना यह थी कि एक ताक़तवर ऑगर, यानी एक विशाल बरमा मशीन, से मलबे में आड़ा छेद किया जाए और इतने चौड़े स्टील के पाइप धकेले जाएँ कि उनमें से एक आदमी रेंगकर निकल सके। पहली मशीन काफ़ी ताक़तवर नहीं थी। एक और बड़ी मशीन भारतीय वायुसेना ने हवाई जहाज़ से पहुँचाई।
कई दिन तक वह मीटर-दर-मीटर आगे घिसटती रही। बार-बार वह मलबे में दबे स्टील के गार्डरों और सरियों से टकराती, और रुक जाती। हर बार उसे पीछे खींचना पड़ता और धातु काटकर हटानी पड़ती।
नौवें दिन बचाने वाले एक ज़्यादा चौड़ा पाइप आर-पार पहुँचाने में कामयाब हुए। अब वे गर्म खाना भेज सकते थे: प्लास्टिक की बोतलों में खिचड़ी और दाल। एक लंबे तार पर लगा कैमरा भी भीतर भेजा गया, और पहली बार देश ने टीवी पर उन आदमियों के चेहरे देखे, हेलमेट पहने, कैमरे के आसपास जुटे, हाथ हिलाते हुए।
अंतरराष्ट्रीय सुरंग विशेषज्ञ आर्नोल्ड डिक्स टीमों को सलाह देने ऑस्ट्रेलिया से आए। उन्होंने भारतीय इंजीनियरों के साथ मिलकर काम किया, और उन्हें सुरंग के प्रवेश-द्वार के पास एक छोटे-से देवस्थान पर स्थानीय लोगों के साथ प्रार्थना करते हुए भी देखा गया।
मशीन टूट गई
फिर, क़रीब दो हफ़्ते बाद, जब पाइप मलबे में पैंतालीस मीटर से ज़्यादा भीतर जा चुका था, ऑगर के ब्लेड पाइप के अंदर फँसकर टूट गए। टूटी मशीन को गैस और प्लाज़्मा कटर से टुकड़ा-टुकड़ा करके काटकर निकालना पड़ा। आदमी रात-रात भर उसे साफ़ करने में जुटे रहे।
दल ने एहतियात के तौर पर पहाड़ की चोटी से नीचे की ओर भी खुदाई शुरू कर दी थी। पर उसमें कई दिन और लगते।
लगभग दस या बारह मीटर मलबा बचा था। और मशीनें इससे आगे नहीं जा सकती थीं।
रैट-होल माइनर
तो बचाने वाले ऐसे लोगों के एक दल के पास गए जिनके पास मशीनें नहीं थीं। उनके पास फावड़े थे, हथौड़े थे और अपने हाथ।
वे रैट-होल माइनर थे, कोई एक दर्जन लोग, जिन्हें हाथ से बहुत तंग सुरंगें खोदने का तजुर्बा था। यह एक ख़तरनाक तरीक़ा है जो कुछ छोटी खदानों में इस्तेमाल होता है। असुरक्षित होने की वजह से कोयले की खुदाई में इस पर रोक लगा दी गई थी। अब यही हुनर आख़िरी रास्ता बचा था।
दो-तीन एक बार में, वे स्टील के पाइप में रेंगकर घुसते, उस तंग जगह में पेट के बल लेटते और सामने के मलबे को खोदते, मिट्टी, पत्थर और धातु को काटते हुए। दूसरे लोग रस्सी से बँधी एक छोटी ट्रॉली में मलबा खींचकर बाहर निकालते। फिर वे जगह बदल लेते। वे बिना रुके, दिन-रात काम करते रहे।
उन्हें सिर्फ़ डेढ़ दिन के आसपास लगा।
रोशनी में बाहर
28 नवंबर की शाम खोदने वाले आर-पार पहुँच गए। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल के बचावकर्मी पाइप में रेंगकर दूसरी तरफ़ के आदमियों तक पहुँचे।
एक-एक करके मज़दूरों को पहियों वाले स्ट्रेचर पर पाइप से खींचकर खुली हवा में लाया गया। बाहर लोगों ने ख़ुशी से नारे लगाए और उन्हें मालाएँ पहनाईं। सड़क पर एंबुलेंस की लंबी क़तार इंतज़ार कर रही थी। सत्रह दिन से इंतज़ार कर रहे परिवारों ने अपने बेटों, पतियों और भाइयों को फिर से गले लगाया।
सभी इकतालीस आदमी ज़िंदा बाहर आए।
अगले दिनों में पूरे भारत में रैट-होल माइनरों का सम्मान हुआ। बहुत-से लोगों ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि जिन लोगों ने बचाव का काम पूरा किया, वे आम मज़दूर थे, बिल्कुल उन्हीं आदमियों जैसे जिन्हें उन्होंने बचाया था।
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भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय ने बचाव अभियान पर नियमित जानकारी जारी की। द हिंदू और द इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बारों ने दिन-ब-दिन इसकी ख़बरें दीं, और बाद में बचाए गए मज़दूरों और रैट-होल माइनरों से बातचीत भी छापी।