चींटी और टिड्डा
पूरी गर्मी टिड्डा गाता रहता है और चींटी दाना ढोती रहती है। फिर खेत में पहली ठंडी हवा चलती है।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Ancient Greece
गर्मियों के बीच के दिन थे, और खेत गुनगुना रहा था।
घास ऊँची और सुनहरी थी। हर पत्ते पर धूप गरम थी। और सबसे ऊँचे डंठल पर बैठा टिड्डा अपनी सारंगी बजा रहा था और गला फाड़कर गा रहा था।
"ला-ला-ला, सूरज ऊँचा! ला-ला-ला, आसमान नीला!"
नीचे से एक छोटी-सी भूरी चींटी कदम-ताल करती हुई गुज़री। उसकी पीठ पर गेहूँ का एक दाना था, जो लगभग उसके जितना ही बड़ा था।
खेलने की फ़ुरसत नहीं
"सुप्रभात, चींटी!" टिड्डे ने आवाज़ लगाई। "इतनी जल्दी में कहाँ चलीं?"
"अपने घर," चींटी ने हाँफते हुए कहा। "यह दाना जमा करने के लिए घर ले जा रही हूँ।"
"जमा करने? भला किसलिए?" टिड्डा हँसा। "खाना तो हर तरफ़ बिखरा पड़ा है! आओ, मेरे पास बैठो। मैं तुम्हें एक गाना सिखाऊँगा।"
चींटी ने सिर हिलाया। "शुक्रिया, पर मैं नहीं आ सकती। गर्मी हमेशा नहीं रहेगी। जब सर्दी आएगी, तो खेत ख़ाली हो जाएँगे। मैं चाहती हूँ कि उससे पहले मेरा भंडार भर जाए।"
"सर्दी!" टिड्डे ने कहा। "सर्दी तो अभी बहुत दूर है। ऐसे प्यारे दिन में सर्दी की चिंता क्यों करना?"
और वह एक लंबी, ख़ुशी भरी धुन बजाने लगा, जबकि चींटी अपना दाना लेकर आगे बढ़ गई।
अगले दिन चींटी फिर वहाँ से गुज़री, एक और दाना लिए हुए। और उसके अगले दिन भी। और उसके अगले दिन भी।
हर बार टिड्डा पुकारता, "अब भी काम? बुद्धू चींटी! आओ, नाचो!"
और हर बार चींटी मुस्कुराती, कहती "आज नहीं," और चलती रहती।
दिन छोटे होने लगे
धीरे-धीरे गर्मी बदलने लगी।
सुबहें ठंडी और धुंधली होने लगीं। पेड़ों के पत्ते पीले हुए, फिर नारंगी, फिर भूरे, और घूमते-घूमते ज़मीन पर गिरने लगे। किसान गेहूँ काटकर ले गया। जो खेत खाने से इतना भरा था, वह हर दिन थोड़ा और सूना और ख़ाली होता गया।
टिड्डे ने ग़ौर किया कि ठंड में उसकी सारंगी की आवाज़ थोड़ी काँपने लगी है। उसने ग़ौर किया कि दोपहर के खाने के लिए रसीला पत्ता ढूँढ़ना अब मुश्किल हो रहा है। पर उसने ख़ुद से कहा, "कल कुछ न कुछ मिल जाएगा।"
चींटी ने भी यह सब ग़ौर किया। अब वह और उसकी बहनें और भी ज़्यादा मेहनत करने लगीं, इधर-उधर दौड़ती हुई, अपने घर का हर छोटा कमरा बीजों और दानों से भरती हुई।
फिर एक रात पहला पाला पड़ा।
सुबह पूरा खेत सफ़ेद होकर चमक रहा था। घास अकड़ी हुई और कुरकुरी थी। और एक टिड्डे के खाने के लिए कुछ भी नहीं था, कुछ भी नहीं।
दरवाज़े पर दस्तक
टिड्डा जमे हुए खेत में भटकता रहा। उसकी टाँगें ठंडी थीं। उसका पेट ख़ाली था। उसकी सारंगी बगल में दबी थी, पर उसका बजाने का मन नहीं था।
आख़िर में वह ज़मीन के एक छोटे-से छेद के पास पहुँचा, जिसमें से गेहूँ की गरम-गरम ख़ुशबू आ रही थी। यह चींटी का घर था।
उसने बहुत धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।
चींटी ने दरवाज़ा खोला। उसके पीछे घर गरम और रोशन था, और टिड्डे को जमा किए हुए दानों की क़तारें की क़तारें दिखाई दीं।
"ओह, चींटी," उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "मुझे बहुत भूख लगी है। खेत में कुछ नहीं बचा। क्या तुम थोड़ा-सा खाना दे सकती हो?"
चींटी देर तक उसे देखती रही।
"टिड्डे," उसने कहा, "जब मैं दाना ढो रही थी, तब तुम पूरी गर्मी क्या कर रहे थे?"
टिड्डे ने सिर झुका लिया। "मैं गा रहा था," उसने कहा। "मैं दिन भर गाता रहा। मुझे लगा था कि गर्मी कभी ख़त्म नहीं होगी।"
"अच्छा," चींटी ने कहा, "तुमने पूरी गर्मी गाना गाया। और अब सर्दी है, और गाने से तुम्हारा पेट नहीं भरेगा।"
टिड्डे की आँखों में आँसू भर आए। वह जाने के लिए मुड़ा।
एक सबक़ और एक गाना
"रुको," चींटी ने कहा।
वह अंदर गई और गेहूँ के कुछ दाने लेकर लौटी। "यह लो। आज के लिए इतना काफ़ी है। लेकिन कल तुम हमारी मदद करोगे। अभी भी काम बाक़ी है: भंडार के कमरे बुहारना, दरवाज़े की मरम्मत करना, घर को गरम रखना। क्या तुम अपने खाने के बदले काम करोगे?"
टिड्डे ने इतनी ज़ोर से सिर हिलाया कि उसकी मूँछें डोलने लगीं। "करूँगा! पक्का वादा, करूँगा।"
और उसने किया। उस पूरी सर्दी वह चींटियों के साथ मिलकर बुहारता, ढोता और मरम्मत करता रहा। ऐसी कड़ी मेहनत उसने पहले कभी नहीं की थी।
लेकिन शाम को, जब काम ख़त्म हो जाता, तो थकी-हारी पर ख़ुश चींटियाँ उसके चारों ओर इकट्ठा होतीं और उससे कोई धुन सुनाने को कहतीं। तब टिड्डा अपनी सारंगी निकालकर बजाता, और पूरा घर नाच उठता।
आख़िरकार जब बसंत आया और खेत फिर से हरा हो गया, तब भी टिड्डा गा रहा था। लेकिन अब, अपने गानों के बीच, वह हर दिन थोड़ा-सा खाना इकट्ठा करता और उसे सर्दी के लिए सँभालकर रख देता।
"सुप्रभात, चींटी!" जब वह गुज़रती, तो वह पुकारता।
"सुप्रभात, टिड्डे!" वह जवाब देती। और कभी-कभी, बस कभी-कभी, वह रुककर नाच भी लेती।
इस कहानी के बारे में
इस कथा का श्रेय प्राचीन यूनान के कथाकार ईसप को दिया जाता है, हालाँकि उनके नाम से जुड़ी कथाएँ कई सदियों में बहुत-से लोगों ने सुनाईं और इकट्ठा कीं। सबसे पुराने रूपों में चींटियाँ टिड्डे को ख़ाली हाथ लौटा देती हैं, और कहानी आलस के बारे में एक कड़ी चेतावनी है। तब से बहुत-से कथाकारों ने, हमारी तरह, एक नरम अंत चुना है, ताकि पहले से तैयारी करने के सबक़ के साथ थोड़ी दया भी हो। यह कहानी का एक छोटा और सरल किया हुआ रूप है।