वह बैंक जिसने ग़रीबों पर भरोसा किया
1976 में बांग्लादेश के एक अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर ने अपनी जेब से क़रीब 27 डॉलर बयालीस गाँव वालों को उधार दिए। हर एक ने उन्हें पैसा लौटाया, और वह छोटा-सा क़र्ज़ बढ़कर एक ऐसा बैंक बन गया जिसके मालिक उसके क़र्ज़दार हैं।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 13+
- Biography
- 1970s–2006
ध्यान दें: इस कहानी में एक अकाल और घोर ग़रीबी का ज़िक्र है।
जोबरा गाँव में एक जवान औरत अपने मिट्टी के घर के फ़र्श पर बैठी बाँस का एक स्टूल बुन रही थी। उसकी उँगलियाँ तेज़ी से चल रही थीं। यही काम वह रोज़ करती थी।
उससे मिलने आए अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर ने पूछा कि वह कितना कमा लेती है। जवाब सुनकर वे सन्न रह गए। उस व्यापारी का पैसा लौटाने के बाद, जो उसे बाँस के लिए उधार देता था और फिर उसके स्टूल अपनी मर्ज़ी के दाम पर ख़रीद लेता था, उसके पास दिन के बस कुछ पैसे बचते थे।
उसका नाम था सूफ़िया बेगम। वह आलसी होने की वजह से ग़रीब नहीं थी। वह इसलिए ग़रीब थी कि जो अकेला आदमी उसे उधार देने को तैयार था, वही यह भी तय करता था कि उसकी मेहनत की क़ीमत क्या है।
बेमानी सबक़
मुहम्मद यूनुस का जन्म 1940 में चटगाँव में हुआ, जो अब बांग्लादेश में है। वे एक जौहरी के बेटे थे। उन्हें अमेरिका में पढ़ने के लिए फ़ुलब्राइट स्कॉलरशिप मिली, उन्होंने वैंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की, और कुछ साल अमेरिका में पढ़ाया।
1971 में बांग्लादेश के आज़ाद होने के बाद वे घर लौट आए। वे चटगाँव यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख बने।
1974 में बांग्लादेश में एक भयानक अकाल पड़ा। भूखे लोग गाँवों से शहर आने लगे, इतने कमज़ोर कि भीख भी न माँग सकें। यूनुस ने बाद में लिखा कि जो सुंदर सिद्धांत वे कक्षा में पढ़ाते थे, उनके पास बाहर फैली भूख के लिए जैसे कहने को कुछ नहीं था।
इसलिए वे यूनिवर्सिटी के बग़ल वाले गाँव जोबरा में पैदल जाने लगे, यह सीखने के लिए कि वहाँ के ग़रीब लोग असल में कैसे जीते हैं।
बयालीस नाम
सूफ़िया बेगम से मिलने के बाद यूनुस ने एक छात्र से कहा कि वह जोबरा के उन सब लोगों की सूची बनाने में मदद करे जो इसी तरह फँसे हुए थे, और कड़ी शर्तों पर व्यापारियों और साहूकारों से छोटी-छोटी रक़में उधार लेते थे।
सूची में बयालीस नाम थे। जब उन्होंने जोड़ा कि इन सबको कुल कितना चाहिए, तो रक़म निकली 856 टका, यानी क़रीब 27 अमेरिकी डॉलर।
उन्हें झटका लगा कि इतने कम पैसे ने इतने सारे लोगों को दबा रखा था। उन्होंने अपनी जेब से उन्हें यह पैसा उधार दे दिया, ताकि वे साहूकारों का क़र्ज़ उतार सकें और अपना माल सही दाम पर बेच सकें। उन्होंने कहा कि जब हो सके, लौटा देना।
उन्होंने पैसा लौटाया, हर एक ने।
कोई बैंक तैयार नहीं था
यूनुस को जवाब साफ़ लगा: बैंकों को ऐसे लोगों को उधार देना चाहिए। वे एक बैंक गए, और उन्हें बताया गया कि ग़रीबों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उनके पास गारंटी में रखने को न ज़मीन थी, न जायदाद, और बहुत से लोग न पढ़ सकते थे, न फ़ॉर्म भर सकते थे।
आख़िरकार उन्होंने ख़ुद ज़मानतदार बनने की पेशकश की, और हर क़र्ज़ पर दस्तख़त किए। बैंक मान गया, फिर भी नाकामी की उम्मीद करते हुए। क़र्ज़दारों ने पैसा लौटा दिया।
बैंक वालों ने कहा कि यह किसी दूसरे गाँव में नहीं चलेगा। उन्होंने दूसरे गाँवों में आज़माया, फिर एक पूरे ज़िले में, और वहाँ भी यह चला। बंगाली में ग्रामीण का मतलब है "गाँव का", और यह काम ग्रामीण बैंक प्रोजेक्ट के नाम से जाना जाने लगा। 1983 में यह अपने-आप में एक आज़ाद बैंक बन गया।
छोटे समूह, बड़ा भरोसा
ग्रामीण के तरीक़े के कुछ सीधे-सादे नियम थे। क़र्ज़दारों को कोई गारंटी नहीं देनी पड़ती थी। वे पाँच-पाँच लोगों के छोटे समूहों में जुड़ते, नियम से मिलते, और हर हफ़्ते छोटी-छोटी किस्तों में पैसा लौटाते। सदस्य एक-दूसरे का साथ देते, और हर एक का अच्छा रिकॉर्ड बाक़ियों को उधार मिलने में मदद करता।
ज़्यादातर क़र्ज़दार औरतें थीं। यूनुस ने पाया कि औरतों को दिया गया पैसा ज़्यादा अक्सर बच्चों के खाने, पढ़ाई और घर पर लगता था। समय के साथ, बैंक के ज़्यादातर शेयर उसके क़र्ज़दारों के हाथ में आ गए।
यह आसान नहीं था। कुछ धार्मिक नेताओं और गाँव के बुज़ुर्गों ने औरतों के पैसा उधार लेने और घर के बाहर कमाने का विरोध किया। कुछ पतियों को एतराज़ था। बहुत-सी औरतों ने कभी अपना पैसा हाथ में नहीं लिया था। ग्रामीण के कार्यकर्ता गाँव-गाँव गए, और धीरे-धीरे औरतें आने लगीं।
गाँव के लिए एक पुरस्कार
ग़रीबों के लिए छोटे क़र्ज़ का विचार, जिसे अक्सर माइक्रोक्रेडिट कहा जाता है, कई देशों में फैला। 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार संयुक्त रूप से मुहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को दिया गया, नीचे से आर्थिक और सामाजिक विकास लाने की उनकी कोशिशों के लिए।
माइक्रोक्रेडिट के आलोचक भी रहे हैं। बाद के अध्ययनों में पाया गया कि अकेले छोटे क़र्ज़ हर किसी को ग़रीबी से बाहर नहीं निकालते, और दूसरी जगहों पर कुछ क़र्ज़ देने वालों ने ऊँचा ब्याज वसूला और लोगों को और गहरे क़र्ज़ में धकेल दिया। यह बहस आज भी जारी है।
लेकिन जोबरा में शुरुआत सीधी-सी थी। एक प्रोफ़ेसर ने स्टूल बुनती एक औरत की बात सुनी, और पूछा कि वह ग़रीब क्यों बनी रहती है। फिर उन्होंने बयालीस लोगों पर सत्ताईस डॉलर का भरोसा किया, और उन्होंने अपनी बात निभाई।
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मुहम्मद यूनुस ने ऐलन जोलिस के साथ लिखी अपनी आत्मकथा Banker to the Poor में जोबरा और ग्रामीण बैंक की कहानी सुनाई है। नोबेल पुरस्कार की वेबसाइट पर 2006 के शांति पुरस्कार की घोषणा और यूनुस का नोबेल भाषण मौजूद है।