भेड़िया आया, भेड़िया आया
एक ऊबा हुआ नन्हा चरवाहा पूरे गाँव को पहाड़ी पर दौड़ाकर बुलाने का एक मज़ेदार तरीक़ा ढूँढ़ लेता है। एक बार यह काम कर जाता है। दो बार भी।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Ancient Greece
एक छोटे-से गाँव के ऊपर एक हरी पहाड़ी थी। वहाँ एक चरवाहा लड़का एक चट्टान पर बैठा था और उसने दुनिया की सबसे लंबी आह भरी।
नीचे भेड़ें घास चर रही थीं। चप, चप, चप। बस यही वे हमेशा करती थीं।
लड़के ने उन्हें गिना। फिर दोबारा गिना। फिर उसने बादल गिने, चिड़ियाँ गिनीं, और अपने कोट के बटन गिने। अभी तो दोपहर के खाने का समय भी नहीं हुआ था।
"यहाँ ऊपर कभी कुछ होता ही नहीं," वह बड़बड़ाया।
एक चालाक तरकीब
गाँव वालों ने लड़के को एक ज़रूरी काम सौंपा था। "भेड़ों का ध्यान रखना," उन्होंने कहा था, "और अगर कभी भेड़िया आए, तो जितनी ज़ोर से हो सके, चिल्लाना। हम मदद के लिए दौड़े चले आएँगे।"
लड़के ने नीचे गाँव की ओर देखा। उसे नानबाई आटा गूँधता दिख रहा था, किसान बाड़ ठीक करता दिख रहा था, और बूढ़ी जुलाहिन अपने दरवाज़े पर बैठी दिख रही थी।
उसके चेहरे पर एक शरारती-सी मुस्कान फैल गई।
वह अपनी चट्टान पर खड़ा हुआ, गहरी साँस ली, और चिल्लाया, "भेड़िया! भेड़िया! भेड़िया भेड़ों के पीछे पड़ा है!"
नीचे गाँव में सबने अपना-अपना काम वहीं छोड़ दिया। नानबाई ने अपनी रोटी छोड़ी। किसान ने अपनी बाड़ छोड़ी। बूढ़ी जुलाहिन ने भी अपनी लाठी उठा ली। सब के सब हाँफते-काँपते पहाड़ी पर चढ़ आए, हाथों में फावड़े, झाड़ू और बेलन लहराते हुए।
जब वे लाल चेहरे और फूली साँसों के साथ ऊपर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि भेड़ें चुपचाप चर रही हैं, और लड़का घास पर लोट-पोट होकर हँस रहा है।
"कोई भेड़िया नहीं है!" वह खिलखिलाया। "मैंने तुम्हें बुद्धू बनाया! काश तुमने ख़ुद को दौड़ते हुए देखा होता!"
गाँव वाले नहीं हँसे। उन्होंने सिर हिलाया, और धीरे-धीरे पहाड़ी से नीचे उतर गए।
दूसरी बार
कुछ दिनों तक लड़का ठीक से रहा। लेकिन जल्द ही वह फिर ऊबने लगा।
"पिछली बार कितना मज़ा आया था," उसने सोचा। "बस एक बार और।"
तो वह अपनी चट्टान पर चढ़ा और पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाया, "भेड़िया! भेड़िया! बचाओ! बचाओ! भेड़िया आ गया!"
फिर से गाँव वालों ने सब कुछ छोड़ दिया। फिर से वे खड़ी पहाड़ी पर पूरे रास्ते दौड़ते हुए आए। और फिर से उन्होंने भेड़ों को बिल्कुल सही-सलामत पाया, और लड़के को इतना हँसते हुए कि उसके पेट में बल पड़ गए।
इस बार नानबाई बोला। वह चिल्ला नहीं रहा था। वह बस दुखी था।
"बेटा," उसने कहा, "हम अपना काम छोड़कर तुम्हारी मदद को आए। हमें तुम्हारी और भेड़ों की फ़िक्र हो रही थी। अगर तुम ऐसे ही कहानियाँ गढ़ते रहे, तो हमें कैसे पता चलेगा कि तुम कब सच बोल रहे हो?"
लड़के ने कंधे उचका दिए और खिलखिलाता रहा। लेकिन गाँव वाले बिना एक शब्द कहे घर लौट गए।
असली भेड़िया
कुछ शामों बाद सूरज ढल रहा था और पहाड़ी पर परछाइयाँ लंबी होती जा रही थीं।
लड़का भेड़ों को घर ले जाने के लिए इकट्ठा कर रहा था, तभी उसे पेड़ों के किनारे कुछ हिलता हुआ दिखा। कुछ स्लेटी-सा। कुछ, जिसके नुकीले कान थे और लंबी, झबरीली पूँछ।
वह भेड़िया था। असली भेड़िया।
भेड़ों ने भी उसे देख लिया। वे डर के मारे मिमियाने लगीं और एक-दूसरे से टकराने लगीं।
लड़का उछलकर अपनी चट्टान पर चढ़ गया। "भेड़िया!" वह पूरी ताक़त से चिल्लाया। "भेड़िया! भेड़िया! मेहरबानी करके जल्दी आओ! इस बार सच में भेड़िया है!"
नीचे गाँव में लोगों ने उसकी आवाज़ सुनी। नानबाई ने अपने तंदूर से नज़र उठाई। किसान ने अपने खेत से नज़र उठाई।
"फिर वही लड़का," किसान ने कहा। "वह हमें बड़ा बेवक़ूफ़ समझता होगा।"
"तीसरी बार हम बुद्धू नहीं बनेंगे," नानबाई ने कहा।
और कोई नहीं आया।
लड़का तब तक चिल्लाता रहा जब तक उसका गला बैठ नहीं गया। लेकिन वह बस एक छोटा-सा लड़का था, और भेड़िया फुर्तीला और भूखा था। वह झुंड के बीच झपट पड़ा, और डरी हुई भेड़ें हर दिशा में बिखर गईं, जंगल में, दूर के खेतों में और अँधेरे में भाग गईं।
घर का लंबा रास्ता
जब सब ख़त्म हो गया, तो लड़का लड़खड़ाता हुआ अकेला पहाड़ी से नीचे उतरा। अब वह हँस नहीं रहा था। वह रो रहा था।
"तुम लोग आए क्यों नहीं?" उसने सिसकते हुए गाँव वालों से कहा। "मैं पुकारता रहा, पुकारता रहा! सच में भेड़िया था!"
बूढ़ी जुलाहिन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"हमने तुम्हारी बात का यक़ीन नहीं किया, बच्चे," उसने प्यार से कहा। "जब भेड़िया नहीं था, तब तुमने कहा कि भेड़िया है। इसलिए जब सच में था, तो हमें लगा कि यह भी कोई चाल है। लोग सिर्फ़ उसी आवाज़ पर भरोसा कर सकते हैं जो हमेशा सच बोलती हो।"
अगली सुबह पूरा गाँव भेड़ों को ढूँढ़ने निकला। उन्हें पूरा दिन लग गया, और झुंड की कुछ भेड़ें कभी नहीं मिलीं।
लड़का उनके साथ-साथ चलता रहा, हर झाड़ी और हर गड्ढे में ढूँढ़ता रहा। उसने एक बार भी शिकायत नहीं की।
उस दिन के बाद उसने फिर कभी झूठ नहीं बोला। बहुत, बहुत लंबा समय लगा। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब वह कुछ कहता, तो गाँव के लोग फिर से उसकी बात मान लेते।
इस कहानी के बारे में
यह प्राचीन यूनान के कथाकार ईसप के नाम से जुड़ी सबसे मशहूर कथाओं में से एक है। यह दो हज़ार से भी कहीं ज़्यादा सालों से सुनाई जा रही है, और आज कई भाषाओं में "भेड़िया आया" कहना झूठा ख़तरा बताने के लिए एक कहावत बन गया है। पुराने रूपों में इसका अंत यहाँ सुनाए गए अंत से ज़्यादा कठोर है। यह कहानी का एक छोटा और सरल किया हुआ रूप है।