← Back to stories

Founders

वह रस्सी जिसे कोई भी खींच सकता था

टोयोटा की फ़ैक्ट्री में कोई भी मज़दूर, जिसे कोई गड़बड़ दिखे, पूरी असेंबली लाइन रोक सकता था। ताइची ओनो ने दशकों तक इसी विचार के इर्द-गिर्द काम करने का एक तरीक़ा खड़ा किया, और उसने दुनिया भर की फ़ैक्ट्रियों, अस्पतालों और दफ़्तरों को बदल दिया।

  • 4 मिनट की कहानी
  • Ages 13+
  • Biography
  • 1930s–1990
इस भाषा में पढ़ें

असेंबली लाइन के ऊपर एक रस्सी लटकी रहती है। जिस भी मज़दूर को कुछ ग़लत दिखे, कोई ढीला बोल्ट, कोई छूटा हुआ पुर्ज़ा, पेंट पर कोई खरोंच, वह हाथ बढ़ाकर उसे खींच सकता है।

उसकी जगह के ऊपर एक बत्ती जल उठती है और एक छोटी-सी धुन बजने लगती है। टीम लीडर फ़ौरन चलकर आता है। अगर समस्या एक-आध मिनट में ठीक न हो सके, तो पूरी लाइन रुक जाती है।

बीसवीं सदी की ज़्यादातर कार फ़ैक्ट्रियों में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था। लाइन रोकने में पैसा लगता था, और आम मज़दूरों को इतना अधिकार देने का भरोसा नहीं किया जाता था। टोयोटा में यह रोज़ के काम का हिस्सा बन गया। काम करने का यह तरीक़ा खड़ा करने में सबसे बड़ा हाथ ताइची ओनो नाम के एक इंजीनियर का था।

एक करघा जो ख़ुद रुक जाता था

ओनो का जन्म 1912 में उत्तर-पूर्वी चीन के डालियान में, जापानी माँ-बाप के घर हुआ था। उन्होंने नागोया में मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ी, और 1932 में टोयोडा स्पिनिंग एंड वीविंग में काम करने लगे, जो टोयोडा परिवार की चलाई एक कपड़ा कंपनी थी।

इस परिवार की दौलत करघों से शुरू हुई थी। संस्थापक साकिची टोयोडा ने एक ऐसा ऑटोमैटिक करघा बनाया था जो धागा टूटते ही अपने-आप रुक जाता था। टूटे धागे का मतलब था ख़राब कपड़ा, इसलिए ख़राब कपड़ा बुनते रहने के बजाय मशीन थम जाती थी और किसी इंसान का इंतज़ार करती थी। तब एक ही मज़दूर कई करघे सँभाल सकता था, क्योंकि मशीनें ख़ुद बता देती थीं कि कब कुछ ग़लत हुआ है।

यह सीधा-सा विचार, कि जैसे ही कुछ ग़लत हो, रुक जाओ, ओनो के साथ उम्र भर रहा।

साकिची के बेटे किइचिरो टोयोडा ने कारें बनाना शुरू किया और 1937 में टोयोटा मोटर कंपनी की नींव रखी। उनका अपना भी एक विचार था: हर पुर्ज़ा ठीक उसी वक़्त पहुँचे जब उसकी ज़रूरत हो, हफ़्तों पहले नहीं, किसी गोदाम में ढेर बनकर नहीं। ओनो 1943 में कार कंपनी में आ गए।

ग़रीब और छोटी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ग़रीब था। टोयोटा गिनी-चुनी गाड़ियाँ ही बनाती थी और उसके पास बहुत कम पैसा था। 1950 में कंपनी डूबने के क़रीब पहुँच गई, एक कड़वी हड़ताल हुई, और किइचिरो टोयोडा ने पद छोड़ दिया।

फ़ोर्ड और जनरल मोटर्स जैसी अमेरिकी कार कंपनियाँ विशाल लाइनों पर एक ही मॉडल की भारी गिनती में गाड़ियाँ बनाती थीं, और उनके पास पुर्ज़ों के बड़े-बड़े भंडार होते थे। टोयोटा इस तरह काम करने का ख़र्च नहीं उठा सकती थी। उसे कम जगह और कम पैसे में, कई अलग-अलग गाड़ियाँ थोड़ी-थोड़ी गिनती में बनानी थीं।

ओनो, जो अब एक मशीन शॉप के इंचार्ज थे, प्रयोग करने लगे। उन्होंने पूछा कि पुर्ज़े बड़े-बड़े ढेरों में क्यों रखे जाते हैं, मशीनों को कई-कई दिन एक ही चीज़ बनाने के लिए क्यों लगाया जाता है, और एक मज़दूर दिन भर खड़ा होकर एक ही मशीन को क्यों देखता रहता है।

सुपरमार्केट

ओनो ने अमेरिकी सुपरमार्केटों के बारे में पढ़ा था, और 1956 में अमेरिका की एक यात्रा पर उन्हें अपनी आँखों से देखा। उन्हें जिस बात ने चौंकाया, वह उनके काम करने का ढंग था। ग्राहक शेल्फ़ से उतना ही उठाता था जितना उसे चाहिए, और तभी दुकान उसकी जगह शेल्फ़ पर और सामान रखती थी।

वे यह विचार फ़ैक्ट्री के फ़र्श पर ले आए। हर वर्कशॉप जितना बना सके बनाकर आगे धकेले, इसके बजाय हर अगला चरण पिछले चरण से सिर्फ़ उतना लेगा जितना उसे चाहिए। पुर्ज़ों के साथ एक सादा-सा कार्ड चलता था, जिसे कानबान कहते थे। जब पुर्ज़े इस्तेमाल हो जाते, तो कार्ड वापस जाता, इस इशारे के तौर पर कि और बनाओ।

कम भंडार का मतलब था कम पैसा फँसा रहना और कम बर्बादी। पर इसका एक मुश्किल मतलब भी था। छिपने के लिए कोई बड़ा ढेर न होने से हर समस्या फ़ौरन सामने आ जाती थी।

यहीं साकिची टोयोडा का करघा लौट आया। जब कोई समस्या दिखे, तो लाइन रुक जानी चाहिए, जैसे करघा रुक जाता था, और लोगों को आगे बढ़ने से पहले उसकी जड़ ठीक करनी चाहिए।

"क्यों" पूछना

ओनो ने अपनी टीमों को सिखाया कि जब कुछ टूटे, तो बार-बार "क्यों" पूछो, अक्सर पाँच बार, जब तक कि पहले बहाने के बजाय असली वजह तक न पहुँच जाओ। एक मशीन रुकती है: क्यों? फ़्यूज़ उड़ गया है। क्यों? मशीन पर ज़रूरत से ज़्यादा भार था। क्यों? और यूँ ही आगे, जब तक सही इलाज सामने न आ जाए।

वे एक सख़्त बॉस के तौर पर जाने जाते थे। कहा जाता है कि वे फ़ैक्ट्री के फ़र्श पर खड़िया से एक घेरा बना देते थे और किसी मैनेजर को घंटों उसके अंदर खड़ा रखते थे, बस काम को देखते हुए, जब तक कि वह बर्बादी को ख़ुद न देख ले।

इन बदलावों में बरसों लगे, और बहुत से लोगों ने इनका विरोध किया। मज़दूरों को डर था कि लाइन रोकने पर दोष उन्हीं पर आएगा। मैनेजरों को उत्पादन घटने की चिंता थी। धीरे-धीरे नतीजों ने ख़ुद अपनी बात कह दी। टोयोटा की गाड़ियाँ अच्छी बनावट के लिए जानी जाने लगीं, और कंपनी उन्हें अपने मुक़ाबले वालों से कम ख़राबियों और कहीं कम भंडार के साथ बना रही थी।

फ़ैक्ट्री से आगे

1970 के दशक में बाक़ी दुनिया का ध्यान इस ओर जाने लगा। 1973 के तेल संकट के बाद बहुत-सी कंपनियाँ मुश्किल में थीं, लेकिन टोयोटा जल्दी सँभल गई, और लोग पूछने लगे कि कैसे।

ओनो ने इस व्यवस्था पर एक छोटी-सी किताब लिखी, जो 1978 में जापान में छपी। 1990 में मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के एक मशहूर अध्ययन, The Machine That Changed the World, ने दुनिया भर की कार फ़ैक्ट्रियों की तुलना की और टोयोटा के तरीक़े के लिए एक नया नाम आम कर दिया: लीन प्रोडक्शन।

इसके विचार हर तरह की फ़ैक्ट्रियों में फैले, और फिर अस्पतालों, एयरलाइनों, दफ़्तरों और सॉफ़्टवेयर टीमों तक पहुँचे। उनमें से बहुतों के पास अब उस रस्सी का अपना एक रूप है: एक ऐसा तरीक़ा जिससे कोई भी कह सके, यह ग़लत है, चलो रुककर इसे ठीक करें।

ताइची ओनो का निधन 1990 में, अठहत्तर साल की उम्र में हुआ। उन्होंने कभी दावा नहीं किया कि यह सब उन्होंने अकेले ईजाद किया। उन्होंने टोयोडा परिवार के विचारों पर और फ़ैक्ट्री के फ़र्श पर काम करने वाले हज़ारों लोगों की मेहनत पर इसे खड़ा किया। उनका बड़ा क़दम यह था कि उन्होंने उन लोगों पर लाइन रोकने का भरोसा किया।

और पढ़ना चाहते हैं?

ताइची ओनो की अपनी किताब Toyota Production System इस तरीक़े को सीधे-सादे शब्दों में समझाती है। The Machine That Changed the World बताती है कि बाक़ी दुनिया ने इसे कैसे खोजा, और जेफ़्री लाइकर की The Toyota Way इसके पीछे के सिद्धांत सामने रखती है।

Want to read more?

This story is told briefly. For the full, detailed account, these books and records go deeper:

  1. Taiichi Ohno, Toyota Production System: Beyond Large-Scale Production. Productivity Press, 1988.
  2. James P. Womack, Daniel T. Jones and Daniel Roos, The Machine That Changed the World. Rawson Associates, 1990.
  3. Jeffrey K. Liker, The Toyota Way. McGraw-Hill, 2004.

About this story

This is a translation of the original English story. It was prepared with AI assistance and is awaiting review by a native speaker.

This story is awaiting final editorial fact-checking. If you spot an error, please let us know.

Shared on 1Kahani for reading and awareness. All credit for the research belongs to the authors and records listed under "Want to read more?". Taiichi Ohno's words are paraphrased, not quoted.

Have a copyright concern about this story? Tell us.

Download for Kindle & e-readers

Read next

FoundersBiography

Every Drop Counts

A water engineer once noticed one tree growing taller than the rest beside a leaking pipe. Decades later, with a farming village in the desert, Simcha Blass turned that memory into drip irrigation, which now grows crops around the world with far less water.

3 min readAges 13+✓ Read1930s–1980s
FoundersTrue story

The Tiffin Carriers

Every working day in Mumbai, thousands of men in white caps carry home-cooked lunches across one of the busiest cities on earth, using little more than bicycles, trains and a few painted marks. Almost every box reaches the right desk on time.

4 min readAges 13+✓ Read1890–today
FoundersTrue story

Seven Women and Eighty Rupees

In 1959, seven women in Mumbai borrowed eighty rupees and began rolling papads on a rooftop. They refused charity and insisted on the best quality, and what they started now belongs to tens of thousands of women.

4 min readAges 11+✓ Read1959–today