दरार वाला घड़ा
पूरे दो साल तक, हर दिन, एक पनिहारा मिट्टी के दो घड़े लेकर नदी तक जाता है। एक घड़ा भरा हुआ पहुँचता है। दूसरा, जिसके एक तरफ़ दरार है, आधा ख़ाली पहुँचता है, और उसे इस बात की शर्म है।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 8+
- Fable & folk tale
- Traditional
सूरज निकलने से पहले ही पनिहारा रास्ते पर निकल चुका था।
उसके कंधों पर लकड़ी की एक लंबी बहँगी थी, जो बरसों के इस्तेमाल से चिकनी और गहरी रंगत की हो गई थी। उसके दोनों सिरों पर रस्सी से मिट्टी का एक-एक बड़ा घड़ा लटकता था। हर सुबह वह एक ही रास्ते से जाता, खेतों से होकर नीचे नदी तक, दोनों घड़े भरता, और उन्हें पहाड़ी पर चढ़कर अपने मालिक के घर ले आता।
रास्ता लंबा था, और चढ़ाई खड़ी थी। पर वह बिना शिकायत किए चलता, और अक्सर चलते-चलते गुनगुनाता रहता।
दो घड़े
उसके बाईं तरफ़ वाला घड़ा बेदाग़ था। वह गोल और चिकना था, उसमें एक भी खरोंच नहीं थी, और उसमें डाली गई हर बूँद उसमें टिकी रहती। जब पनिहारा घर पहुँचता, तो वह हमेशा लबालब भरा होता।
दाईं तरफ़ वाले घड़े के एक तरफ़ एक लंबी दरार थी। किसी को याद नहीं था कि वह कैसे पड़ी। हर क़दम पर उस दरार से पानी रिसता, और जब तक पनिहारा पहाड़ी की चोटी पर पहुँचता, घड़ा बस आधा भरा रह जाता।
तो हर दिन वह दो भरे घड़े लेकर निकलता, और डेढ़ घड़ा लेकर पहुँचता।
बेदाग़ घड़े को ख़ुद पर बड़ा गर्व था। उसे एक काम के लिए बनाया गया था, और वह उस काम को बिना चूके करता था।
दरार वाला घड़ा बहुत दुखी था। उसे हर बूँद का फिसलकर निकल जाना महसूस होता। वह जानता था कि पनिहारा उसकी ख़ातिर पूरा लंबा रास्ता चलता है, उसका बोझ पहाड़ी पर ढोता है, और बदले में उसे आधा ही मिलता है। हर सुबह उसकी शर्म थोड़ी और भारी हो जाती।
घड़ा बोल पड़ा
ऐसा पूरे दो साल चलता रहा।
फिर एक दिन, जब पनिहारा घड़े भरने के लिए नदी किनारे झुका, तो दरार वाला घड़ा और चुप न रह सका।
"मुझे ख़ुद पर शर्म आती है," उसने कहा। "और मैं तुमसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ।"
पनिहारा हैरानी से एड़ियों पर बैठ गया। "शर्म? किस बात की?"
"दो साल से मैं घर तक अपना आधा पानी ही पहुँचा पाता हूँ," घड़े ने कहा। "मेरी इस दरार की वजह से वह पूरे रास्ते रिसता रहता है। तुम इतनी मेहनत करते हो, और मेरी वजह से तुम्हें उसका पूरा फल नहीं मिलता। तुम्हारे लिए एक नया घड़ा ही अच्छा रहेगा।"
पनिहारा एक पल चुप रहा। फिर वह मुस्कुराया, और उसने घड़े को थपथपाया।
"मेरे लिए एक काम करो," उसने कहा। "आज जब हम पहाड़ी पर लौटें, तो मैं चाहता हूँ कि तुम रास्ते के किनारे देखो। ध्यान से देखना।"
लौटने का रास्ता
तो उस सुबह, जब वे पहाड़ी पर चढ़ रहे थे, दरार वाले घड़े ने देखा।
रास्ते के उसकी तरफ़ वाले किनारे पर, पहाड़ी के ऊपर तक, फूल खिले थे। नारंगी और सुनहरे गेंदे थे। छोटे-छोटे नीले फूल थे, जिनके नाम घड़ा नहीं जानता था, और सफ़ेद चमेली की ऊँची डालियाँ, और सुबह की रोशनी में सिर हिलाते जंगली गुलाबी फूल। मधुमक्खियाँ अभी से उनके बीच काम में जुटी थीं। हवा में मीठी ख़ुशबू थी।
थोड़ी देर के लिए घड़ा दुखी होना भूल गया। फूल बड़े सुंदर थे।
पर जब वे पहाड़ी की चोटी पर पहुँचे, तो उसे वही जाना-पहचाना ख़ालीपन महसूस हुआ। उसका आधा पानी फिर रिस गया था। और उसने एक बार फिर माफ़ी माँगी।
फूल क्यों उगे
पनिहारे ने बहँगी धीरे से नीचे रखी।
"क्या तुमने ध्यान दिया," उसने कहा, "कि फूल सिर्फ़ रास्ते के तुम्हारी तरफ़ वाले किनारे पर उगे हैं? दूसरी तरफ़ देखो।"
घड़े ने देखा। बेदाग़ घड़े की तरफ़ ज़मीन सूखी और नंगी थी, धूल और पत्थरों के सिवा कुछ नहीं।
"मुझे तुम्हारी दरार के बारे में हमेशा से पता था," पनिहारे ने कहा। "इसलिए दो साल पहले, मैंने रास्ते के तुम्हारी तरफ़ बीज बिखेर दिए। और हर दिन, जब हम नदी से लौटते हैं, तुम उन्हें सींचते हो। तुम इतने समय से, बिना जाने, उन्हें सींचते आ रहे हो।"
उसने झुककर एक गेंदे को छुआ।
"दो साल से मैं ये फूल तोड़कर अपने मालिक की मेज़ पर रखता हूँ, और दरवाज़े के पास वाले छोटे-से पूजा-स्थान में भी। अगर तुम बिल्कुल वैसे न होते जैसे तुम हो, तो यह पूरी पहाड़ी सूनी होती। घर में एक भी फूल न होता।"
दरार वाला घड़ा कुछ नहीं बोला। पर दो साल में पहली बार, जब पहाड़ी के ऊपर सूरज निकला, तो उसे ज़रा भी भारीपन महसूस नहीं हुआ।
इस कहानी के बारे में
यह छोटी-सी दृष्टांत-कथा पूरी दुनिया में सुनाई जाती है, स्कूलों में, मंदिरों और गिरजाघरों में, और शुभकामना कार्डों पर। अक्सर कहा जाता है कि यह भारत या चीन से आई है, पर सच यह है कि कोई नहीं जानता कि यह कहाँ से शुरू हुई, और इसका कोई पुराना लिखित रूप नहीं मिला है। हमने इसे यहाँ अपने शब्दों में सुनाया है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।