बहरा संगीतकार
1824 में वियना की एक बसंत की शाम को, खचाखच भरे थिएटर ने एक नई सिम्फ़नी पहली बार सुनी। जिस आदमी ने उसे लिखा था, वह उसका एक भी सुर नहीं सुन सकता था।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- Biography
- 1770s–1820s
ध्यान दें: इस कहानी में गहरी निराशा के एक दौर का ज़िक्र है, जब बीथोवन ने अपनी जान लेने के बारे में सोचा था।
वियना का थिएटर भरा हुआ था। हर सीट पर कोई बैठा था, और जिसे जहाँ जगह मिली, वहीं खड़ा था। यह 7 मई 1824 की शाम थी, और लोग शहर के सबसे मशहूर संगीतकार की कोई नई रचना सुनने आए थे।
मंच पर एक बड़ा ऑर्केस्ट्रा, एक कोरस और चार गायक थे। और उनके बीच, वादकों की ओर मुँह किए, बिखरे हुए पके बालों वाला तिरपन साल का एक गठीला आदमी खड़ा था, जो अपनी बाँहों से ताल दे रहा था।
उसका नाम था लुडविग वान बीथोवन। हॉल में गूँजने वाले संगीत का एक-एक सुर उसी ने लिखा था। और वह लगभग पूरी तरह बहरा था।
कीबोर्ड पर बैठा एक लड़का
बीथोवन का जन्म 1770 में राइन नदी के किनारे बसे बॉन नाम के एक छोटे शहर में हुआ था, जो आज जर्मनी में है। उनके पिता वहाँ के दरबार में गायक थे, और एक सख़्त शिक्षक भी। वे नन्हे लुडविग से घंटों कीबोर्ड का अभ्यास करवाते, कभी-कभी देर रात तक।
लड़के में ग़ज़ब का हुनर था। किशोर उम्र तक वे दरबार के ऑर्केस्ट्रा में बजाने लगे थे और अपना संगीत रचने लगे थे। इक्कीस साल की उम्र में वे यूरोप की संगीत राजधानी वियना चले गए, और जल्द ही एक चकाचौंध कर देने वाले पियानोवादक के रूप में मशहूर हो गए। सुनने वालों ने इससे पहले किसी को इतनी ताक़त और इतने भाव से बजाते नहीं सुना था।
फिर, जब वे अभी बीस-पच्चीस पार करके तीस के क़रीब ही थे, कुछ भयानक होने लगा। उनके कानों में घंटियाँ-सी बजने और भिनभिनाहट होने लगी। आवाज़ें धीमी और धुँधली होने लगीं। साल-दर-साल उनकी सुनने की ताक़त खिसकती गई।
वह चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई
एक संगीतकार के लिए यह सबसे क्रूर क़िस्मत जैसा था। बीथोवन ने जब तक हो सका, इसे छिपाए रखा। वे लोगों से मिलने-जुलने से बचते रहे, इस डर से कि लोग भाँप लेंगे कि वे उनकी बातचीत समझ नहीं पा रहे।
1802 में, वियना के बाहर हाइलिगेनश्टाट नाम के एक शांत गाँव में रहते हुए, उन्होंने अपने दो भाइयों को एक लंबी चिट्ठी लिखी। उसमें उन्होंने अपना सारा दुख उड़ेल दिया। उन्होंने माना कि वे अपनी जान लेने के बहुत क़रीब पहुँच गए थे। उन्होंने लिखा कि जिस चीज़ ने उन्हें रोका, वह थी उनकी कला: उन्हें लगता था कि जब तक वे अपने भीतर का सारा संगीत बाहर न ले आएँ, तब तक वे दुनिया नहीं छोड़ सकते।
उन्होंने वह चिट्ठी कभी नहीं भेजी। वह उनकी मौत के बाद उनके कागज़ों में मिली, और आज उसे हाइलिगेनश्टाट टेस्टामेंट के नाम से जाना जाता है।
बीथोवन वियना लौट आए और काम करते रहे। आने वाले सालों में उन्होंने ऐसा संगीत रचा, जो दुनिया के सुने हुए सबसे दमदार संगीत में गिना जाता है।
ख़ामोशी में संगीत
चालीस की उम्र पार करते-करते बीथोवन न तो लोगों के सामने बजा सकते थे, न ठीक से ऑर्केस्ट्रा सुन सकते थे। दोस्त और मिलने वाले छोटी-छोटी कॉपियों में लिखकर उनसे बात करते, और वे बोलकर जवाब देते। इनमें से बहुत-सी "बातचीत की कॉपियाँ" आज भी मौजूद हैं।
लेकिन वे अब भी संगीत रच सकते थे। वे संगीत को अपने मन में सुन सकते थे, जैसे कोई पढ़ने वाला पन्ने के शब्दों को बिना बोले सुन लेता है। वे इतनी गहराई से जानते थे कि हर वाद्य कैसा सुनाई देता है कि वे एक भी सुर सुने बिना उन सबके लिए संगीत लिख सकते थे।
बरसों तक उन्होंने एक नई सिम्फ़नी पर काम किया, अपनी नौवीं सिम्फ़नी पर। वह उनकी लिखी किसी भी रचना से लंबी और भव्य थी। और उसके आख़िरी हिस्से में उन्होंने कुछ ऐसा किया, जो किसी सिम्फ़नी में पहले किसी ने नहीं किया था: उन्होंने उसमें कोरस और गायक जोड़ दिए। वे फ़्रेडरिक शिलर की एक कविता, "ओड टू जॉय" ("आनंद का गीत"), के शब्द गाते थे, जो इस बारे में है कि सारे इंसान आपस में भाई-बहन बन जाएँ।
पहली प्रस्तुति की शाम
1824 की उस मई की शाम को, बीथोवन मंच पर असली संचालक, मिखाएल उमलाउफ़, के बगल में खड़े थे। उमलाउफ़ ने चुपचाप वादकों से कह दिया था कि वे बीथोवन के नहीं, उनके इशारों पर चलें, क्योंकि संगीतकार यह नहीं सुन सकते थे कि सब एक साथ बज रहे हैं या नहीं।
तो बीथोवन खड़े होकर उस संगीत के साथ झूमते रहे, जो सिर्फ़ उनके मन में बज रहा था, जबकि असली संगीत उनके चारों ओर गरज रहा था।
जब आख़िरी विशाल कोरस ख़त्म हुआ, तो हॉल में तूफ़ान-सा उठ गया। लोग तालियाँ बजाने, जयकार करने और खड़े होने लगे। लेकिन कहते हैं कि बीथोवन तब भी ऑर्केस्ट्रा की ओर मुँह किए खड़े थे, सुरलिपि में खोए हुए, कलाकारों से थोड़ा पीछे चल रहे थे। उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया।
गायिकाओं में से एक, युवा कॉन्ट्राल्टो कैरोलीन उंगर, आगे बढ़ीं और धीरे से उन्हें दर्शकों की ओर घुमा दिया। तभी उन्होंने देखा: पूरा थिएटर खड़ा था, तालियाँ बजा रहा था और हवा में टोपियाँ और रूमाल लहरा रहा था, ताकि वे वह तालियाँ देख सकें जो वे सुन नहीं सकते थे।
आनंद का गीत
इसके बाद बीथोवन तीन साल भी नहीं जिए। मार्च 1827 में वियना में उनकी मौत हुई, और हज़ारों लोग सड़कों पर उनकी शवयात्रा के पीछे चले।
नौवीं सिम्फ़नी उनके साथ ख़त्म नहीं हुई। आज वह दुनिया में सबसे ज़्यादा बजाई जाने वाली रचनाओं में से एक है। "ओड टू जॉय" की धुन को यूरोप का गान चुना गया। बर्लिन की दीवार गिरने का जश्न मनाने के लिए बर्लिन में इसे बजाया गया, और जापान में हर दिसंबर बड़े-बड़े कोरस इसे गाते हैं।
जिस आदमी ने कभी सोचा था कि सुन न पाने की वजह से उसकी ज़िंदगी ख़त्म हो गई है, उसने आगे चलकर ऐसा संगीत रचा जिसे पूरी दुनिया दो सौ साल बाद भी सुनती है।
और पढ़ना चाहते हैं?
जैन स्वाफ़र्ड की Beethoven: Anguish and Triumph इस संगीतकार की ज़िंदगी की एक भरपूर और पढ़ने में आसान कहानी है। हार्वी सैक्स की The Ninth इस सिम्फ़नी की और उस दुनिया की कहानी सुनाती है जिसमें इसका जन्म हुआ। और इस कहानी को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका है बस नौवीं सिम्फ़नी का आख़िरी हिस्सा सुन लेना।