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True Stories

इंतज़ार करने वाला कुत्ता

हर शाम एक बड़ा सफ़ेद कुत्ता टोक्यो के शिबुया स्टेशन पर अपने मालिक की ट्रेन का इंतज़ार करता था। एक दिन उसका मालिक घर नहीं लौटा। कुत्ता इंतज़ार करता रहा, लगभग दस साल तक।

  • 3 मिनट का पाठ
  • Ages 8+
  • True story
  • 1920s–1930s

ध्यान दें: इस कहानी में एक कुत्ते के मालिक की अचानक मौत, और बाद में कुत्ते की मौत का ज़िक्र है।

इस भाषा में पढ़ें

हफ़्ते के हर कामकाजी दिन की शाम, टोक्यो के शिबुया स्टेशन पर ट्रेनें आतीं, और भीड़ उमड़कर बाहर निकलती। दफ़्तर के कर्मचारी, विद्यार्थी और ख़रीदारी करने वाले जल्दी-जल्दी फाटकों से निकलकर गलियों में ओझल हो जाते।

और हर शाम, स्टेशन के निकास के पास, एक बड़ा सफ़ेद कुत्ता बैठा दरवाज़ों को ताकता रहता। उसके कान खड़े रहते। उसकी आँखें हर चेहरे को टटोलतीं।

वह एक आदमी का इंतज़ार कर रहा था। वह आदमी कभी नहीं आया। लेकिन कुत्ता अगले दिन फिर आया, और उसके अगले दिन भी, लगभग दस साल तक।

उत्तर से आया एक पिल्ला

कुत्ते का नाम था हाचिको। वह अकिता नस्ल का था, जो जापान के बर्फ़ीले उत्तर की एक बड़ी, मज़बूत नस्ल है। उसका जन्म नवंबर 1923 में अकिता प्रांत के ओदाते शहर में हुआ था।

जब वह कुछ ही हफ़्तों का था, तो उसे ट्रेन से टोक्यो एक नए घर भेजा गया। उसके मालिक थे प्रोफ़ेसर हिदेसाबुरो उएनो, जो टोक्यो की इंपीरियल यूनिवर्सिटी में खेती-बाड़ी का विज्ञान पढ़ाते थे। प्रोफ़ेसर उएनो को कुत्तों से बहुत प्यार था, और उन्होंने पिल्ले को अपने परिवार में अपना लिया। उन्होंने उसका नाम हाची रखा। "-को" बाद में जोड़ा गया, प्यार और आदर की निशानी के तौर पर।

स्टेशन पर इंतज़ार

प्रोफ़ेसर उएनो शिबुया स्टेशन से ज़्यादा दूर नहीं रहते थे। बहुत-से दिनों में वे वहीं से ट्रेन पकड़कर यूनिवर्सिटी जाते। सुबह हाची उनके साथ-साथ स्टेशन तक जाता।

फिर, ढलती दोपहर में, हाची वापस स्टेशन जाता और प्रोफ़ेसर की ट्रेन आने का इंतज़ार करता। जब उएनो बाहर निकलते, तो वह बड़ा कुत्ता उनका स्वागत करता, और दोनों साथ-साथ घर लौटते।

यह एक ख़ुशनुमा दिनचर्या थी। लेकिन यह बस साल भर से थोड़ा ज़्यादा ही चली।

वह दिन जब वे घर नहीं लौटे

मई 1925 में प्रोफ़ेसर उएनो यूनिवर्सिटी में काम कर रहे थे, जब वे अचानक गिर पड़े। उसी दिन उनकी मौत हो गई। वे फिर कभी शिबुया नहीं लौटे।

उस शाम हाची हमेशा की तरह स्टेशन गया। उसने इंतज़ार किया। ट्रेनें आईं और भीड़ गुज़रती रही, लेकिन प्रोफ़ेसर उनमें नहीं थे।

हाची अगले दिन फिर गया, और उसके अगले दिन भी। बाद के महीनों में वह अलग-अलग लोगों के साथ रहा, जिनमें प्रोफ़ेसर का माली भी था, जो शिबुया के पास रहता था। लेकिन वह कहीं भी रह रहा हो, हाची उसी समय के आसपास स्टेशन लौटता रहा, जब शाम की ट्रेन आया करती थी, और इंतज़ार करता रहा।

शिबुया का मशहूर कुत्ता

शुरू में स्टेशन पर हर कोई उसके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करता था। कुछ लोग उसे भगा देते। कुछ लड़के उसे छेड़ते।

फिर 1932 में, टोक्यो के एक अख़बार ने उस वफ़ादार कुत्ते पर एक लेख छापा, जो अब भी रोज़ अपने गुज़र चुके मालिक का इंतज़ार करता था। पूरे जापान में लोगों का दिल भर आया। लोग हाचिको को देखने आने लगे। स्टेशन के कर्मचारी और खाना बेचने वाले उसकी देखभाल करते और उसे खाने की अच्छी-अच्छी चीज़ें देते। शिक्षक वफ़ादारी की मिसाल के तौर पर अपने छात्रों को यह कहानी सुनाते।

कुछ लोगों ने सोचा है कि क्या हाचिको इसलिए भी स्टेशन आता था कि खाना बेचने वाले उसे खिलाते थे। शायद यह भी एक वजह रही हो। लेकिन लगभग दस साल तक, तपती गर्मियों और बर्फ़ीली सर्दियों में, वह ठीक उसी जगह लौटता रहा जहाँ उसने आख़िरी बार अपने दोस्त का इंतज़ार किया था।

1934 में शिबुया स्टेशन के बाहर हाचिको की काँसे की एक मूर्ति लगाई गई। कहा जाता है कि जब उसका अनावरण हुआ, तो ख़ुद हाचिको भी वहाँ मौजूद था।

फिर से साथ

हाचिको की मौत 8 मार्च 1935 को शिबुया की एक गली में, ग्यारह साल की उम्र में हुई। पूरे जापान में लोगों ने उसका शोक मनाया।

उसके शरीर को सावधानी से सहेजकर रखा गया, और वह आज भी टोक्यो के उएनो में नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ नेचर एंड साइंस में देखा जा सकता है। उसके कुछ अवशेष आओयामा क़ब्रिस्तान में प्रोफ़ेसर उएनो की क़ब्र के बगल में दफ़नाए गए।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान काँसे की वह मूर्ति धातु के लिए पिघला दी गई। लेकिन युद्ध के बाद, 1948 में, मूल मूर्तिकार के बेटे ने एक नई मूर्ति बनाई, और उसे उसी जगह लगाया गया।

वह मूर्ति आज भी वहीं है, और पूरे टोक्यो में मिलने की सबसे जानी-मानी जगहों में से एक है। दोस्त बस इतना तय कर लेते हैं कि हाचिको पर मिलेंगे। हर दिन हज़ारों लोग उसके पास से गुज़रते हैं, और बहुत-से रुककर उसका पंजा छूते हैं या तस्वीर खींचते हैं।

2015 में टोक्यो यूनिवर्सिटी ने अपने परिसर में एक नई मूर्ति लगाई। उसमें वह दिखाया गया है जिसका इंतज़ार हाचिको ने उन तमाम सालों में किया: प्रोफ़ेसर, आख़िरकार घर लौटते हुए, और उनका कुत्ता उछलकर उनका स्वागत करते हुए।

और पढ़ना चाहते हैं?

पामेला एस. टर्नर की Hachiko: The True Story of a Loyal Dog यह कहानी छोटे पाठकों के लिए, स्टेशन पर मौजूद एक लड़के की नज़र से सुनाती है। ख़ुद हाचिको को टोक्यो के नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ नेचर एंड साइंस में देखा जा सकता है।

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