← Back to stories

Kindness

मदुरै के आँखों के डॉक्टर

अट्ठावन की उम्र में, जब ज़्यादातर लोग रिटायर हो जाते हैं, डॉ. जी. वेंकटस्वामी ने मदुरै के एक मकान में ग्यारह बिस्तरों वाला आँखों का अस्पताल खोला। गठिया से उनकी उँगलियाँ टेढ़ी हो चुकी थीं। उनका लक्ष्य था बेवजह के अंधेपन को ख़त्म करना।

  • 4 मिनट की कहानी
  • Ages 12+
  • Biography
  • 1910s–2000s
इस भाषा में पढ़ें

टेढ़ी उँगलियों वाले बुज़ुर्ग ने ऑपरेशन के औज़ार उठाए।

उनके हाथ ऐसे दिखते थे मानो मुश्किल से क़लम पकड़ पाते हों। रूमेटॉइड गठिया ने बरसों पहले उनकी उँगलियाँ मोड़कर बेडौल कर दी थीं। फिर भी माइक्रोस्कोप के नीचे वे हाथ सधे हुए चलते, और कुछ ही मिनटों में मोतियाबिंद से अंधा हो चुका एक मरीज़ फिर से देखने को तैयार होता।

माना जाता है कि अपने काम के जीवन में डॉ. गोविंदप्पा वेंकटस्वामी ने लगभग एक लाख आँखों के ऑपरेशन किए। पर उनका सबसे बड़ा काम अट्ठावन की उम्र में शुरू हुआ, जिस उम्र में उन्हें रिटायर कर दिया गया।

गाँव का लड़का

उनका जन्म 1918 में दक्षिणी तमिलनाडु के खेती-बाड़ी वाले एक गाँव में हुआ। शुरू में गाँव में कोई स्कूल नहीं था, और उन्होंने अपने पहले अक्षर रेत पर लिखे। बाद में वे स्कूल पहुँचने के लिए हर दिन लंबी दूरी पैदल तय करते थे।

उन्होंने मदुरै में रसायन शास्त्र पढ़ा और फिर मद्रास में डॉक्टरी। उन्होंने अपने ही परिवार की औरतों को बच्चे को जन्म देते हुए मरते देखा था, और वे माँओं की देखभाल करने वाला डॉक्टर बनना चाहते थे। डिग्री लेने के बाद वे सेना की मेडिकल कोर में भर्ती हो गए।

फिर, लगभग तीस की उम्र में, उनका शरीर ही उनके ख़िलाफ़ हो गया। उन्हें गंभीर रूमेटॉइड गठिया हो गया। क़रीब एक साल तक वे मुश्किल से बिस्तर से उठ पाते थे। उनके जोड़ सूज गए, और उनकी उँगलियाँ हमेशा के लिए मुड़ी रह गईं। सेना ने उन्हें छुट्टी दे दी।

फिर से सीखना

जब वे दोबारा खड़े हो पाए, तो वे फिर पढ़ाई करने लौटे। उन्होंने नेत्र-चिकित्सा चुनी, यानी आँखों का इलाज। यह बारीक काम है, जो हाथों से किया जाता है, और उन्हें औज़ार पकड़ने के ऐसे तरीक़े सीखने पड़े जो उनकी अकड़ी उँगलियाँ सँभाल सकें। वे तब तक अभ्यास करते रहे जब तक उनके ऑपरेशन किसी से कम अच्छे न हो गए।

आगे चलकर वे मदुरै के सरकारी मेडिकल कॉलेज में आँखों के विभाग के प्रमुख बने। वे जहाँ भी देखते, उन्हें ऐसे लोग दिखते जो बिना किसी ठीक वजह के अंधे थे। लाखों भारतीयों की आँखों की रोशनी मोतियाबिंद ने छीन ली थी, आँख के लेंस का धुँधला हो जाना, जो एक छोटे-से ऑपरेशन से ठीक हो सकता है। वे बस इसलिए अंधे थे कि किसी सर्जन तक पहुँच नहीं पाते थे, या पैसे नहीं दे सकते थे।

वे अपनी टीम को लेकर गाँवों में जाने लगे। वे स्कूलों और मंदिरों में आँखों के शिविर लगाते, एक बार में सैकड़ों लोगों की जाँच करते, और जिन्हें ऑपरेशन की ज़रूरत होती उन्हें अस्पताल ले आते।

ग्यारह बिस्तर

1976 में वे सरकारी रिटायरमेंट की उम्र तक पहुँच गए। वे अट्ठावन बरस के थे। ज़्यादातर लोग आराम करते। उन्होंने एक अस्पताल शुरू किया।

परिवार की मदद से उन्होंने मदुरै के एक मकान में अरविंद आई हॉस्पिटल खोला, ग्यारह बिस्तरों के साथ। उन्होंने इसका नाम दार्शनिक श्री अरविंद के नाम पर रखा, जिनके विचारों से उन्हें प्रेरणा मिलती थी। कई बिस्तर उन मरीज़ों के लिए अलग रखे गए जो कुछ भी नहीं दे सकते थे। उनकी बहन डॉ. जी. नाच्चियार और उनके पति डॉ. पी. नम्पेरुमलसामी, दोनों आँखों के डॉक्टर, उनके साथ जुड़ गए, और बाद में परिवार के और लोग भी आए।

विचार सीधा-सादा था। जो मरीज़ पैसे दे सकते थे, वे देंगे। उनकी फ़ीस से उन लोगों के इलाज का ख़र्च निकलेगा जो नहीं दे सकते। हर किसी को उन्हीं डॉक्टरों से एक जैसा इलाज मिलेगा।

इसे चलाने के लिए अस्पताल को बहुत कुशलता से काम करना था। डॉ. वी, जैसा कि सब उन्हें बुलाते थे, इस बात से बहुत प्रभावित थे कि मैकडॉनल्ड्स के रेस्तराँ दुनिया भर में एक ही खाना कितनी तेज़ी और भरोसे से परोसते हैं। वे सोचते थे कि आँखों का इलाज भी उतनी ही सावधानी से क्यों नहीं संगठित किया जा सकता। अरविंद में नर्सों और सहायकों को तैयारी और जाँच का काम करने की ट्रेनिंग दी गई, ताकि हर सर्जन अपना समय उसी काम पर लगा सके जो सिर्फ़ सर्जन कर सकता है। दो ऑपरेशन टेबल साथ-साथ रखी जातीं, ताकि सर्जन एक मरीज़ का काम ख़त्म करके सीधे अगले की ओर मुड़ सके।

लाखों के लिए रोशनी

अस्पताल बढ़ता ही गया। तमिलनाडु के दूसरे शहरों में और उसके बाहर भी नए अरविंद अस्पताल खुले। ज़्यादातर मरीज़ अब भी बहुत कम या कुछ भी नहीं देते थे, फिर भी अस्पताल अपना ख़र्च ख़ुद चलाते थे।

1992 में अरविंद ने ऑरोलैब शुरू की, ताकि मोतियाबिंद के ऑपरेशन में लगने वाले नक़ली लेंस बनाए जा सकें। विदेश से आने वाले लेंस ग़रीब मरीज़ों के लिए बहुत महँगे थे। ऑरोलैब ने उन्हें क़ीमत के छोटे-से हिस्से में बनाया, और उसके लेंस आज बहुत-से देशों में इस्तेमाल होते हैं।

दुनिया भर से डॉक्टर और अस्पताल चलाने वाले अरविंद को समझने आए। आज अरविंद के अस्पताल हर साल लाखों मरीज़ों की जाँच और इलाज करते हैं।

आँखों की रोशनी

डॉ. वेंकटस्वामी ने कभी शादी नहीं की। वे सादगी से रहे और अस्सी पार की उम्र तक काम करते रहे, सुबह जल्दी उठते और वार्डों में जाते। 1973 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। जुलाई 2006 में मदुरै में उनका निधन हुआ।

कभी उन्होंने माँओं और बच्चों की देखभाल करने की उम्मीद की थी। उसके बजाय, उनके टेढ़े हाथों ने लाखों अजनबियों की आँखों में रोशनी लौटाने में मदद की, जिनमें से ज़्यादातर से वे कभी मिले भी नहीं।

और पढ़ना चाहते हैं?

पवित्रा के. मेहता और सुचित्रा शेनॉय की Infinite Vision डॉ. वी और अरविंद की कहानी बड़े विस्तार से बताती है। अरविंद आई केयर सिस्टम की वेबसाइट पर उसका इतिहास और आज का काम मौजूद है।

Read next

KindnessBiography

The Forest of Joy

A wealthy young lawyer saw a man dying of leprosy in the rain, and was afraid. Baba Amte spent the rest of his life overcoming that fear, and built a town where people the world had thrown away could live with dignity.

4 min readAges 12+✓ Read1910s–2000s
KindnessBiography

The Ocean of Kindness

He was called Vidyasagar, the ocean of learning. But the people of Bengal remember Ishwar Chandra Vidyasagar just as much for his kindness, to widows, to girls who wanted to learn, to a poet in trouble and to strangers at a railway station.

4 min readAges 10+✓ Read1820s–1890s
KindnessFable & folk tale

The True Bargain

A father gives his son twenty rupees and sends him off to make a good bargain. On the road, the boy meets a group of hungry holy men. This story of the young Guru Nanak has been told in Sikh homes for centuries.

4 min readAges 8+✓ ReadPunjab, late 15th century