लोमड़ और कौवी
एक कौवी को पनीर का एक बढ़िया टुकड़ा मिल गया है। भूखे लोमड़ को कुछ नहीं मिला। पर लोमड़ के पास कुछ और है: मीठी-मीठी बातें।
- 3 मिनट की कहानी
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Ancient Greece
सुबह-सुबह का वक़्त था, और एक कौवी एक खेत वाले घर के ऊपर से उड़ रही थी, तभी उसे कुछ बड़ा मज़ेदार दिखा।
रसोई की खिड़की पर, हवा में ठंडा होने के लिए, पीले रंग का एक गोल पनीर रखा था। और उसके पास, बिल्कुल अकेला, एक छोटा टुकड़ा पड़ा था, जिसे किसी ने काटकर भुला दिया था।
कौवी झपटकर नीचे आई, पनीर का टुकड़ा चोंच में दबाया और जितनी तेज़ी से पंख ले जा सकते थे, उड़ गई।
ऊँचे पेड़ पर
वह जंगल के किनारे एक ऊँचे पेड़ पर उड़कर गई और एक ऊँची डाल पर बैठ गई। नाश्ते के लिए यह बिल्कुल सही जगह थी। यहाँ ऊपर तक कोई नहीं पहुँच सकता था।
उसने पनीर को चोंच में कसकर पकड़ रखा था। उसकी ख़ुशबू गाढ़ी, मलाईदार और बड़ी स्वादिष्ट थी।
मैं इसे धीरे-धीरे खाऊँगी, उसने सोचा, एक-एक छोटा कौर।
तभी नीचे की पगडंडी पर एक लोमड़ चलता हुआ आया।
वह रात भर शिकार पर रहा था और कुछ नहीं पकड़ पाया था। उसका पेट ख़ाली था। और जैसे ही वह पेड़ के पास से गुज़रा, उसकी नाक फड़कने लगी।
सूँ, सूँ। पनीर!
उसने ऊपर देखा, और वहाँ कौवी बैठी थी, चोंच में पनीर लिए।
मीठी बातें
लोमड़ पेड़ के नीचे बैठ गया। वह पेड़ पर चढ़ नहीं सकता था। उड़ नहीं सकता था। पर वह बातें कर सकता था, और बातें बनाने में वह बहुत माहिर था।
"नमस्ते, प्यारी कौवी!" उसने अपनी सबसे विनम्र आवाज़ में पुकारा।
कौवी कुछ नहीं बोली। उसने अपना पनीर पकड़े रखा।
"वाह, वाह," लोमड़ ने कहा। "आज तो तुम कितनी सुंदर लग रही हो! मुझे नहीं लगता मैंने कभी इतने सुंदर पंख देखे हैं। कितने काले, कितने चमकदार। चाँदनी में स्याही के तालाब की तरह चमकते हैं।"
कौवी थोड़ा और तनकर बैठ गई। आज तक किसी ने उससे ऐसा नहीं कहा था।
"और तुम्हारी आँखें!" लोमड़ बोला। "कितनी चमकीली और होशियार। और तुम्हारा सिर उठाने का अंदाज़, कितना शान वाला, बिल्कुल रानी की तरह।"
कौवी ने अपने पंख फुला लिए। उसने सिर इधर-उधर घुमाया, ताकि लोमड़ देख सके कि वह कितनी चमकदार है।
बस एक गाना
"मुझे पूरा यक़ीन है," लोमड़ ने एक आह भरकर कहा, "कि तुम्हारी जैसी सुंदर चिड़िया की आवाज़ तो पूरे जंगल में सबसे सुंदर होगी। काश मैं उसे बस एक बार सुन पाता, तो मैं जान जाता कि तुम सारी चिड़ियों की रानी हो।"
किसी ने कभी कौवी से नहीं कहा था कि उसकी आवाज़ सुंदर है। सच तो यह था कि ज़्यादातर चिड़ियाँ उससे चुप रहने को कहती थीं।
सारी चिड़ियों की रानी, उसने सोचा। अच्छा! तो मैं इसे दिखाती हूँ।
उसने सिर ऊपर उठाया। जितनी चौड़ी खुल सकती थी, उतनी चोंच खोली। और अपना सबसे अच्छा गाना गाया।
"काँव! काँव! काँव!"
पनीर नीचे गिर पड़ा। वह पत्तियों से लुढ़कता, एक डाल से टकराकर उछलता, सीधा लोमड़ के पैरों के पास आ गिरा।
लपक! लोमड़ ने उसे पकड़ा और एक ही कौर में निगल गया।
एक सलाह
लोमड़ ने होंठ चाटे और ऊपर कौवी की तरफ़ देखा।
"शुक्रिया," उसने कहा। "बड़ा स्वादिष्ट था। आवाज़ तो तुम्हारे पास पक्की है, प्यारी कौवी। अब तुम्हें बस थोड़ी और अक़्ल की ज़रूरत है।"
और वह पूँछ हिलाता हुआ पगडंडी पर आगे चल दिया।
कौवी अपनी ख़ाली चोंच लिए डाल पर बैठी रही और उसे ख़ुद पर बड़ी शर्म आई।
पर वह बुद्धू कौवी नहीं थी, सच में नहीं। उसे बस बहका दिया गया था। और उस दिन के बाद, जब भी कोई उससे बहुत मीठी बात कहता, वह हमेशा रुककर सोचती: इन्हें क्या चाहिए? और जब तक उसका नाश्ता ख़त्म न हो जाता, वह अपनी चोंच कसकर बंद रखती।
इस कहानी के बारे में
यह नीति-कथा प्राचीन यूनान के कहानीकार ईसप की मानी जाती है, और दो हज़ार साल से भी ज़्यादा समय से सुनाई जा रही है। यह हमें चापलूसी से सावधान करती है: ऐसी तारीफ़ जो दिल से नहीं की जाती, बल्कि कुछ पाने के लिए की जाती है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।