लोमड़ी और अंगूर
एक भूखी लोमड़ी को बेल पर ऊँचाई पर लटका चमकीले बैंगनी अंगूरों का गुच्छा दिखता है। वह उछलती है, बार-बार उछलती है। फिर वह एक बड़ी दिलचस्प बात कहती है।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Ancient Greece
गर्मियों के आख़िरी दिनों की एक गुनगुनी दोपहर थी, और एक लोमड़ी गाँव की एक पगडंडी पर चली जा रही थी।
वह दिन भर चलती रही थी। उसे खाने को एक भी चीज़ नहीं मिली थी। उसका पेट इतनी ज़ोर से गुड़गुड़ा रहा था कि झाड़ियों में बैठी चिड़ियाँ भी उसे सुन सकती थीं।
"गुड़-गुड़," पेट बोला।
"पता है, पता है," लोमड़ी ने कहा। "ढूँढ तो रही हूँ।"
दीवार पर बेल
पगडंडी पत्थर की एक पुरानी दीवार के पास से गुज़रती थी। और उस दीवार पर, ऊपर तक, अंगूर की एक बेल चढ़ी हुई थी।
लोमड़ी रुक गई। उसने सूँघा। उसने ऊपर देखा।
वहाँ, उसके सिर से बहुत ऊपर, अंगूरों का एक गुच्छा लटक रहा था। अंगूर गोल-गोल, बैंगनी और धूप में चमकते हुए थे। वे इतने पके और रसीले लग रहे थे कि मानो अभी फूट पड़ेंगे।
लोमड़ी ने होंठों पर जीभ फेरी।
"बिल्कुल यही चाहिए था," उसने कहा। "गरम दिन में मीठे, ठंडे अंगूर।"
उछलो, उछलो, उछलो
लोमड़ी नीचे झुक गई। उसने अपनी पूँछ हिलाई। फिर वह पूरी ताक़त से हवा में उछली।
उसकी नाक ऊपर, ऊपर, ऊपर गई... और उसने कुछ भी नहीं पकड़ा। अंगूर अब भी उससे बहुत ऊपर थे।
वह धप्प से नीचे आ गिरी।
"वह तो बस अभ्यास था," लोमड़ी ने कहा।
वह दौड़कर आने के लिए कुछ क़दम पीछे गई। वह दौड़ी, कूदी और गर्दन लंबी खींच ली।
खट्! फिर कुछ नहीं।
उसने एक पत्थर पर चढ़कर कूदने की कोशिश की। उसने तिरछा कूदकर देखा। उसने पिछले पैरों पर खड़े होकर, डगमगाते हुए, अगले पंजे हवा में हिलाकर भी देखा।
उछली, चूकी। उछली, चूकी। उछली, चूकी।
अंगूर हवा में धीरे-धीरे झूल रहे थे, मानो उस पर हँस रहे हों।
आख़िरकार लोमड़ी धूल में बैठ गई। उसे गर्मी लग रही थी। वह थक गई थी। उसके पैर दुख रहे थे, और खाने को अब भी कुछ नहीं था।
लोमड़ी ने क्या कहा
लोमड़ी बड़ी देर तक अंगूरों को देखती रही।
फिर वह उठी, अपने बालों से धूल झाड़ी और नाक ऊपर कर ली।
"हुँह," उसने ज़ोर से कहा, ताकि जो भी सुन रहा हो, सुन ले। "मुझे ये अंगूर चाहिए ही नहीं। साफ़ दिख रहा है, ये खट्टे हैं। शायद पके भी नहीं हैं। ऐसे खट्टे, पुराने अंगूर कौन खाना चाहेगा?"
और वह नाक ऊपर किए पगडंडी पर आगे चल दी, यह दिखाते हुए कि उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
दीवार पर बैठी एक नन्ही गौरैया उसे जाते हुए देखती रही।
"वे अंगूर खट्टे नहीं हैं," उसने अपने-आप से चहचहाकर कहा। "वे तो पूरी बेल के सबसे मीठे अंगूर हैं। बस वह उन तक पहुँच नहीं पाई।"
यह बात क्यों ज़रूरी है
लोमड़ी असल में अंगूरों से नाराज़ नहीं थी। वह इसलिए नाराज़ थी कि उसने कोशिश की थी और हार गई थी, और यह बुरा लगता है। इसलिए उस बुरे एहसास को भगाने के लिए उसने अपने-आप को एक छोटी-सी कहानी सुना दी। अंगूर तो वैसे भी खट्टे थे।
हम सब भी कभी-कभी ऐसा करते हैं। दौड़ में न जीतें, तो कह देते हैं, "मुझे जीतना ही नहीं था।" कोई खेल बहुत मुश्किल लगे, तो कह देते हैं, "यह तो बेकार खेल है।"
पर एक और रास्ता भी है। लोमड़ी कह सकती थी, "आज ये अंगूर मेरे लिए बहुत ऊँचे थे। शायद मुझे कोई सीढ़ी मिल जाए। शायद मैं किसी लंबे दोस्त से मदद माँग लूँ। या शायद मुझे खाने को कुछ और मिल जाए।" यह ईमानदारी है, और इससे दोबारा कोशिश करने का दरवाज़ा खुला रहता है।
इस कहानी के बारे में
यह छोटी-सी नीति-कथा प्राचीन यूनान के मशहूर कहानीकार ईसप की मानी जाती है। यह इतनी मशहूर है कि आज भी जब कोई ऐसी चीज़ को न चाहने का दिखावा करता है जो उसे मिल न सकी, तो लोग कहते हैं, "अंगूर खट्टे हैं।" यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।