करनाल की वह लड़की जिसने सितारों को छुआ
हरियाणा के एक छोटे-से शहर में पली-बढ़ी कल्पना चावला बचपन में हवाई जहाज़ देखती थीं और अंतरिक्ष यान बनाती थीं। आगे चलकर वे भारत में जन्मी पहली महिला बनीं जो अंतरिक्ष में गईं।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 9+
- Biography
- 1960s–2000s
कल्पना चावला का जन्म उत्तर भारत के राज्य हरियाणा के करनाल शहर में हुआ था। सरकारी काग़ज़ों में उनकी जन्मतिथि 1 जुलाई 1961 है, हालाँकि उनके परिवार का कहना है कि असल में उनका जन्म 17 मार्च 1962 को हुआ था। वे चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।
छोटी-सी कल्पना को रात में अपने घर की छत पर लेटकर तारे देखना बहुत अच्छा लगता था। वे हवाई जहाज़ों की तस्वीरें बनाती थीं। करनाल में एक फ़्लाइंग क्लब था, और वे वहाँ छोटे विमानों को उड़ते और उतरते देखा करती थीं। कभी-कभी वे अपने पिता के साथ साइकिल पर वहाँ जाती थीं।
उड़ान की पढ़ाई
स्कूल में वे विज्ञान और कला, दोनों में अच्छी थीं। स्कूल पूरा होने पर उन्होंने ऐलान किया कि वे एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, यानी हवाई जहाज़ों का विज्ञान, पढ़ना चाहती हैं।
1970 के दशक के आख़िरी सालों में भारत की किसी लड़की के लिए यह एक अनोखा फ़ैसला था। चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में अपनी कक्षा में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग पढ़ने वाली वे अकेली लड़की थीं। 1982 में उन्होंने अपनी डिग्री पूरी की।
उसी साल वे आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गईं। उन्होंने आर्लिंगटन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री ली, और फिर 1988 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो बोल्डर से पीएचडी की।
और ऊँचाई की ओर
पीएचडी के बाद कल्पना कैलिफ़ोर्निया में नासा के एम्स रिसर्च सेंटर में काम करने लगीं। वहाँ वे इस बात का अध्ययन करती थीं कि मुश्किल हालात में हवाई जहाज़ के चारों ओर हवा कैसे बहती है। वे पायलट भी बनीं, जिनके पास हवाई जहाज़, सीप्लेन और ग्लाइडर उड़ाने का लाइसेंस था, और वे उड़ान सिखाने वाली प्रशिक्षक भी बनीं।
1995 में नासा ने हज़ारों आवेदकों में से उन्हें अंतरिक्ष यात्री उम्मीदवार के रूप में चुना।
पहली उड़ान
19 नवंबर 1997 को कल्पना चावला पहली बार अंतरिक्ष में गईं। वे स्पेस शटल कोलंबिया पर मिशन STS-87 का हिस्सा थीं। वे मिशन स्पेशलिस्ट थीं और शटल की रोबोटिक बाँह की मुख्य संचालक थीं।
वे भारत में जन्मी पहली महिला बनीं जिन्होंने अंतरिक्ष में उड़ान भरी।
सोलह दिन के इस मिशन में उन्होंने और उनके साथियों ने धरती के 252 चक्कर लगाए और एक करोड़ किलोमीटर से ज़्यादा का सफ़र तय किया। बाद में उन्होंने बताया कि ऊपर से अपनी धरती को देखकर सब कुछ कितना छोटा और साझा लगता था, अंतरिक्ष से कोई सरहद दिखाई नहीं देती थी।
आख़िरी मिशन
जनवरी 2003 में कल्पना फिर कोलंबिया पर उड़ीं, मिशन STS-107 पर, जो सोलह दिन का एक विज्ञान मिशन था। सातों अंतरिक्ष यात्री दो पालियों में दिन-रात काम करते रहे और उन्होंने लगभग अस्सी प्रयोग किए।
लेकिन 16 जनवरी को लॉन्च के दौरान शटल के बाहरी ईंधन टैंक से फ़ोम इन्सुलेशन का एक टुकड़ा टूटकर कोलंबिया के बाएँ पंख के किनारे से टकराया था, जिससे उसकी गर्मी से बचाने वाली पट्टियाँ क्षतिग्रस्त हो गई थीं। शटल पर सवार किसी को नहीं पता था कि नुक़सान कितना गंभीर है।
1 फ़रवरी 2003 को जब कोलंबिया धरती के वायुमंडल से होकर लौट रहा था, तब बेहद गर्म गैसें टूटे हुए पंख में घुस गईं। फ़्लोरिडा में उतरने से सिर्फ़ सोलह मिनट पहले, टेक्सस के ऊपर शटल टूटकर बिखर गया।
सातों अंतरिक्ष यात्रियों की जान चली गई: रिक हसबैंड, विलियम मैककूल, माइकल एंडरसन, डेविड ब्राउन, लॉरेल क्लार्क, इलान रामोन और कल्पना चावला।
उनकी विरासत
इस हादसे के बाद नासा के काम करने के तरीक़े और अंतरिक्ष उड़ानों की सुरक्षा में बड़े बदलाव हुए।
भारत में कल्पना चावला को एक राष्ट्रीय नायिका के रूप में याद किया जाता है। स्कूलों, छात्रावासों, छात्रवृत्तियों, एक मेडिकल कॉलेज और एक उपग्रह का नाम उनके नाम पर रखा गया है। 2003 में भारत ने उनके सम्मान में अपने पहले समर्पित मौसम उपग्रह मेटसैट-1 का नाम बदलकर कल्पना-1 रख दिया। अमेरिका में भी उन्हें इमारतों और पुरस्कारों के ज़रिए याद किया जाता है, और 2020 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक सामान ले जाने वाले एक कार्गो अंतरिक्ष यान का नाम एस.एस. कल्पना चावला रखा गया।
उन्होंने भारतीय लड़कियों की एक पूरी पीढ़ी को यह विश्वास दिलाया कि वे भी वैज्ञानिक, इंजीनियर और अंतरिक्ष यात्री बन सकती हैं। दो दशक बाद, उनमें से बहुत-सी बन भी चुकी हैं।
और पढ़ना चाहते हैं?
कल्पना चावला की नासा की आधिकारिक अंतरिक्ष यात्री जीवनी nasa.gov पर मुफ़्त में उपलब्ध है। कोलंबिया दुर्घटना जाँच बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि शटल के साथ क्या हुआ और क्यों।