आसमान से गिरी लड़की
1971 में क्रिसमस से एक दिन पहले अमेज़न के वर्षावन के ऊपर एक विमान हवा में टूट गया। सत्रह साल की जूलियाने कोप्के अपनी सीट से बँधी-बँधी तीन किलोमीटर नीचे गिरीं, और बच गईं।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- True story
- 1970s
ध्यान दें: इस कहानी में एक विमान दुर्घटना, चोटों और माता-पिता में से एक की मौत का ज़िक्र है।
जूलियाने कोप्के दो दुनियाओं के बीच बड़ी हुईं। उनके माता-पिता जर्मन जीव-वैज्ञानिक थे जो पेरू में काम करते थे। जब वे चौदह साल की थीं, तो उनके माता-पिता अमेज़न के वर्षावन के भीतर गहरे जाकर बस गए, ताकि वहाँ पांगुआना नाम का एक शोध केंद्र बना सकें। जूलियाने भी उनके साथ वहीं रहीं और जंगल के पेड़-पौधों, जानवरों और नदियों के बारे में सीखती रहीं।
उनके पिता ने उन्हें एक ज़रूरी सबक़ सिखाया था। उन्होंने कहा था, अगर कभी जंगल में रास्ता भटक जाओ, तो पानी ढूँढना। किसी नाले के साथ-साथ ढलान की ओर चलती रहना, जब तक वह नदी न बन जाए। नदियाँ इंसानों तक ले जाती हैं।
क्रिसमस से एक दिन पहले
दिसंबर 1971 में जूलियाने सत्रह साल की थीं और उन्होंने पेरू की राजधानी लीमा से हाई स्कूल की पढ़ाई अभी-अभी पूरी की थी। 24 दिसंबर को वे और उनकी माँ लान्सा फ़्लाइट 508 में सवार हुईं। यह प्रोपेलर वाला विमान था, जिससे उन्हें पुकाल्पा शहर जाना था और फिर वहाँ से शोध केंद्र, ताकि क्रिसमस पिता के साथ मना सकें।
उड़ान को क़रीब आधा घंटा हुआ था कि विमान एक भयानक तूफ़ान में घुस गया। वह ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। ऊपर के रैक से सामान गिरने लगा। खिड़की से जूलियाने ने एक पंख पर रोशनी की तेज़ चमक देखी। विमान पर बिजली गिरी थी।
उन्होंने अपनी माँ को शांत स्वर में कहते सुना कि अब सब ख़त्म है। फिर विमान हवा में ही टूट गया।
गिरना
जूलियाने ने ख़ुद को विमान के बाहर पाया, अब भी सीटों की अपनी पंक्ति से बँधी हुई, आसमान से नीचे गिरती हुई। उन्हें याद है कि नीचे जंगल गोल-गोल घूम रहा था और ब्रोकली के गुच्छों जैसा दिख रहा था। फिर वे बेहोश हो गईं।
वे लगभग तीन किलोमीटर नीचे गिरीं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि शायद वे इसलिए बच गईं क्योंकि उनकी सीटों की पंक्ति हेलिकॉप्टर के पंखों की तरह घूम रही थी, जिससे गिरने की रफ़्तार धीमी हो गई, और इसलिए भी कि वर्षावन के घने पेड़ों की छतरी ने उनके गिरने की चोट को सँभाल लिया।
जब उनकी आँख खुली, तो अगला दिन हो चुका था। वे जंगल की ज़मीन पर अकेली पड़ी थीं, अब भी अपनी सीटों के नीचे। उनकी हँसली की हड्डी टूटी हुई थी, बाँह पर गहरा घाव था, सिर पर चोट से कन्कशन था और एक आँख सूजकर बंद हो गई थी। उनका चश्मा और एक जूता खो गया था। उन्होंने गर्मियों वाली एक छोटी-सी ड्रेस पहन रखी थी।
उनकी माँ का कहीं कोई पता नहीं था।
अकेली
पहले जूलियाने ने आवाज़ें लगा-लगाकर अपनी माँ और दूसरे बचे हुए लोगों को ढूँढा। कोई नहीं मिला। उन्हें ऊपर बचाव विमानों की आवाज़ सुनाई दी, लेकिन पेड़ों की छतरी इतनी घनी थी कि वे उन्हें देख ही नहीं सकते थे।
उनके पास टॉफ़ियों की एक छोटी-सी थैली थी, जो उन्हें मलबे के बीच मिली थी। खाने को और कुछ नहीं था।
फिर उन्हें याद आया कि उनके पिता ने क्या कहा था। उन्होंने एक छोटा-सा नाला ढूँढा और उसके साथ-साथ चलने लगीं।
पानी के पीछे-पीछे
कई दिनों तक जूलियाने उस नाले के साथ चलती रहीं, कभी किनारे पर तो कभी पानी में, और नाला धीरे-धीरे नदी बनता गया। वे पानी में इसलिए चलती थीं क्योंकि एक तो घनी झाड़ियों के बीच से रास्ता बनाने से यह आसान था, और दूसरे, नदी की तली की रेत में छिपी रहने वाली स्टिंगरे मछलियों के डंक मारने का ख़तरा तब कम रहता है जब आप पैर घसीटते हुए चलें। यह बात वे पांगुआना की ज़िंदगी से जानती थीं।
वे जानती थीं कि कौन-से जानवर ख़तरनाक हैं और कौन-से नहीं, और यह भी कि रात में जंगल की डरावनी आवाज़ें ज़्यादातर नुक़सान नहीं पहुँचातीं। जहाँ ज़रूरत पड़ी, वहाँ वे तैरीं भी, जबकि पिरान्हा और कैमन मगरमच्छों का ख़तरा था।
उनकी बाँह के घाव में मक्खियों के लार्वा पड़ गए। कीड़े-मकोड़े लगातार काटते रहे। वे कमज़ोर, और कमज़ोर होती गईं।
नाव
लगभग दसवें दिन उन्हें नदी के किनारे बँधी एक नाव मिली, और एक पगडंडी जो एक छोटी-सी झोंपड़ी तक जाती थी। वे समझ गईं कि कोई न कोई इसका इस्तेमाल ज़रूर करता होगा।
उन्हें एक डिब्बे में पेट्रोल मिला, जिसे उन्होंने बाँह के घाव पर डाला ताकि कीड़े बाहर निकल आएँ। यह तरीक़ा उन्होंने अपने पिता को एक कुत्ते पर आज़माते देखा था। फिर वे झोंपड़ी में लेटकर इंतज़ार करने लगीं। वे नाव नहीं लेना चाहती थीं, क्योंकि वह किसी और की थी।
अगले दिन जंगल में काम करने वाले कुछ लोग झोंपड़ी पर लौटे और उन्हें वहाँ पाया। पहले तो वे डर गए, उन्हें लगा कि शायद यह नदी की कोई आत्मा है। जूलियाने ने स्पैनिश में उन्हें बताया कि क्या हुआ था। उन्होंने उनके घावों की देखभाल की, और उसके अगले दिन वे उन्हें नाव से एक ऐसे शहर ले गए जहाँ उन्हें मदद मिल सकती थी।
अकेली बची
फ़्लाइट 508 में सवार बानवे लोगों में से सिर्फ़ जूलियाने कोप्के ज़िंदा बचीं। उनकी माँ की मौत हादसे में हो गई थी।
जूलियाने ने खोज दलों को मलबा ढूँढने में मदद की। फिर वे जर्मनी चली गईं, अपने माता-पिता की तरह जीव-विज्ञान पढ़ा, और ख़ुद भी जीव-वैज्ञानिक बनीं, जिनकी विशेषज्ञता चमगादड़ों में थी। आगे चलकर उन्होंने पांगुआना की देखरेख अपने हाथ में ले ली, जो अब एक संरक्षित प्राकृतिक अभयारण्य है, ताकि जिस जंगल ने उनकी जान बचाई, उसका अध्ययन और उसकी हिफ़ाज़त होती रहे।
और पढ़ना चाहते हैं?
जूलियाने ने अपनी कहानी अपने संस्मरण When I Fell From the Sky में ख़ुद सुनाई है। फ़िल्मकार वर्नर हर्ज़ोग, जिन्हें उसी विमान से जाना था लेकिन टिकट नहीं मिल पाया था, ने उनके साथ Wings of Hope नाम की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें वे हादसे की जगह पर लौटती हैं।