सुखी राजकुमार
सोने की एक मूर्ति, जो अपने शहर का सारा दुख देख सकती है, एक नन्हे अबाबील से कहती है कि वह उसके रत्न और सोना एक-एक करके बाँट दे। ऑस्कर वाइल्ड की एक कोमल परी-कथा।
- 6 मिनट का पाठ
- Ages 8+
- Classic retold
- 1880s
शहर से बहुत ऊपर, एक ऊँचे खंभे पर, सुखी राजकुमार की मूर्ति खड़ी थी।
वह सिर से पैर तक बढ़िया सोने के पतले पत्तरों से ढकी थी। उसकी आँखों की जगह दो चमकते नीलम थे, और उसकी तलवार की मूठ पर एक बड़ा लाल माणिक दमकता था। हर कोई उसकी तारीफ़ करता था। "यह उतना ही सुंदर है जितना छत पर लगा हवा-मुर्ग़ा," नगर परिषद के एक सदस्य ने कहा, जो चाहता था कि लोग उसे कला का पारखी समझें।
एक रात एक नन्हा अबाबील शहर के ऊपर से उड़ता हुआ आया। उसके साथी छह हफ़्ते पहले मिस्र जा चुके थे, लेकिन वह पीछे रुक गया था, क्योंकि उसे नदी किनारे के एक सरकंडे से प्यार हो गया था। अब उसे देर हो चुकी थी, वह अकेला था, और रातें ठंडी होती जा रही थीं।
"मैं कहाँ ठहरूँ?" उसने कहा। "उम्मीद है शहर ने मेरे लिए कुछ इंतज़ाम किया होगा।"
फिर उसकी नज़र ऊँचे खंभे पर खड़ी मूर्ति पर पड़ी। "मैं वहाँ ठहरूँगा," उसने कहा। "बढ़िया जगह है, ताज़ी हवा भी ख़ूब है।" और वह सुखी राजकुमार के पैरों के बीच आकर बैठ गया।
आँसू
वह अपना सिर पंख के नीचे छिपा ही रहा था कि उस पर पानी की एक बड़ी-सी बूँद गिरी। फिर एक और, फिर एक और। लेकिन आसमान साफ़ था, और तारे चमक रहे थे।
उसने ऊपर देखा। सुखी राजकुमार की आँखें आँसुओं से भरी थीं, और आँसू उसके सुनहरे गालों पर बह रहे थे।
"तुम कौन हो?" अबाबील ने पूछा।
"मैं सुखी राजकुमार हूँ।"
"तो फिर तुम रो क्यों रहे हो?"
"जब मैं ज़िंदा था और मेरे पास इंसान का दिल था," मूर्ति ने कहा, "तब मैं नहीं जानता था कि आँसू क्या होते हैं। मैं एक ऐसे महल में रहता था जहाँ दुख को आने की इजाज़त नहीं थी। बग़ीचे के चारों ओर एक ऊँची दीवार थी, और मैंने कभी यह पूछने की परवाह नहीं की कि उसके पार क्या है। मेरे दरबारी मुझे सुखी राजकुमार कहते थे, और मैं सुखी था भी, अगर मौज-मस्ती ही सुख है। ऐसे ही मैं जिया, और ऐसे ही मर गया। और अब, जब मैं मर चुका हूँ, उन्होंने मुझे यहाँ इतनी ऊँचाई पर खड़ा कर दिया है कि मैं अपने शहर की सारी बदसूरती और सारा दुख देख सकता हूँ। और भले ही मेरा दिल सीसे का बना है, मैं रोए बिना नहीं रह पाता।"
माणिक
"दूर, एक छोटी-सी गली में," मूर्ति ने आगे कहा, "एक ग़रीब का घर है। एक खुली खिड़की से मैं एक औरत को मेज़ पर बैठे देख सकता हूँ। उसका चेहरा दुबला और थका हुआ है, और उसके हाथ लाल हैं और सुई से छिदे हुए हैं, क्योंकि वह दर्ज़िन है। वह साटन के एक गाउन पर फूल काढ़ रही है, जिसे रानी की सबसे सुंदर सहेली अगले नृत्य-समारोह में पहनेगी। कोने में एक बिस्तर पर उसका छोटा बेटा बीमार पड़ा है। उसे बुख़ार है और वह संतरे माँग रहा है। उसकी माँ के पास उसे देने के लिए नदी के पानी के सिवा कुछ नहीं, इसलिए वह रो रहा है। अबाबील, नन्हे अबाबील, क्या तुम मेरी तलवार की मूठ से माणिक निकालकर उसे नहीं दे आओगे? मेरे पैर इस चबूतरे से जुड़े हैं, और मैं हिल नहीं सकता।"
"मिस्र में मेरा इंतज़ार हो रहा है," अबाबील ने कहा। लेकिन सुखी राजकुमार इतना उदास दिख रहा था कि वह एक रात रुकने को मान गया।
उसने बड़ा-सा माणिक निकाला और उसे चोंच में दबाकर छतों के ऊपर से उड़ चला। उसे वह घर मिल गया। लड़का बुख़ार में बिस्तर पर करवटें बदल रहा था, और माँ इतनी थकी थी कि उसे नींद आ गई थी। अबाबील ने माणिक मेज़ पर उसके अंगुश्ताने के पास रख दिया। फिर वह धीरे-धीरे बिस्तर के चारों ओर उड़ा और अपने पंखों से लड़के के माथे पर हवा करता रहा।
"कितनी ठंडक लग रही है," लड़के ने कहा। "मैं ज़रूर ठीक हो रहा हूँ।" और वह एक मीठी नींद में डूब गया।
जब अबाबील उड़कर सुखी राजकुमार के पास लौटा, तो बोला, "अजीब बात है, इतनी ठंड है, फिर भी मुझे काफ़ी गर्माहट महसूस हो रही है।"
"ऐसा इसलिए है क्योंकि तुमने एक नेक काम किया है," राजकुमार ने कहा।
नीलम
अगली रात अबाबील ने कहा कि अब उसे जाना ही होगा। लेकिन राजकुमार ने उससे एक रात और रुकने को कहा।
"शहर के उस पार, दूर, मुझे एक अटारी में एक नौजवान दिख रहा है। वह थिएटर के निर्देशक के लिए एक नाटक पूरा करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ठंड इतनी है कि वह और लिख नहीं पा रहा। वहाँ आग नहीं है, और भूख से वह बेहाल हो गया है।"
"क्या मैं उसे एक और माणिक दे आऊँ?" अबाबील ने पूछा।
"अब मेरे पास कोई माणिक नहीं," राजकुमार ने कहा। "मेरे पास बस मेरी आँखें बची हैं। ये दुर्लभ नीलम हैं, जो हज़ार साल पहले भारत से लाए गए थे। इनमें से एक निकाल लो और उसे दे आओ। वह इसे जौहरी को बेचकर लकड़ियाँ ख़रीदेगा, और अपना नाटक पूरा कर लेगा।"
"प्यारे राजकुमार," अबाबील ने कहा, "मैं यह नहीं कर सकता।" और वह रोने लगा।
लेकिन राजकुमार ने फिर कहा, और अबाबील ने वैसा ही किया जैसा उससे कहा गया था।
अगली रात राजकुमार ने उससे दूसरा नीलम नीचे चौक में बैठी एक छोटी-सी माचिस बेचने वाली लड़की को दे आने को कहा, जिसकी माचिसें नाली में गिर गई थीं और जिसे डर था कि उसके पिता उसे पीटेंगे।
"लेकिन फिर तो तुम पूरी तरह अंधे हो जाओगे," अबाबील ने कहा।
"जैसा मैं कहता हूँ, वैसा करो," राजकुमार ने कहा।
तो अबाबील ने राजकुमार की दूसरी आँख निकाली और उसे उस छोटी लड़की की हथेली पर गिरा दिया। "कितना प्यारा काँच का टुकड़ा है!" वह चिल्लाई, और हँसती हुई घर भाग गई।
फिर अबाबील लौट आया। "अब तुम अंधे हो," उसने कहा। "इसलिए मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।"
सोना
पूरी सर्दी अबाबील वहीं रहा। वह शहर के ऊपर उड़ता और राजकुमार को बताता कि उसने क्या देखा: अमीर लोग अपने सुंदर घरों में रंगरलियाँ मना रहे थे और भिखारी उनके दरवाज़ों पर बैठे थे; अँधेरी गलियों में भूखे बच्चे थे; एक पुल के नीचे दो छोटे लड़के गर्मी के लिए एक-दूसरे से लिपटकर लेटे थे।
"मैं बढ़िया सोने से ढका हूँ," राजकुमार ने कहा। "तुम इसे पत्तर-पत्तर उतारो, और मेरे ग़रीबों को दे दो।"
पत्तर-पत्तर करके अबाबील ने बढ़िया सोना उतारा, यहाँ तक कि सुखी राजकुमार बिल्कुल फीका और धूसर दिखने लगा। पत्तर-पत्तर करके वह उसे ग़रीबों तक ले गया, और बच्चों के गाल गुलाबी होने लगे, और वे गली में हँसने और खेलने लगे। "अब हमारे पास रोटी है!" वे चिल्लाए।
सर्दी
फिर बर्फ़ आई, और बर्फ़ के बाद पाला पड़ा। बेचारे नन्हे अबाबील को ठंड और ठंड लगती गई, लेकिन वह राजकुमार को छोड़कर नहीं गया। वह उससे बहुत प्यार करता था।
आख़िर में उसे समझ आ गया कि वह मरने वाला है। उसमें बस इतनी ताक़त बची थी कि एक बार और उड़कर राजकुमार के कंधे तक पहुँच सके।
"अलविदा, प्यारे राजकुमार। क्या मैं तुम्हारा हाथ चूम सकता हूँ?"
"मुझे ख़ुशी है कि आख़िरकार तुम मिस्र जा रहे हो, नन्हे अबाबील," राजकुमार ने कहा। "तुम यहाँ बहुत ज़्यादा दिन रुक गए। लेकिन तुम्हें मेरे होंठ चूमने होंगे, क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।"
"मैं मिस्र नहीं जा रहा," अबाबील ने कहा। "मैं मौत के घर जा रहा हूँ।" उसने सुखी राजकुमार के होंठ चूमे, और मरकर उसके पैरों में गिर पड़ा।
उसी पल मूर्ति के भीतर से एक अजीब-सी चटकने की आवाज़ आई, जैसे कुछ टूट गया हो। सीसे का दिल ठीक बीच से दो टुकड़े हो गया था।
दो सबसे क़ीमती चीज़ें
अगली सुबह-सुबह मेयर नगर परिषद के सदस्यों के साथ वहाँ से गुज़रे। "अरे! सुखी राजकुमार कितना फटेहाल दिख रहा है," उन्होंने कहा। "इसका माणिक गिर गया है, इसकी आँखें ग़ायब हैं, और यह अब सुनहरा भी नहीं रहा। यह किसी भिखारी से ज़रा ही बेहतर है। और इसके पैरों में तो सचमुच एक मरा हुआ पंछी पड़ा है!"
तो उन्होंने मूर्ति गिरा दी और उसे भट्ठी में गला दिया। लेकिन सीसे का टूटा दिल नहीं गला, इसलिए उन्होंने उसे कूड़े के ढेर पर फेंक दिया, जहाँ मरा हुआ अबाबील भी पड़ा था।
"शहर की दो सबसे क़ीमती चीज़ें मेरे पास लाओ," ईश्वर ने अपने एक फ़रिश्ते से कहा। और फ़रिश्ता उनके पास सीसे का दिल और मरा हुआ पंछी ले आया।
"तुमने ठीक चुना है," ईश्वर ने कहा। "मेरे स्वर्ग के बग़ीचे में यह नन्हा पंछी हमेशा-हमेशा गाता रहेगा, और मेरे सोने के नगर में सुखी राजकुमार मेरा गुणगान करेगा।"
इस कहानी के बारे में
ऑस्कर वाइल्ड (1854–1900) ने "द हैप्पी प्रिंस" परी-कथाओं के एक संग्रह के हिस्से के रूप में लिखी थी, जो पहली बार 1888 में छपा। कहा जाता है कि वे ऐसी कहानियाँ अपने छोटे बेटों को सुनाया करते थे। यह कहानी का एक छोटा किया हुआ रूप है, जो कुछ जगहों पर वाइल्ड के शब्दों के क़रीब रहता है; मूल कहानी पब्लिक डोमेन में है और उसे ज़ोर से पढ़कर सुनाने में बड़ा आनंद आता है।