हॉकी का जादूगर
ड्यूटी के बाद चाँद की रोशनी में हॉकी का अभ्यास करने वाले एक नौजवान सिपाही ने भारत को तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाए और खेल की दुनिया का एक दिग्गज बन गया।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 8+
- Biography
- 1920s–1940s
सेना की छावनी में सन्नाटा था। दिन की कवायद ख़त्म हो चुकी थी, बैरकों की बत्तियाँ बुझ रही थीं, और ज़्यादातर सिपाही सो चुके थे। लेकिन बाहर खुले मैदान में, पूरे चाँद की तेज़ रोशनी में, एक नौजवान सिपाही अब भी लगा हुआ था: हाथों में हॉकी स्टिक, पैरों के पास गेंद, थपकी, मोड़, ड्रिबल, बार-बार।
उन दिनों फ़्लडलाइट नहीं होती थीं। अगर उसे गेंद के साथ और वक़्त चाहिए था, तो चाँद से ही काम चलाना था।
उसका नाम था ध्यान सिंह। दुनिया उसे ध्यानचंद के नाम से याद रखने वाली थी।
एक सिपाही का बेटा
ध्यान का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर भारत के इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश भारतीय सेना में सिपाही थे, और परिवार एक तैनाती से दूसरी तैनाती पर जाता रहता था। पैसों की तंगी रहती थी, और ध्यान की पढ़ाई बार-बार छूटती रही। उन्होंने जल्दी ही स्कूल छोड़ दिया।
बचपन में उनकी दिलचस्पी हॉकी से ज़्यादा कुश्ती में थी। कभी-कभी वे दोस्तों के साथ जो भी डंडे मिल जाते, उनसे हॉकी खेल लेते, लेकिन कोई नहीं कह सकता था कि यह लड़का आगे चलकर चैंपियन बनेगा।
सोलह साल की उम्र में, अपने पिता की तरह, वे एक आम सिपाही के रूप में सेना में भर्ती हो गए।
चाँद और स्टिक
सेना में ध्यान ने रेजिमेंट के मैचों में ढंग से हॉकी खेलना शुरू किया। एक वरिष्ठ सिपाही, सूबेदार-मेजर बाले तिवारी, ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्हें खेल को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित किया।
ध्यान के दिन सेना के नाम थे: कवायद, ड्यूटी और हुक्म। इसलिए वे ड्यूटी पूरी होने के बाद अभ्यास करते, अक्सर देर शाम तक। कहा जाता है कि क्योंकि वे इतनी बार चाँदनी में अभ्यास करते थे, उनके दोस्त उन्हें "चाँद" कहने लगे। यह ठीक इसी तरह हुआ हो या नहीं, नाम चल पड़ा, और ध्यान सिंह बन गए ध्यानचंद।
उन सारे ख़ामोश घंटों का फल मिला। गेंद पर उनका क़ाबू लगभग अविश्वसनीय हो गया। डिफ़ेंडर कहते थे कि गेंद जैसे उनकी स्टिक से चिपकी रहती है। उनके साथी कहाँ होंगे, यह वे उनके वहाँ पहुँचने से पहले ही देख लेते, और कलाई के एक झटके से गेंद उन तक सरका देते।
एम्सटर्डम, 1928
1928 में भारत ने एम्सटर्डम के ओलंपिक खेलों में अपनी पहली हॉकी टीम भेजी। यूरोप में बहुत कम लोगों को उनसे कोई ख़ास उम्मीद थी।
फ़ाइनल तक के सफ़र में भारत ने एक भी गोल नहीं खाया। फ़ाइनल में उन्होंने मेज़बान नीदरलैंड्स को हराकर स्वर्ण पदक जीता। ध्यानचंद टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी थे। पत्रकार उन्हें जादूगर और बाज़ीगर कहने लगे।
यह किसी भी खेल में भारत का पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक था। देश तब भी अंग्रेज़ों के राज में था, लेकिन बहुत-से भारतीयों को यह जीत एक छोटे-से, गर्व भरे संकेत जैसी लगी कि उनका अपना देश क्या कुछ कर सकता है।
लॉस एंजेलिस और बर्लिन
अगले ओलंपिक में, 1932 में लॉस एंजेलिस में, भारत फिर जीता। ध्यानचंद अपने छोटे भाई रूप सिंह के साथ खेले, और दोनों ने मिलकर भारत के बहुत सारे गोल किए।
1936 में खेल बर्लिन में हुए। इस बार ध्यानचंद कप्तान थे।
टूर्नामेंट से ठीक पहले भारत एक अभ्यास मैच में जर्मनी से हार गया। यह एक झटका था, और टीम ने इसे सुधारने के लिए जी-जान से मेहनत की। जब असली टूर्नामेंट शुरू हुआ, तो भारत ने शानदार खेल दिखाया। 15 अगस्त 1936 को फ़ाइनल में, एक भारी भीड़ के सामने, उनका सामना फिर जर्मनी से हुआ। भारत 8–1 से जीता।
तीन ओलंपिक खेल। तीन स्वर्ण पदक।
बरसों में ध्यानचंद के बारे में बहुत-से क़िस्से बन गए: कि एक बार अधिकारियों ने यह जाँचने के लिए उनकी स्टिक तोड़ दी थी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं, या कि अडोल्फ़ हिटलर ने उन्हें जर्मन सेना में ऊँचा पद देने की पेशकश की थी। ये क़िस्से मशहूर हैं, लेकिन इनका कोई पक्का सबूत नहीं है, और इन्हें किंवदंती की तरह ही आनंद लेकर सुनना समझदारी है। असली कहानी अपने आप में काफ़ी अद्भुत है।
सादा जीवन, अमिट रोशनी
ध्यानचंद कई सालों तक सेना में रहे और तरक़्क़ी करते हुए मेजर के पद तक पहुँचे। वे 1940 के दशक के आख़िर तक खेलते रहे, और फिर युवा खिलाड़ियों को कोचिंग देने में मदद की। 1956 में उन्हें भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में से एक, पद्म भूषण, से सम्मानित किया गया।
निजी तौर पर वे विनम्र और सौम्य स्वभाव के माने जाते थे। वे अपने बारे में शायद ही कभी बात करते थे। अपने छोटे-से संस्मरण Goal! में वे अपने हुनर से कहीं ज़्यादा खेल और अपने साथियों के बारे में लिखते हैं।
1979 में उनका निधन हो गया। आज उनका जन्मदिन, 29 अगस्त, हर साल भारत के राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। 2021 में देश के सबसे बड़े खेल सम्मान का नाम उनकी याद में बदलकर मेजर ध्यानचंद खेल रत्न रखा गया।
जब भारत में युवा खिलाड़ी हॉकी स्टिक उठाते हैं और ढलती रोशनी में देर तक अभ्यास करते रहते हैं, तो वे उस सिपाही के क़दमों पर चल रहे होते हैं जो कभी चाँद के नीचे खेला करता था।
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ध्यानचंद का अपना छोटा-सा संस्मरण, Goal!, पहली बार 1952 में छपा था। उनका ओलंपिक रिकॉर्ड अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की आधिकारिक साइट Olympics.com पर दर्ज है।