ईमानदार लकड़हारा
एक ग़रीब लकड़हारे की इकलौती कुल्हाड़ी एक गहरी नदी में गिर जाती है। तभी पानी से एक अजनबी निकलता है, जिसके हाथ में चमचमाती सोने की कुल्हाड़ी है। "क्या यह तुम्हारी है?" वह पूछता है।
- 3 मिनट की कहानी
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Ancient Greece
बहुत समय पहले, एक बड़े हरे-भरे जंगल के किनारे एक लकड़हारा रहता था।
वह ग़रीब आदमी था। उसके घर में एक ही कमरा था, उसके कोट पर तीन पैबंद लगे थे, और उसके पास बस एक ही क़ीमती चीज़ थी: लकड़ी के हत्थे वाली एक पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी, जिसका हत्था उसके हाथों से घिसकर चिकना हो गया था।
हर सुबह वह जंगल में जाता, सूरज ऊपर चढ़ने तक लकड़ी काटता, और उसे बेचने गाँव ले जाता। काम कड़ा था, पर वह काम करते हुए सीटी बजाता रहता।
छपाक!
एक दिन वह एक गहरी, चौड़ी नदी के किनारे पेड़ काट रहा था। पानी गहरा हरा था और बिल्कुल शांत।
उसने कुल्हाड़ी चलाई। खट। फिर चलाई। खट। उसकी बाँहें थक गई थीं, और हाथ पसीने से भीगे थे। तीसरी बार चलाते ही कुल्हाड़ी उसकी उँगलियों से फिसल गई।
वह हवा में घूमती, उलटती-पलटती गई, और छपाक! से नदी में जा गिरी।
लकड़हारा दौड़कर किनारे पर पहुँचा। उसे कुछ बुलबुले दिखे, और फिर कुछ भी नहीं। नदी इतनी गहरी थी कि उसकी तली तक पहुँचना नामुमकिन था।
वह किनारे पर बैठ गया और सिर पकड़ लिया।
"हाय, मेरी कुल्हाड़ी," उसने उदास होकर कहा। "मेरी इकलौती कुल्हाड़ी। अब मैं लकड़ी कैसे काटूँगा? अपने परिवार का पेट कैसे भरूँगा?"
नदी से निकला अजनबी
तभी पानी झिलमिलाने लगा। नदी में से एक लंबा अजनबी ऊपर उठा। उसका चेहरा दयालु था और उसकी टोपी पर छोटे-छोटे पंख लगे थे। वह मर्करी था, देवताओं का दूत।
"तुम इतने उदास क्यों हो, लकड़हारे?" उसने पूछा।
लकड़हारे ने उसे फिसलते हत्थे और छपाक की पूरी बात बता दी।
"यहीं रुको," मर्करी ने कहा। और वह गहरे हरे पानी में डुबकी लगा गया।
पल भर में वह फिर ऊपर आया। उसके हाथ में शुद्ध सोने की एक कुल्हाड़ी थी। वह इतनी तेज़ चमक रही थी कि लकड़हारे की आँखें झपक गईं।
"क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?" मर्करी ने पूछा।
लकड़हारा बड़ी देर तक उसे देखता रहा। सोने की कुल्हाड़ी! ऐसी कुल्हाड़ी से तो वह नया घर ख़रीद सकता था। सौ नए कोट ख़रीद सकता था।
पर उसने सिर हिला दिया। "नहीं," उसने कहा। "यह मेरी नहीं है।"
चाँदी, और फिर लोहा
मर्करी ने फिर डुबकी लगाई। इस बार वह चमचमाती चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर ऊपर आया।
"तो क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?" उसने पूछा।
"नहीं," लकड़हारे ने कहा। "यह भी मेरी नहीं है।"
मर्करी तीसरी बार नीचे गया। जब वह ऊपर आया, तो उसके हाथ में लकड़ी के घिसे, चिकने हत्थे वाली एक सीधी-सादी पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी थी।
लकड़हारा उछलकर खड़ा हो गया। "हाँ! यही है! यही मेरी कुल्हाड़ी है!" वह चिल्लाया। "शुक्रिया, बहुत-बहुत शुक्रिया!"
मर्करी खुलकर, प्यार से मुस्कुराया।
"तुम सोने वाली के लिए हाँ कह सकते थे," उसने कहा। "चाँदी वाली के लिए हाँ कह सकते थे। पर तुमने सच बोला। इसलिए तीनों तुम्हारी हुईं।"
और उसने लकड़हारे को लोहे की कुल्हाड़ी, चाँदी की कुल्हाड़ी और सोने की कुल्हाड़ी, तीनों दे दीं। फिर वह वापस नदी में समा गया, और पानी फिर शांत हो गया।
लालची पड़ोसी
लकड़हारा जल्दी-जल्दी घर पहुँचा और गाँव में सबको बताया कि क्या हुआ था।
उसका पड़ोसी सुनता रहा, और उसकी आँखें बड़ी, और बड़ी होती गईं। सोने की कुल्हाड़ी, उसने सोचा। बस नदी में कुल्हाड़ी गिराने के बदले!
अगली ही सुबह पड़ोसी उसी नदी पर गया। उसने कोई लकड़ी नहीं काटी। उसने बस अपनी कुल्हाड़ी पानी में फेंक दी, छपाक!, और बैठकर रोने का नाटक करने लगा।
"ऊँ-ऊँ," वह बिलखा। "मेरी कुल्हाड़ी, मेरी बेचारी कुल्हाड़ी!"
पानी से मर्करी ऊपर आया। "क्या हुआ?" उसने पूछा।
"मेरी कुल्हाड़ी खो गई," पड़ोसी ने कहा।
मर्करी ने डुबकी लगाई और सोने की कुल्हाड़ी लेकर ऊपर आया। "क्या यही है?"
"हाँ! हाँ! यही मेरी है!" पड़ोसी चिल्लाया, और उसे झपटने के लिए हाथ बढ़ाया।
पर मर्करी ने उसे पीछे खींच लिया।
"यह सच नहीं है," उसने धीरे से कहा। और वह सोने की कुल्हाड़ी लेकर वापस नदी में समा गया, और पड़ोसी की अपनी कुल्हाड़ी भी लौटाकर नहीं लाया।
पड़ोसी ख़ाली हाथ घर लौटा। उसे पूरे एक महीने तक कुल्हाड़ी उधार माँगनी पड़ी, और हर बार माँगते हुए उसे ख़ुद पर बड़ी शर्म आती।
इस कहानी के बारे में
यह नीति-कथा प्राचीन यूनान के मशहूर कहानीकार ईसप की मानी जाती है, और यह पूरी दुनिया में सुनाई जाती है। भारत के कई घरों में यह मर्करी की जगह एक दयालु नदी देवी के साथ सुनाई जाती है, पर सीख हमेशा वही रहती है: ईमानदारी सबसे बड़ा ख़ज़ाना है। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।