करुणा का सागर
उन्हें विद्यासागर कहा जाता था, यानी ज्ञान का सागर। पर बंगाल के लोग ईश्वरचंद्र विद्यासागर को उतना ही उनकी दया के लिए भी याद करते हैं, विधवाओं के लिए, पढ़ना चाहने वाली लड़कियों के लिए, मुसीबत में पड़े एक कवि के लिए और रेलवे स्टेशन पर मिले अजनबियों के लिए।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 10+
- Biography
- 1820s–1890s
बंगाल के एक छोटे-से स्टेशन पर एक नौजवान ट्रेन से उतरा। उसने अच्छे कपड़े पहने थे और उसके पास एक भारी थैला था, और वह बेसब्री से इधर-उधर कुली ढूँढ़ रहा था। कोई कुली नहीं था।
सादी सूती चादर ओढ़े और चप्पल पहने एक सीधा-सादा आदमी उसके पास आया और थैला उठाने की पेशकश की। नौजवान को मदद पाकर ख़ुशी हुई। दोनों साथ-साथ उस घर तक गए जहाँ नौजवान को जाना था, और नौजवान ने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला।
अजनबी ने पैसे लेने से मना कर दिया। वह बस मुस्कुराया, और अपनी राह चल दिया।
कहानी कहती है कि उसी दिन बाद में वह नौजवान एक मशहूर विद्वान का भाषण सुनने गया, और उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया। मंच पर बैठे विद्वान वही आदमी थे जिन्होंने उसका थैला उठाया था।
एक मशहूर क़िस्सा
यह क़िस्सा बंगाल में सौ साल से भी ज़्यादा समय से, कई रूपों में सुनाया जाता रहा है। कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि यह कब हुआ, या ठीक ऐसे ही हुआ या नहीं। पर लोग इसे सुनाते रहे, क्योंकि यह बिल्कुल उन्हीं जैसा लगता था। वे विद्वान थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर, और वे कभी नहीं मानते थे कि ईमानदारी का कोई भी काम उनकी शान के ख़िलाफ़ है।
बीरसिंहा का लड़का
उनका जन्म 1820 में बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले के बीरसिंहा गाँव में हुआ। उनका परिवार ग़रीब था। उनके पिता कलकत्ता में थोड़ी-सी तनख़्वाह पर काम करते थे, और लड़के को पढ़ने के लिए वहीं भेज दिया गया।
वे होशियार थे और धुन के पक्के। आज भी क़िस्से सुनाए जाते हैं कि कैसे उन्होंने कलकत्ता की सड़क के किनारे लगे मील के पत्थरों से अंग्रेज़ी अंक सीखे, और कैसे वे रात को सड़क के लैंप के नीचे पढ़ते थे, क्योंकि घरवाले तेल का ख़र्च नहीं उठा सकते थे। कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में उन्होंने इतना शानदार काम किया कि उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई, यानी ज्ञान का सागर। तब वे बीस के भी नहीं हुए थे।
आगे चलकर वे उसी कॉलेज के प्रिंसिपल बने। उन्होंने उसके दरवाज़े उन छात्रों के लिए खोले जो ब्राह्मण नहीं थे, जिसका बहुत-से पुराने ख़याल के विद्वानों ने विरोध किया। उन्होंने बर्णपरिचय लिखी, बांग्ला वर्णमाला सीखने की एक आसान किताब। बंगाल के परिवार पीढ़ियों तक इसी से अपने बच्चों को पढ़ना सिखाते रहे।
विधवाएँ
जिस बात ने उन्हें सबसे ज़्यादा झकझोरा, वह थी विधवाओं की तकलीफ़।
उन दिनों बहुत-सी लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में कर दी जाती थी, कभी-कभी उनसे बहुत बड़े आदमियों से। अगर पति मर जाता, तो लड़की विधवा हो जाती, चाहे वह अभी बच्ची ही क्यों न हो। उसे दोबारा शादी करने की इजाज़त नहीं थी। उसे अच्छा खाना और रंगीन कपड़े छोड़ने पड़ते, और अक्सर वह सारी ज़िंदगी किसी और के घर में बोझ बनकर काटती।
विद्यासागर ने पुराने संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया और उन्हीं के आधार पर तर्क दिया कि विधवाओं का पुनर्विवाह जायज़ है। उन्होंने लिखा, बोले और हस्ताक्षर इकट्ठा किए। बहुत-से ताक़तवर लोग आगबबूला हो गए, और उन्हें धमकियाँ मिलीं। पर 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह क़ानून लागू हो गया।
काग़ज़ पर लिखा क़ानून काफ़ी नहीं था। विद्यासागर ने विधवाओं की पहली शादियाँ ख़ुद करवाने में मदद की और अक्सर उनका ख़र्च भी उठाया, भले ही इससे वे क़र्ज़ में डूब गए। 1870 में उनके अपने बेटे नारायण ने, उनके आशीर्वाद से, एक विधवा से शादी की।
उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए भी संघर्ष किया। उन्होंने पूरे बंगाल में लड़कियों के बहुत-से स्कूल खुलवाने में मदद की, उस ज़माने में जब ज़्यादातर लोग सोचते थे कि लड़कियों को पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं।
वर्साय में एक कवि
उनकी दया सुधार के कामों पर ही ख़त्म नहीं होती थी। वह लोगों की निजी ज़िंदगी तक पहुँचती थी।
1860 के दशक में बांग्ला के महान कवि माइकल मधुसूदन दत्त अपने परिवार के साथ फ़्रांस में रह रहे थे। उनके पैसे ख़त्म हो चुके थे और वे भारी क़र्ज़ में डूबे थे, और उन्हें डर था कि कहीं उन्हें जेल न भेज दिया जाए। हताश होकर उन्होंने विद्यासागर को चिट्ठी लिखी। विद्यासागर ने पैसे जुटाए, कुछ ख़ुद क़र्ज़ लेकर, और उन्हें भेज दिए। उनकी वे चिट्ठियाँ आज भी मौजूद हैं।
मधुसूदन यह बात कभी नहीं भूले। एक कविता में उन्होंने विद्यासागर की तारीफ़ सिर्फ़ ज्ञान के सागर के रूप में ही नहीं, बल्कि करुणा के सागर के रूप में भी की।
विद्यासागर बहुत-से छोटे तरीक़ों से भी देते रहे। वे छात्रों की फ़ीस भरते, ग़रीब परिवारों को पैसे भेजते और अपने दरवाज़े पर आए भूखों को खाना खिलाते। अक्सर वे इतना दे देते कि अपने लिए बहुत कम बचता।
आख़िरी बरस
अपने आख़िरी बरसों में, थके हुए और बीमार, वे लंबे-लंबे समय करमाटांड़ में बिताते थे, संथाल इलाक़े की एक छोटी-सी जगह, जो आज झारखंड में है। उन्होंने वहाँ बग़ीचे वाला एक घर ख़रीदा। वे संथाल गाँववालों का होम्योपैथी दवाइयों से इलाज करते, उनके लिए खाना और कपड़े ख़रीदते, और दोस्तों की तरह उनके साथ बैठकर बातें करते।
जुलाई 1891 में कलकत्ता में उनका निधन हुआ। आज करमाटांड़ के रेलवे स्टेशन का नाम उन्हीं के नाम पर है: विद्यासागर।
उनके नाम के लिए यह जगह कितनी सही लगती है। एक स्टेशन, जहाँ बहुत पहले, कहानी कहती है, अच्छे कपड़े पहने एक नौजवान ने सीखा था कि असली महानता कैसी दिखती है।
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