दीपक वाली महिला
फ़्लोरेंस नाइटिंगेल से उम्मीद की जाती थी कि वे किसी अच्छे घर में शादी करेंगी और एक शांत, आरामदेह ज़िंदगी जिएँगी। इसके बजाय वे रात में सेना के एक गंदे अस्पताल के वार्डों में घूमती रहीं, और फिर आँकड़ों के सहारे बदल दिया कि दुनिया बीमारों की देखभाल कैसे करती है।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- Biography
- 1820s–1910
ध्यान दें: इस कहानी में युद्ध के समय के एक अस्पताल का, घायल सैनिकों का, और बीमारी से हुई बहुत-सी मौतों का ज़िक्र है।
कहा जाता था कि अस्पताल के गलियारे मीलों तक फैले हुए थे। रात में वे अँधेरे और ठंडे होते थे, और उनके दोनों तरफ़ पतले गद्दों पर सैनिक लेटे रहते थे, जिनमें से बहुत-से इतने बीमार थे कि सो भी नहीं पाते थे।
देर शाम एक दुबली-पतली औरत हाथ में एक छोटा-सा दीपक लिए उनके बीच से धीरे-धीरे गुज़रती थी। वह रुककर किसी की पट्टी देखती, कुछ धीमे शब्द कहती, किसी की माँ के लिए संदेश लिख देती। सैनिक उसकी रोशनी की राह देखने लगे थे।
उसका नाम फ़्लोरेंस नाइटिंगेल था, और उसके आने से पहले रात में इन आदमियों की देखभाल करने वाला लगभग कोई नहीं था।
एक अलग पुकार
फ़्लोरेंस का जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ़्लोरेंस शहर में हुआ था, और उनका नाम उसी शहर पर रखा गया। उनके माता-पिता अमीर अंग्रेज़ थे जो बहुत घूमते-फिरते थे। वे और उनकी बहन गाँव-देहात के बड़े-बड़े घरों में पलीं, और उनके पिता ने उन्हें भाषाएँ, इतिहास, दर्शन और गणित पढ़ाया।
फ़्लोरेंस को गणित से बहुत लगाव था। वे होशियार, बेचैन और गंभीर थीं। किशोर उम्र में उन्हें यह विश्वास हो गया कि ईश्वर उन्हें कोई बड़ा काम करने के लिए पुकार रहा है, हालाँकि शुरू में उन्हें पता नहीं था कि वह काम क्या है।
धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि वे नर्स बनना चाहती हैं।
उनका परिवार सुनकर सन्न रह गया। उन दिनों अस्पताल बड़ी मनहूस जगहें होते थे, और उनके वर्ग की किसी औरत के लिए नर्सिंग इज़्ज़तदार काम नहीं माना जाता था। उनकी माँ और बहन बहुत दुखी हुईं। बरसों तक फ़्लोरेंस को लगता रहा कि वे फँस गई हैं।
उन्होंने शादी के प्रस्ताव ठुकरा दिए और छिपकर पढ़ाई करती रहीं, अस्पतालों और जन-स्वास्थ्य पर रिपोर्टें पढ़ती रहीं। आख़िरकार, 1850 और 1851 में, वे जर्मनी के काइज़रवर्थ में एक ईसाई नर्सिंग संस्था में प्रशिक्षण लेने गईं। 1853 में वे लंदन में औरतों के एक छोटे-से अस्पताल की सुपरिंटेंडेंट बनीं।
स्कूटारी
1854 में ब्रिटेन, फ़्रांस और ऑटोमन साम्राज्य ने रूस से युद्ध छेड़ दिया, जिसे आगे चलकर क्रीमिया युद्ध कहा गया। जल्दी ही अख़बारों की ख़बरें लंदन पहुँचने लगीं, जिनमें घायल ब्रिटिश सैनिकों की भयानक हालत का बयान होता था।
सरकार ने फ़्लोरेंस से कहा कि वे नर्सों के एक दल को लेकर स्कूटारी के मुख्य ब्रिटिश सैनिक अस्पताल जाएँ, जो कॉन्स्टेंटिनोपल के सामने पानी के उस पार था, आज के इस्तांबुल में। वे अड़तीस नर्सों के साथ निकलीं और नवंबर 1854 में वहाँ पहुँचीं।
वहाँ उन्होंने जो देखा, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था। अस्पताल एक विशाल पुरानी बैरक थी, जो टूटे हुए सीवरों के ऊपर बनी थी। वहाँ चूहे और पिस्सू थे। न पूरे बिस्तर थे, न कंबल, न साफ़ कमीज़ें, न साबुन, न ढंग का खाना। जितने सैनिक अपने घावों से मर रहे थे, उससे कहीं ज़्यादा हैज़ा, टाइफ़स और पेचिश जैसी बीमारियों से मर रहे थे।
शुरू में सेना के कुछ डॉक्टर तो नर्सों को वहाँ देखना ही नहीं चाहते थे।
अफ़रा-तफ़री में व्यवस्था
फ़्लोरेंस ने बहस नहीं की। उन्होंने बस काम करना, और चीज़ों को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया।
उन्होंने ब्रिटेन में जुटाए गए पैसों से सामान ख़रीदा। उन्होंने एक धोबीघर बनवाया, ताकि आदमियों को साफ़ कपड़े और चादरें मिलें। उन्होंने ढंग की रसोई और बेहतर खाने का इंतज़ाम किया। उन्होंने ध्यान रखा कि वार्डों की सफ़ाई हो और बीमारों को नहलाया जाए। उन्होंने अनगिनत चिट्ठियाँ लिखीं, और हर चीज़ का बारीकी से हिसाब रखा।
और रात में, वे अपना दीपक लेकर वार्डों में घूमतीं।
मार्च 1855 में सरकार ने अस्पताल में एक सैनिटरी कमीशन भेजा। उसके कामगारों ने सीवर साफ़ किए, कूड़ा हटाया और वार्डों में ताज़ी हवा का इंतज़ाम सुधारा। इसके बाद स्कूटारी में मौतों की दर तेज़ी से गिर गई।
ब्रिटेन में अख़बारों ने उस औरत के बारे में लिखा जो रात में वार्डों में घूमती थी। 1857 में अमेरिकी कवि हेनरी वड्सवर्थ लॉन्गफ़ेलो ने उन पर एक कविता लिखी, और यह नाम हमेशा के लिए जुड़ गया: दीपक वाली महिला।
आँकड़ों वाली महिला
फ़्लोरेंस 1856 में घर लौटीं, थकी-हारी और बीमार। युद्ध के दौरान उन्हें बुखार ने जकड़ लिया था, और अपनी बाकी ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्से में वे बीमार रहीं और अक्सर बिस्तर पर ही रहती थीं।
लेकिन उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा। बल्कि वे और ज़्यादा मेहनत करने लगीं।
उन्होंने देखा था कि सैनिकों की ज़्यादातर मौतें गंदगी, भीड़ और ख़राब नालियों की वजह से हुई थीं, और उन्हें रोका जा सकता था। इसे साबित करने के लिए उन्होंने अपने पुराने प्यार, गणित, का सहारा लिया। उन्होंने सेना के आँकड़े जुटाए और उन्हें साफ़, रंग-बिरंगे चित्रों में बनाया, जो एक गोले की फाँकों की तरह बँटे थे, ताकि व्यस्त नेता एक नज़र में देख सकें कि कितने आदमी ऐसी बीमारियों से मरे थे जिनसे उन्हें मरना नहीं चाहिए था। यह लोगों को सरकारी नीति बदलने के लिए राज़ी करने में चित्रों के सबसे शुरुआती इस्तेमालों में से एक था।
1858 में वे रॉयल स्टैटिस्टिकल सोसाइटी की फ़ेलो चुनी जाने वाली पहली महिला बनीं। उनके काम की बदौलत सेना में, और बाद में अस्पतालों और शहरों में, साफ़-सफ़ाई बेहतर हुई।
वह स्कूल जिसने नर्सिंग को बदल दिया
1859 में उन्होंने Notes on Nursing छापी, एक छोटी, व्यावहारिक किताब, जो बीमारों के लिए ताज़ी हवा, रोशनी, सफ़ाई, शांति और अच्छे खाने के बारे में थी। यह उन आम परिवारों के लिए लिखी गई थी जो घर पर किसी की देखभाल कर रहे होते, और यह ख़ूब बिकी।
1860 में, उनके सम्मान में जुटाए गए पैसों से, उन्होंने लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल में नर्सों के लिए नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की। इसकी नर्सों को ढंग से प्रशिक्षण मिलता था, और आगे चलकर उन्होंने ब्रिटेन और दुनिया भर में दूसरों को प्रशिक्षण दिया। धीरे-धीरे नर्सिंग एक इज़्ज़तदार पेशा बन गया।
1907 में वे ऑर्डर ऑफ़ मेरिट पाने वाली पहली महिला बनीं, जो ब्रिटेन के सबसे ऊँचे सम्मानों में से एक है। 13 अगस्त 1910 को, नब्बे साल की उम्र में, उनकी मौत हुई।
आज हर साल उनके जन्मदिन, 12 मई, को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है। उनका दीपक आज भी नर्सिंग का प्रतीक है, और उस ख़ामोश देखभाल का भी, जो पूरी रात पहरा देती है।
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मार्क बोस्ट्रिज की Florence Nightingale: The Woman and Her Legend एक पूरी, संतुलित आधुनिक जीवनी है। उनकी अपनी Notes on Nursing छोटी और साफ़ है, और आज भी पढ़ने लायक है।