आख़िरी पत्ती
न्यूयॉर्क के एक स्टूडियो में एक युवा चित्रकार बीमार पड़ी है और अपनी खिड़की के बाहर एक बेल की पत्तियाँ गिन रही है। वह कहती है, जब आख़िरी पत्ती गिरेगी, तो वह भी चली जाएगी।
- 5 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Classic retold
- 1900s
ध्यान दें: इस कहानी में गंभीर बीमारी और एक मौत का ज़िक्र है।
"बारह," जॉन्सी फुसफुसाई। थोड़ी देर बाद: "ग्यारह।" फिर: "दस। नौ।"
स्यू ने अपने ड्रॉइंग बोर्ड से सिर उठाया। उसकी सहेली बिस्तर पर बिल्कुल निश्चल लेटी, एकटक खिड़की के बाहर देख रही थी। बाहर कुछ भी नहीं था, सिवाय बीस फ़ुट दूर ईंटों की एक नंगी दीवार के, और उस पर आधी ऊँचाई तक चढ़ी एक पुरानी आइवी की बेल के। पतझड़ की हवा ने उसे इतना नोच डाला था कि वह लगभग कंकाल भर रह गई थी।
"क्या गिन रही हो, प्यारी?" स्यू ने पूछा।
"पत्तियाँ," जॉन्सी ने कहा। "उस बेल की। जब आख़िरी पत्ती गिरेगी, तो मुझे भी जाना होगा। मुझे तीन दिन से यह पता है।"
सीढ़ियों के ऊपर एक स्टूडियो
स्यू और जॉन्सी दो युवा चित्रकार थीं, जो मई में मिली थीं और मिलते ही एक-दूसरे को पसंद करने लगी थीं। उन्होंने पाया कि कला, सलाद और आस्तीनों के मामले में उनकी पसंद एक जैसी है, तो उन्होंने मिलकर ग्रीनविच विलेज में ईंटों के एक पुराने मकान की सबसे ऊपरी मंज़िल पर एक छोटा-सा स्टूडियो ले लिया। ग्रीनविच विलेज न्यूयॉर्क का वह कोना था जहाँ चित्रकार सस्ते में रह लेते थे।
फिर नवंबर में एक ठंडा, अनदेखा अजनबी विलेज में घूमने लगा। डॉक्टर उसे निमोनिया कहते थे। वह यहाँ-वहाँ लोगों को छूता चला गया, और जिन्हें उसने छुआ, उनमें एक जॉन्सी भी थी।
अब वह अपने रंगे हुए लोहे के पलंग पर लेटी रहती, लगभग बिना हिले-डुले, दीवार को ताकती हुई।
उस सुबह डॉक्टर स्यू को गलियारे में ले गया था। उसने कहा कि जॉन्सी के बचने की शायद दस में से एक संभावना है, और वह संभावना भी इस पर टिकी है कि वह जीना चाहे। जब कोई मरीज़ अपने ही जनाज़े में चलने वाली गाड़ियाँ गिनने लगता है, तो दवा की आधी ताक़त ख़त्म हो जाती है। अगर स्यू उसके मन में किसी भी चीज़ के लिए ज़रा-सी भी चाह जगा सके, तो संभावना कहीं बेहतर हो जाएगी।
स्यू अपने काम वाले कमरे में गई और एक नैपकिन में मुँह छिपाकर रोई। फिर वह अपना ड्रॉइंग बोर्ड लेकर, ख़ुशी-ख़ुशी सीटी बजाती हुई, जॉन्सी के कमरे में लौट आई और काम में जुट गई। तभी उसने वह गिनती सुनी।
पत्तियों की बेतुकी बात
"इस बेल का ठीक होने से क्या लेना-देना?" स्यू ने डाँटा। "तुम्हें तो यह बेल बहुत अच्छी लगती थी, शरारती लड़की। डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हारे ठीक होने की पूरी उम्मीद है। अब थोड़ा सूप पी लो, और मुझे यह ड्रॉइंग पूरी करने दो, ताकि मैं तुम्हारे लिए थोड़ी पोर्ट वाइन ख़रीद सकूँ।"
"वाइन की कोई ज़रूरत नहीं," जॉन्सी ने कहा, उसकी आँखें अब भी खिड़की पर टिकी थीं। "वह देखो, एक और गई। अब बस चार बची हैं। मैं अँधेरा होने से पहले आख़िरी को गिरते देखना चाहती हूँ।"
स्यू ने उससे मिन्नत की कि वह आँखें बंद कर ले और जब तक ड्रॉइंग पूरी न हो जाए, बाहर न देखे। उसने खिड़की का पर्दा गिरा दिया। फिर वह एक बूढ़े खनिक की अपनी तस्वीर के लिए मॉडल ढूँढ़ने नीचे चली गई।
बूढ़ा बेहरमन
सबसे निचली मंज़िल पर बेहरमन रहता था, साठ पार का एक चित्रकार, जिसकी लंबी, घुँघराली दाढ़ी थी। चालीस साल से उसने ब्रश थाम रखा था, और कभी कुछ अच्छा नहीं बनाया था। वह हमेशा उस उत्कृष्ट कृति की बात करता था जो वह बनाने वाला था। उसने उसे कभी शुरू ही नहीं किया था। वह नौजवान कलाकारों के लिए मॉडल बनकर थोड़ा-बहुत कमा लेता था, ज़रूरत से ज़्यादा जिन पीता था, और ख़ुद को ऊपर रहने वाली उन दो लड़कियों का कड़क रखवाला समझता था।
जब स्यू ने उसे पत्तियों के बारे में बताया, तो वह तिरस्कार से गरज उठा। क्या दुनिया में ऐसे भी मूर्ख लोग हैं जो इसलिए मर जाएँ कि किसी बेल से पत्तियाँ गिर रही हैं? वह ऐसी बात सुनने को भी तैयार नहीं था। स्यू ने अपनी सहेली के दिमाग़ में ऐसे बेवक़ूफ़ी भरे ख़याल आने ही कैसे दिए?
फिर भी वह उसके साथ सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया। जॉन्सी सो रही थी। स्यू और बेहरमन ने खिड़की से बाहर उस बेल को देखा, और फिर बिना एक शब्द कहे एक-दूसरे की ओर देखा।
बाहर बर्फ़ मिली ठंडी बारिश गिर रही थी।
तूफ़ान के बाद की सुबह
सारी रात हवा चीख़ती रही और बारिश शीशे पर थपेड़े मारती रही।
धूसर सुबह में जॉन्सी ने बेजान आवाज़ में कहा, "पर्दा उठा दो। मैं देखना चाहती हूँ।"
स्यू ने थके हाथों से उसे उठा दिया।
और वहाँ, ईंट की दीवार पर, हवा और बारिश की उस लंबी रात के बाद भी, आइवी की एक पत्ती अपनी डंठल से चिपकी हुई थी। डंठल के पास वह गहरी हरी थी, किनारे पीले पड़कर फटे हुए थे, और वह ज़मीन से कोई बीस फ़ुट ऊपर हिम्मत से लटकी हुई थी।
"यही आख़िरी है," जॉन्सी ने कहा। "मुझे पक्का लगा था कि रात में गिर जाएगी। यह आज गिरेगी, और उसी वक़्त मैं भी मर जाऊँगी।"
लेकिन दिन बीत गया, और पत्ती टिकी रही। रात आई, हवा फिर तेज़ हुई, और बारिश खिड़कियों पर कोड़े बरसाती रही। जब उजाला हुआ, तो जॉन्सी ने पर्दा उठाने को कहा।
पत्ती अब भी वहीं थी।
जॉन्सी बहुत देर तक लेटी उसे देखती रही। फिर उसने स्यू को पुकारा, जो चूल्हे पर शोरबा चला रही थी।
"मैं बहुत बुरी लड़की रही हूँ, सूडी," उसने कहा। "किसी चीज़ ने उस आख़िरी पत्ती को वहाँ रोक रखा है, ताकि मुझे दिखा सके कि मैं कितनी ग़लत थी। मरना चाहना पाप है। अब तुम मेरे लिए थोड़ा शोरबा ले आओ, और एक आईना, और कुछ तकिए, ताकि मैं उठकर बैठ सकूँ और तुम्हें खाना बनाते देख सकूँ।"
एक घंटे बाद उसने कहा कि वह उम्मीद करती है कि एक दिन नेपल्स की खाड़ी की तस्वीर बनाएगी।
उत्कृष्ट कृति
उस दोपहर डॉक्टर फिर आया। उसने कहा कि अब जॉन्सी के बचने और न बचने की संभावना बराबर है, और अच्छी देखभाल से वह जीत जाएगी। फिर उसने बताया कि नीचे उसका एक और मरीज़ है, बेहरमन नाम का एक बूढ़ा, उसे भी निमोनिया है। बूढ़ा कमज़ोर था और बीमारी का हमला बहुत तेज़ था। उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, पर उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था ताकि उसे कुछ आराम मिल सके।
अगले दिन डॉक्टर ने कहा कि जॉन्सी ख़तरे से बाहर है।
उस शाम स्यू आकर बिस्तर पर बैठ गई, और तकियों समेत अपनी सहेली को बाँहों में भर लिया।
उसे कुछ बताना था। बूढ़े बेहरमन की उस दिन अस्पताल में मौत हो गई थी। वह सिर्फ़ दो दिन बीमार रहा था। पहली सुबह चौकीदार ने उसे उसके कमरे में दर्द से बेबस पड़ा पाया था। उसके जूते और कपड़े पूरी तरह भीगे और बर्फ़ जैसे ठंडे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि ऐसी भयानक रात में वह कहाँ गया होगा।
फिर उन्हें एक लालटेन मिली, जो अब भी जल रही थी। और एक सीढ़ी, जिसे उसकी जगह से घसीटकर लाया गया था। और कुछ बिखरे हुए ब्रश, और एक पैलेट, जिस पर हरे और पीले रंग मिले हुए थे।
"खिड़की से बाहर देखो, प्यारी," स्यू ने कहा, "दीवार पर उस आख़िरी पत्ती को। क्या तुमने कभी नहीं सोचा कि हवा चलने पर भी वह कभी फड़फड़ाई या हिली क्यों नहीं?"
वह बेहरमन की उत्कृष्ट कृति थी। उसने उसे वहीं बनाया था, उस रात, जिस रात आख़िरी पत्ती गिरी थी।
इस कहानी के बारे में
ओ. हेनरी, विलियम सिडनी पोर्टर (1862–1910) का क़लमी नाम था। वे एक अमेरिकी लेखक थे, जिन्हें न्यूयॉर्क के आम लोगों की कहानियों और उनके मशहूर चौंकाने वाले अंत के लिए पसंद किया जाता है। "द लास्ट लीफ़" पहली बार 1907 में छपी थी। यह उसका एक छोटा और सरल किया हुआ पुनर्कथन है।