शेर और चुहिया
एक ताक़तवर शेर हँस पड़ता है जब एक नन्ही चुहिया वादा करती है कि वह एक दिन उसकी मेहरबानी का बदला चुकाएगी। फिर शिकारियों का जाल गिरता है।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 4–8
- Fable & folk tale
- Ancient Greece
दोपहर की गर्मी में, जब चिड़ियाँ भी इतनी ऊँघ रही थीं कि गा नहीं पा रही थीं, एक बड़ा-सा शेर एक चट्टान की छाँव में सो रहा था।
उसकी अयाल सुनहरे बादल की तरह फैली हुई थी। उसके भारी-भरकम पंजे ठोड़ी के नीचे मुड़े हुए थे। हर बार जब वह साँस लेता, तो उसकी नाक के सामने की सूखी घास काँप उठती।
एक छोटी-सी भूरी चुहिया जल्दी-जल्दी अपने घर जा रही थी। उसे इतनी जल्दी थी कि उसने देखा ही नहीं कि वह कहाँ जा रही है, और वह सीधे शेर की पूँछ पर चढ़ी, उसकी पीठ पर से होती हुई उसकी नाक के ऊपर से दौड़ गई।
शेर चौंककर जाग गया।
चुहिया चूँ भी कर पाती, उससे पहले ही एक विशाल पंजा नीचे आया, और वह फँस गई।
एक बहुत छोटा-सा वादा
शेर ने अपना पंजा ज़रा-सा उठाया और नीचे काँपती हुई नन्ही जान को देखा।
"अच्छा," वह गुर्राया। "किसकी इतनी हिम्मत कि मेरी नाक को सड़क बना ले?"
"दया करो, जंगल के राजा," चुहिया फुसफुसाई। "मैं तुम्हें जगाना नहीं चाहती थी। मुझे जाने दो। अगर तुम मुझे छोड़ दोगे, तो मैं वादा करती हूँ कि एक दिन इसका बदला ज़रूर चुकाऊँगी।"
शेर उसे घूरता रहा। फिर वह हँसने लगा। वह इतनी ज़ोर से हँसा कि उसका पूरा शरीर हिलने लगा और उसके पीछे की चट्टान भी खड़खड़ाती-सी लगी।
"तुम? मेरा बदला चुकाओगी? तुम जैसी नन्ही-सी जान एक शेर के लिए भला क्या कर सकती है?"
लेकिन चुहिया ने उसे हँसा दिया था, और जो शेर हँस रहा हो, उसके लिए बेरहम होना मुश्किल होता है। उसने अपना पंजा उठा लिया।
"जाओ, नन्ही," उसने कहा। "घर भाग जाओ।"
चुहिया भाग गई, और शेर अब भी मन ही मन हँसता हुआ फिर से सो गया।
जाल
कुछ दिनों बाद शेर जंगल में घूम रहा था, कि अचानक ज़मीन जैसे उछलकर उस पर टूट पड़ी। शिकारियों ने पत्तों के नीचे मोटी रस्सियों का एक जाल छिपा रखा था। पल भर में वह उसके चारों ओर कस गया।
शेर दहाड़ा। वह छटपटाया, उसने रस्सियाँ खींचीं और काटीं। लेकिन वह जितना छटपटाता, रस्सियाँ उतनी ही कसती जातीं, यहाँ तक कि वह मुश्किल से हिल पा रहा था।
उसकी दहाड़ पूरे जंगल में, पहाड़ियों के पार और लंबी घास तक गूँज गई।
नन्ही चुहिया ने उसे सुना।
वह उस आवाज़ को पहचानती थी। और वह उससे दूर नहीं भागी। वह उसकी ओर भागी।
उसने देखा कि शेर जाल में उलझा, थका हुआ पड़ा है, और उसकी बड़ी-बड़ी आँखें डर से भरी हैं।
"चुपचाप लेटे रहो," उसने उससे कहा। "छटपटाओ मत।"
फिर उसने कुतरना शुरू किया।
उसने एक रस्सी कुतरी, फिर दूसरी, फिर तीसरी। उसके दाँत दुखने लगे और जबड़ा दर्द करने लगा, लेकिन वह रुकी नहीं। एक-एक धागा कटता गया और जाल ढीला होता गया, यहाँ तक कि आख़िर में शेर ख़ुद को झटककर आज़ाद हो गया।
वह खड़ा हुआ और नीचे उसकी ओर देखा, और बहुत देर तक कुछ भी नहीं बोला।
"तुम मुझ पर हँसे थे," चुहिया ने कहा, उसकी साँस थोड़ी फूली हुई थी। "लेकिन देखा? एक चुहिया भी शेर की मदद कर सकती है।"
शेर ने अपना बड़ा-सा सिर झुकाया।
"मैं हँसा था," उसने कहा, "क्योंकि मुझे लगता था कि मदद सिर्फ़ बड़ों और ताक़तवरों से मिलती है। मैं ग़लत था। शुक्रिया, मेरी दोस्त।"
उस दिन से शेर और चुहिया दोस्त बन गए। और जब भी शेर को अपने से छोटा कोई जीव मिलता, उसे याद रहता कि हँसना नहीं है।
यह कहानी इतने समय से क्यों चली आ रही है
यह कथा दो हज़ार से ज़्यादा सालों से सुनाई जा रही है और इसका श्रेय प्राचीन यूनान के कथाकार ईसप को दिया जाता है। ख़ुद ईसप के बारे में बहुत कम बातें पक्के तौर पर पता हैं। उनके नाम से जुड़ी बहुत-सी कथाएँ शायद अलग-अलग लोगों ने सुनाई होंगी और सदियों में इकट्ठा की गई होंगी। यह कहानी का एक छोटा और सरल किया हुआ रूप है।