लॉटरी का टिकट
एक शाम खाने के बाद, एक खाते-पीते पति-पत्नी को पता चलता है कि उनके लॉटरी टिकट पर शायद बड़ी रक़म निकली है। नंबर देखने से पहले ही चीज़ें बदलने लगती हैं। चेख़व की तीखी, मज़ेदार कहानी।
- 5 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Classic retold
- 1880s
इवान द्मित्रिच एक मध्यम दर्जे का आदमी था। वह साल के बारह सौ रूबल की बँधी आमदनी पर अपने परिवार के साथ रहता था, और अपनी क़िस्मत से पूरी तरह संतुष्ट था।
एक शाम खाने के बाद वह सोफ़े पर बैठकर अख़बार पढ़ने लगा।
"मैं आज अख़बार देखना भूल गई," उसकी पत्नी माशा ने मेज़ साफ़ करते हुए कहा। "ज़रा देखो तो, लॉटरी जीतने वालों की सूची छपी है या नहीं।"
सीरीज़ नौ हज़ार चार सौ निन्यानवे
"हाँ, छपी है," इवान द्मित्रिच ने कहा। "पर तुम्हारा टिकट तो रद्द नहीं हो गया था?"
"नहीं। मैंने मंगलवार को ब्याज भर दिया था।"
"नंबर क्या है?"
"सीरीज़ नौ हज़ार चार सौ निन्यानवे। नंबर छब्बीस।"
"ठीक है। देखते हैं।"
इवान द्मित्रिच को लॉटरी की क़िस्मत पर भरोसा नहीं था। आम तौर पर वह सूची देखने की ज़हमत कभी नहीं उठाता। पर अभी, करने को कुछ और न होने से, और अख़बार पहले से हाथ में होने से, उसने सीरीज़ नंबरों के कॉलम पर उँगली फिराई।
और तुरंत, मानो उसके शक का मज़ाक़ उड़ाते हुए, उसकी नज़र ऊपर से दूसरी पंक्ति पर रुक गई: 9,499।
उसने टिकट का नंबर नहीं देखा। उसने सीरीज़ पर दोबारा नज़र भी नहीं डाली। अख़बार फिसलकर उसके घुटनों पर आ गिरा। उसकी रीढ़ में कुछ ठंडा-सा दौड़ा और फिर गरम हो गया, और उसका दिल धक-धक करने लगा।
"माशा," उसने खोखली आवाज़ में कहा, "9,499 छपा है!"
पत्नी ने उसके हक्के-बक्के चेहरे को देखा और समझ गई कि वह मज़ाक़ नहीं कर रहा।
"9,499?" उसने पूछा, उसका चेहरा पीला पड़ गया और उसने तह किया हुआ मेज़पोश नीचे रख दिया।
पचहत्तर हज़ार
"हाँ, हाँ। सचमुच छपा है।"
"और टिकट का नंबर?"
"अरे, हाँ। टिकट का नंबर भी है। पर रुको। ज़रा ठहरो। सीरीज़ तो है ही, कम से कम। समझ रही हो न?"
इवान द्मित्रिच अपनी पत्नी की ओर देखकर मुस्कुराया, एक चौड़ी, बेबस मुस्कान, जैसे किसी त्योहार की सुबह कोई बच्चा मुस्कुराता है। पत्नी भी मुस्कुरा दी। दोनों को अच्छा लगा कि उसने बस सीरीज़ का ज़िक्र किया था, और नंबर ढूँढ़ने की जल्दी नहीं की थी। दौलत की उम्मीद से ख़ुद को तरसाना कितना मीठा, कितना रोमांचक था।
"यह हमारी सीरीज़ है," बहुत देर की चुप्पी के बाद इवान द्मित्रिच ने कहा। "तो हो सकता है हम जीत गए हों। बस एक संभावना है, पर है तो।"
"तो अब देख लो।"
"थोड़ा रुको। मायूस होने के लिए बहुत वक़्त पड़ा है। यह ऊपर से दूसरी पंक्ति में है, तो इनाम पचहत्तर हज़ार का है। यह सिर्फ़ पैसा नहीं है, माशा। यह पूरी एक नई ज़िंदगी है! और अगर मैं अभी देखूँ और वहाँ छब्बीस लिखा हो तो? ज़रा सोचो तो!"
सोफ़े पर सपने
पति-पत्नी हँसने लगे और चुपचाप एक-दूसरे को ताकने लगे। जीतने की संभावना ने उन्हें चकरा दिया था। वे यह भी नहीं बता सकते थे कि उन्हें पैसा किसलिए चाहिए, वे क्या ख़रीदेंगे, कहाँ जाएँगे।
फिर इवान द्मित्रिच कल्पना करने लगा।
पच्चीस हज़ार वह गाँव में एक जागीर पर लगाएगा। दस हज़ार घर के सामान पर। दस हज़ार घूमने-फिरने पर। बाक़ी वह ब्याज कमाने के लिए बैंक में रख देगा।
उसने ख़ुद को गर्मियों के एक तपते दिन में देखा, अपनी जागीर में एक नाले के किनारे, लाइम के पेड़ के नीचे, गरम रेत पर पीठ के बल लेटे हुए। उसका छोटा बेटा और बेटी पास ही रेंग रहे होंगे, रेत खोद रहे होंगे या घास में कीड़े पकड़ रहे होंगे। वह ऊँघता रहेगा, कुछ भी न सोचते हुए, यह जानते हुए कि उसे न आज दफ़्तर जाना है, न कल, न परसों।
फिर पतझड़, अपनी बारिशों और ठंडी शामों के साथ। वह बग़ीचे में और नदी किनारे लंबी सैर करेगा, जब तक कि अच्छी तरह ठिठुर न जाए, फिर वोदका का एक बड़ा गिलास पिएगा और एक नमकीन कुकुरमुत्ता खाएगा। बच्चे सब्ज़ियों की क्यारियों से दौड़ते हुए आएँगे, ताज़ी मिट्टी की महक लिए।
"हाँ," उसने कहा। "विदेश जाना भी अच्छा रहेगा।"
पहली परछाईं
और वह सोचने लगा। वे कहाँ जाएँगे? फ़्रांस के दक्षिण में? इटली? भारत?
"मैं भी ज़रूर विदेश जाऊँगी," उसकी पत्नी ने कहा। "पर टिकट का नंबर तो देखो।"
"रुको, रुको।"
वह सोचता हुआ कमरे में टहलने लगा। और उसके मन में एक नया ख़याल आया। अगर उसकी पत्नी सचमुच विदेश गई तो? अकेले सफ़र करना तो मज़ेदार होता है। पर ऐसी पत्नी के साथ, जो बच्चों के सिवा कुछ सोचती ही नहीं, जो हर सिक्के पर आहें भरती और हाय-तौबा मचाती है, जो सफ़र और होटलों की शिकायत करती रहती है? उसने कल्पना की कि वह हर स्टेशन पर पैसों की चिंता कर रही है, और वह ख़ुद उसके पोटलियाँ-थैले लिए इधर-उधर भाग रहा है।
उसने उसकी ओर देखा। वह अब न जवान थी, न सुंदर। उससे रसोई की बू आती थी। और उसने सोचा, पैसा तो उसी के हाथ में रहेगा। वह उसे ताले में बंद कर देगी और उसके साथ कंजूसी करेगी।
और उसके रिश्तेदार! इनाम की पहली भनक लगते ही वे रेंगते हुए आ पहुँचेंगे, उसके सारे भाई-बहन और मौसियाँ-बुआएँ, चिकनी-चुपड़ी मुस्कानों के साथ माँगते और गिड़गिड़ाते हुए। और अगर उन्हें कुछ न दिया गया, तो वे हमेशा के लिए इस परिवार को कोसेंगे और बदनाम करेंगे।
फिर उसे अपने रिश्तेदार याद आने लगे, जिनके चेहरे उसे हमेशा बिल्कुल भले लगते थे। अब वे घिनौने लगने लगे।
उसने फिर अपनी पत्नी को देखा, और उसका चेहरा सख़्त हो गया। इस बीच वह अपने ही सपनों में खोई थी। वह अच्छी तरह जानती थी कि उसके पति के सपने क्या होंगे। वह जानती थी कि उसकी जीती हुई रक़म पर सबसे पहले झपटने वाला कौन होगा।
उसने उसकी आँखों में सब कुछ देख लिया: नफ़रत और कड़वाहट से भरी एक नज़र।
नंबर
उसे चिढ़ाने के लिए, इवान द्मित्रिच ने झपटकर अख़बार उठाया और जल्दी से चौथे पन्ने पर नज़र डाली।
"सीरीज़ 9,499," उसने विजयी अंदाज़ में पढ़ा। "नंबर छियालीस। छब्बीस नहीं!"
एक ही साँस में उम्मीद चली गई, और उसके साथ कड़वाहट भी।
वह फ़्लैट, जो घंटे भर पहले इतना आरामदेह लग रहा था, अचानक तंग और उदास लगने लगा। खाया हुआ खाना पेट में भारी पड़ने लगा। आगे की शाम लंबी और नीरस लगने लगी।
इवान द्मित्रिच बड़बड़ाने लगा। फ़र्श पर हमेशा कचरा क्यों पड़ा रहता है? इस घर में कुछ भी कभी सलीक़े से क्यों नहीं रहता? उसने कहा कि वह यहाँ एक पल भी और नहीं रुक सकता, और पैर पटकता हुआ अपना कोट ढूँढ़ने चला गया।
उस शाम किसी का एक रूबल भी नहीं गया था। फिर भी वह संतोष भरी शाम चली गई थी, और दुनिया की कोई लॉटरी उसे वापस नहीं ख़रीद सकती थी।
इस कहानी के बारे में
अंतोन चेख़व (1860–1904) एक रूसी डॉक्टर थे, जिन्होंने सैकड़ों कहानियाँ लिखीं। इनमें से कई हास्य भरे छोटे रेखाचित्र थे, जो उन्होंने मेडिकल के छात्र और नौजवान डॉक्टर रहते हुए पत्रिकाओं के लिए लिखे। यह उसका एक छोटा और सरल किया हुआ पुनर्कथन है।