वह इंसान जिसने इस्पात से एक राष्ट्र गढ़ा
जमशेदजी टाटा ने एक ऐसे देश के लिए इस्पात के कारख़ानों, बिजलीघरों और विज्ञान के एक बड़े संस्थान का सपना देखा, जो अभी आज़ाद भी नहीं था। उनमें से ज़्यादातर को बनते देखने के लिए वे ज़िंदा नहीं रहे। यह कहानी है कि उन्होंने फिर भी उनके बीज कैसे बोए।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Biography
- 1830s–1900s
1902 में, एक बूढ़े होते कारोबारी अपने बेटे को चिट्ठी लिखने बैठे।
वे पैसों के बारे में नहीं लिख रहे थे। वे एक ऐसे शहर का ब्योरा दे रहे थे जो अभी था ही नहीं। उन्होंने लिखा कि उसकी सड़कें चौड़ी हों, और उन पर जल्दी बढ़ने वाले छायादार पेड़ लगाए जाएँ। लॉन और बग़ीचों के लिए, फ़ुटबॉल और हॉकी के लिए जगह हो, और हर धर्म के लिए इबादत की जगहें हों। मज़दूरों के घर अच्छे हों।
जिस इस्पात कारख़ाने के लिए यह शहर बसना था, वह अभी बना ही नहीं था। उसके लिए ज़मीन तक नहीं चुनी गई थी। लेकिन जमशेदजी नुसरवानजी टाटा उसे अभी से देख सकते थे।
नवसारी के एक पुजारी का बेटा
उनका जन्म 3 मार्च 1839 को गुजरात के एक छोटे-से शहर नवसारी में, पारसी पुजारियों के एक परिवार में हुआ था। उनके पिता नुसरवानजी ने परिवार की परंपरा तोड़ी और बंबई में व्यापारी बन गए।
बालक जमशेद भी उनके पीछे-पीछे वहाँ पहुँचे और एल्फ़िंस्टन कॉलेज में पढ़े। पढ़ाई पूरी करके वे पिता के व्यापार में शामिल हो गए, जिसके काम से उन्हें चीन और बाद में इंग्लैंड भेजा गया। लंकाशायर की मिलों में उन्होंने देखा कि मशीनों से कपास कैसे काती और बुनी जाती है, और वे सोचने लगे कि आख़िर भारत कपास उगाता है, पर कपड़ा ख़रीदता क्यों है।
हर काम में कामयाबी नहीं मिली। 1860 के दशक के बीच में, जब बंबई में कपास का उछाल अचानक धड़ाम से गिरा, तो उनके पिता के व्यापार को भारी चोट पहुँची, और परिवार को सँभलने में बरसों की मेहनत लगी। 1868 में जमशेदजी ने छोटे पैमाने पर अपनी ख़ुद की एक व्यापारिक कंपनी शुरू की।
नागपुर की मिल
उनका पहला बड़ा दाँव एक कपड़ा मिल थी। बंबई में बनाने के बजाय, जहाँ हर मिल-मालिक मौजूद था, उन्होंने देश के बीचोंबीच नागपुर को चुना, जो कपास के खेतों और अच्छे कोयले के पास था।
एम्प्रेस मिल 1 जनवरी 1877 को खुली। शुरुआती बरसों में मशीनों और कपास की क्वालिटी को लेकर दिक़्क़तें आईं, और जमशेदजी को उपकरण बदलने पड़े और मिल चलाने के तरीक़े पर नए सिरे से सोचना पड़ा।
इस मिल को जो चीज़ अनोखा बनाती थी, वह था मज़दूरों के साथ उसका बर्ताव। जिस ज़माने में भारत के कारख़ानों में मज़दूर लंबे घंटे काम करते थे और उनकी हिफ़ाज़त का लगभग कोई इंतज़ाम नहीं था, जमशेदजी की मिलों ने ऐसी चीज़ें शुरू कीं जो दुनिया में कहीं भी कम ही थीं: बुढ़ापे के लिए बचत का प्रॉविडेंट फ़ंड, दुर्घटना होने पर मुआवज़ा, और काम के बेहतर हालात। उनका मानना था कि सेहतमंद और बेफ़िक्र मज़दूरों से ही कारोबार सेहतमंद रहता है। उन्होंने बंबई में एक डूबती हुई मिल भी ख़रीदी और धीरे-धीरे उसे पटरी पर ले आए।
पचास की उम्र तक आते-आते वे एक अमीर आदमी बन चुके थे। वे वहीं रुक सकते थे।
तीन सपने
इसके बजाय, उन्होंने तीन ऐसे विचारों की ओर रुख़ किया जिनके बारे में उनके आसपास के ज़्यादातर लोग सोचते थे कि अंग्रेज़ी राज में किसी भारतीय के लिए उन्हें पूरा करना नामुमकिन है।
पहला था इस्पात। भारत के पास लौह अयस्क और कोयला था, लेकिन आधुनिक इस्पात उद्योग लगभग नहीं था। कहा जाता है कि उन्होंने लेखक थॉमस कार्लाइल की यह दलील सुनी थी कि जो राष्ट्र लोहे पर क़ाबू पा लेगा, वह जल्दी ही सोने पर भी क़ाबू पा लेगा, और उनका मानना था कि अपने इस्पात के बिना भारत अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता।
दूसरा था बिजली। वे पश्चिमी घाट की भारी मानसूनी बारिश से बंबई की मिलों के लिए पनबिजली बनाना चाहते थे, ताकि शहर ज़्यादा साफ़ रहे और उसके उद्योग कम ख़र्च में चलें।
तीसरा था विज्ञान का एक विश्वविद्यालय। 1893 में, जापान से उत्तरी अमेरिका जा रहे एक जहाज़ पर, उनकी मुलाक़ात स्वामी विवेकानंद नाम के एक युवा संन्यासी से हुई, जो शिकागो में भाषण देने जा रहे थे। दोनों ने भारत के भविष्य के बारे में बातें कीं। कुछ साल बाद जमशेदजी ने अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा एक शोध संस्थान बनाने के लिए देने की पेशकश की, और विवेकानंद ने इस योजना के समर्थन में लिखा।
लंबी तलाश
हर सपना दीवारों से टकराया। सरकारी अफ़सरों को शक था। लंदन के निवेशक किसी भारतीय इस्पात कंपनी में पैसा लगाने को तैयार नहीं थे। जानकारों का कहना था कि भारतीय अयस्क बहुत घटिया है, या बहुत दूर है।
जमशेदजी लगे रहे। वे इस्पात कारख़ानों को समझने अमेरिका गए और सही जगह खोजने के लिए तजुर्बेकार इंजीनियर रखे। खोजकर्ता बरसों तक मध्य और पूर्वी भारत के जंगलों और पहाड़ियों में पैदल घूमते रहे, ऐसी जगह की तलाश में जहाँ अयस्क, कोयला, पानी और चूना-पत्थर इतने पास-पास हों कि इस्पात बनाया जा सके।
उनकी सेहत गिरती जा रही थी। 19 मई 1904 को, जर्मनी की यात्रा के दौरान, जमशेदजी टाटा का निधन हो गया। वे पैंसठ साल के थे। उनके तीन बड़े सपनों में से एक भी पूरा नहीं हुआ था।
जो उनके बेटों ने पूरा किया
उनके बेटों, दोराबजी और रतनजी, और उन लोगों ने जिन्हें उन्होंने तैयार किया था, काम जारी रखा।
खोजी दल को भूविज्ञानी पी. एन. बोस की मदद से मयूरभंज में, जो आज ओडिशा में है, बढ़िया लौह अयस्क मिला। साकची गाँव के पास, जहाँ दो नदियाँ मिलती थीं, एक जगह चुनी गई। जब 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी बनी, तो पैसा आख़िरकार लंदन से नहीं जुटाया गया। वह हज़ारों आम भारतीयों से आया, जो अपनी ख़ुद की एक कंपनी के शेयर ख़रीदने के लिए क़तारों में खड़े हुए। पहला इस्पात 1912 में बना।
कारख़ाने के चारों ओर शहर बसा, काफ़ी हद तक वैसा ही जैसा उस चिट्ठी में लिखा था, और उनके सम्मान में उसका नाम जमशेदपुर रखा गया।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस की स्थापना 1909 में बैंगलोर में हुई। पनबिजली योजना ने 1915 में बंबई को बिजली देना शुरू किया।
और पढ़ना चाहते हैं?
आर. एम. लाला की For the Love of India जमशेदजी टाटा की एक आत्मीय, पढ़ने में आसान जीवनी है। एफ़. आर. हैरिस की Jamsetji Nusserwanji Tata, जिसे 1920 के दशक में परिवार के एक सदस्य ने लिखा था, उनके जीवन का सबसे पुराना पूरा ब्योरा है और उनकी चिट्ठियों पर आधारित है।