वह आदमी जिसने 669 बच्चों को बचाया
1938 में लंदन के एक युवा स्टॉकब्रोकर ने स्कीइंग की छुट्टी रद्द की और उसकी जगह प्राग चला गया। वहाँ उसने जो किया, उसके बारे में उसने पचास साल तक लगभग किसी को नहीं बताया।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- True story
- 1930s
ध्यान दें: इस कहानी में होलोकॉस्ट और बच्चों के अपने माता-पिता से बिछड़ने का ज़िक्र है।
दिसंबर 1938 में निकोलस विंटन उनतीस साल के थे और लंदन में स्टॉकब्रोकर का काम करते थे। उन्होंने छुट्टियों की बुकिंग कर रखी थी: स्विट्ज़रलैंड में स्कीइंग की सैर।
निकलने से ठीक पहले मार्टिन ब्लेक नाम के एक दोस्त ने, जो प्राग में शरणार्थियों के साथ काम कर रहे थे, उनसे कहा कि वे इसके बजाय चेकोस्लोवाकिया आएँ और हालात अपनी आँखों से देखें।
विंटन चले गए।
वहाँ उन्होंने क्या देखा
यूरोप युद्ध की ओर खिसक रहा था। कुछ महीने पहले, सितंबर 1938 में, नाज़ी जर्मनी ने सुडेटेनलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया था, जो चेकोस्लोवाकिया के सरहदी इलाक़े थे। हज़ारों शरणार्थी, जिनमें बहुत-से यहूदी परिवार और नाज़ियों के राजनीतिक विरोधी थे, भागकर प्राग आ गए थे। वे ठंडे, भीड़ भरे शिविरों में रह रहे थे, और आगे क्या होगा, इस डर से सहमे हुए थे।
नवंबर 1938 में जर्मनी और ऑस्ट्रिया भर में यहूदियों के घरों, दुकानों और सिनेगॉग पर हमले हुए थे, जिस हिंसा को क्रिस्टालनाख़्त के नाम से जाना जाता है। इसके जवाब में ब्रिटेन ने राइख़ से आने वाले ऐसे शरणार्थी बच्चों को अपनाने की हामी भरी थी जिनके साथ कोई बड़ा न हो। यह योजना किंडरट्रांसपोर्ट के नाम से जानी गई। लेकिन चेकोस्लोवाकिया के बच्चे अभी किसी व्यवस्थित योजना में शामिल नहीं थे।
विंटन परिवारों से मिले। उन्होंने बच्चों को देखा। और उन्होंने तय किया कि वे जितने हो सके उतने बच्चों को ब्रिटेन पहुँचाने की कोशिश करेंगे।
होटल के कमरे में दफ़्तर
उन्होंने प्राग में अपने होटल के कमरे से काम शुरू किया, जहाँ माता-पिता क़तार लगाकर उन्हें अपने बच्चों के नाम और तस्वीरें देते थे। जब उन्हें अपनी नौकरी के लिए लंदन लौटना पड़ा, तो उन्होंने वहाँ यह काम जारी रखा, शाम को, स्टॉक एक्सचेंज में पूरे दिन काम करने के बाद।
ब्रिटेन बच्चों को सिर्फ़ सख़्त शर्तों पर ही लेता। हर बच्चे के लिए एक ऐसा ब्रिटिश परिवार चाहिए था जो उसे अपनाने को तैयार हो, और £50 की ज़मानत (जो 1939 में एक बड़ी रक़म थी), ताकि आगे चलकर उसके घर लौटने का ख़र्च उठाया जा सके। परमिट लेने थे, काग़ज़ों पर मुहरें लगवानी थीं और सफ़र का इंतज़ाम करना था।
विंटन और मददगारों के एक छोटे-से दल ने, जिसमें उनकी माँ भी थीं, बच्चों की तस्वीरें छापीं और उन्हें पालक घर ढूँढने के लिए जगह-जगह भेजा। उन्होंने विज्ञापन दिए। उन्होंने चिट्ठियाँ लिखीं। उन्होंने अफ़सरों पर काग़ज़ जल्दी निपटाने का दबाव डाला। बताया जाता है कि जब होम ऑफ़िस से दस्तावेज़ आने में देर होती, तो दल ने कुछ काग़ज़ ख़ुद ही तैयार कर लिए, ताकि ट्रेनें समय पर निकल सकें। प्राग में ट्रेवर चैडविक और डोरीन वॉरिनर समेत उनके साथियों ने ख़तरनाक हालात में बच्चों की रवानगी का इंतज़ाम किया।
ट्रेनें
मार्च से अगस्त 1939 के बीच आठ ट्रेनें बच्चों को प्राग से जर्मनी और नीदरलैंड्स होते हुए ले गईं, और वहाँ से जहाज़ से वे ब्रिटेन पहुँचे। लंदन के लिवरपूल स्ट्रीट स्टेशन पर उनके नए पालक परिवारों ने उनका स्वागत किया। सबसे छोटे बच्चे नन्हे-मुन्ने थे; सबसे बड़े किशोर थे। उनमें से ज़्यादातर अपने माता-पिता को फिर कभी नहीं देख पाए।
सबसे बड़ी ट्रेन 1 सितंबर 1939 को प्राग से निकलने वाली थी, जिसमें लगभग 250 बच्चे सवार थे।
उसी सुबह जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। सरहदें बंद कर दी गईं। वह ट्रेन कभी नहीं निकली। माना जाता है कि जिन बच्चों को उस ट्रेन में होना था, उनमें से बहुत कम युद्ध में ज़िंदा बचे।
आम तौर पर बताए जाने वाले आँकड़े के अनुसार, विंटन के इस अभियान के ज़रिए कुल 669 बच्चे सुरक्षित पहुँचे।
पचास साल की ख़ामोशी
युद्ध के बाद विंटन अपनी ज़िंदगी में लग गए। उन्होंने शादी की, परिवार बसाया, धर्मार्थ संस्थाओं के लिए काम किया, और प्राग के बारे में ज़्यादा बात नहीं की। उनकी पत्नी ग्रेटे को भी इसका पूरा ब्योरा नहीं पता था।
1988 में ग्रेटे अटारी की सफ़ाई कर रही थीं, तभी उन्हें एक पुरानी स्क्रैपबुक मिली। उसके अंदर बच्चों के नामों की सूचियाँ, तस्वीरें, माता-पिता की चिट्ठियाँ और 1939 के दस्तावेज़ थे।
वह स्क्रैपबुक एक इतिहासकार तक पहुँची, और फिर बीबीसी तक। फ़रवरी 1988 में विंटन को That's Life! नाम के एक लोकप्रिय टेलीविज़न कार्यक्रम में दर्शकों के बीच बैठने के लिए बुलाया गया।
दर्शक खड़े हो जाते हैं
प्रस्तोता एस्थर रैंटज़न ने वह स्क्रैपबुक दिखाई और ट्रेनों की कहानी सुनाई। फिर उन्होंने बताया कि विंटन के बग़ल में बैठी महिला उन्हीं बच्चों में से एक हैं जिन्हें उन्होंने बचाया था।
थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा कि क्या दर्शकों में कोई ऐसा है जिसकी ज़िंदगी निकोलस विंटन की बदौलत है। अगर हाँ, तो क्या वे कृपया खड़े होंगे?
उनके आसपास लगभग हर कोई खड़ा हो गया।
उस पल का वीडियो, जिसमें विंटन अपने चारों ओर देखते हैं और चुपचाप अपनी आँखें पोंछते हैं, तब से दुनिया भर में लाखों लोग देख चुके हैं।
उसके बाद
विंटन मशहूर हो गए, लेकिन उन्होंने अपने किए को हमेशा छोटा करके ही बताया। वे कहते थे कि दूसरों ने उनसे बड़े जोखिम उठाए थे, और उन्होंने तो बस यह देखा था कि क्या किया जाना ज़रूरी है। 2003 में उन्हें नाइट की उपाधि मिली और चेक गणराज्य ने उन्हें अपने सबसे बड़े सम्मान से नवाज़ा। 2015 में 106 साल की उम्र में उनका निधन हुआ।
"निकी के बच्चों" में से बहुत-से आगे चलकर डॉक्टर, वैज्ञानिक, कलाकार और माता-पिता बने। उनके बच्चों और पोते-पोतियों को मिलाकर, अनुमान है कि आज उनके वंशजों की संख्या हज़ारों में है।
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बारबरा विंटन की अपने पिता पर लिखी जीवनी पूरी कहानी बताती है, जिसमें प्राग में उनके साथियों का काम भी शामिल है। यूनाइटेड स्टेट्स होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम का एनसाइक्लोपीडिया किंडरट्रांसपोर्ट के बड़े इतिहास को समझाता है।