वह मिशन जो घर लौट आया
अप्रैल 1970 में एक धमाके ने तीन अंतरिक्ष यात्रियों को धरती से लगभग 200,000 मील दूर एक क्षतिग्रस्त अंतरिक्ष यान में फँसा दिया। इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास में मुश्किलें सुलझाने की सबसे बड़ी कोशिशों में से एक था।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- Historical narrative
- 1970s
11 अप्रैल 1970 को अपोलो 13 ने तीन अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर फ़्लोरिडा से उड़ान भरी: कमांडर जिम लवेल, कमांड मॉड्यूल पायलट जैक स्विगर्ट और लूनर मॉड्यूल पायलट फ़्रेड हेज़। उनका मिशन चाँद पर उतरने वाला तीसरा दल बनना था।
स्विगर्ट लॉन्च से कुछ ही दिन पहले दल में शामिल हुए थे। असली कमांड मॉड्यूल पायलट केन मैटिंगली खसरे के संपर्क में आ गए थे, इसलिए एहतियात के तौर पर उन्हें उड़ान से हटा दिया गया था। यह मैटिंगली की बदक़िस्मती लगी। लेकिन आगे चलकर इसी वजह से वे ज़मीन पर इस मिशन के सबसे अहम लोगों में से एक बनने वाले थे।
"ह्यूस्टन, हमारे साथ एक समस्या हो गई है"
13 अप्रैल की शाम, उड़ान के लगभग 56 घंटे बाद और धरती से क़रीब 200,000 मील दूर, दल ने अंतरिक्ष यान के ऑक्सीजन टैंकों को हिलाने-मिलाने की एक रोज़मर्रा की प्रक्रिया की। कुछ ही पल बाद एक धमाका हुआ।
स्विगर्ट ने ह्यूस्टन में मिशन कंट्रोल को रेडियो पर बताया: "ओके, ह्यूस्टन, हमारे साथ यहाँ एक समस्या हो गई है।" एक पल बाद लवेल ने यही बात दोहराई।
सर्विस मॉड्यूल का एक ऑक्सीजन टैंक फट गया था, और नुक़सान गंभीर था। यान से ऑक्सीजन निकल रही थी, जो दल को सिर्फ़ साँस लेने के लिए ही नहीं, बल्कि फ़्यूल सेलों में बिजली और पानी बनाने के लिए भी चाहिए थी। थोड़ी ही देर में कमांड मॉड्यूल की बिजली ख़त्म होने लगी, वही यान जिसे उन्हें घर वापस ले जाना था।
चाँद पर उतरना रद्द कर दिया गया। अब बस एक ही सवाल था: क्या दल ज़िंदा बच पाएगा?
अंतरिक्ष में एक जीवनरक्षक नाव
अपोलो 13 के साथ एक दूसरा अंतरिक्ष यान भी जुड़ा था: लूनर मॉड्यूल, जिसका नाम एक्वेरियस था। इसे दो अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद की सतह पर उतारने और वापस ऊपर लाने के लिए बनाया गया था, लगभग दो दिनों के लिए। इसका मक़सद कभी भी तीन लोगों को घर वापसी के पूरे सफ़र में ज़िंदा रखना नहीं था।
लेकिन इसकी अपनी ऑक्सीजन, बिजली और पानी था। तो दल एक्वेरियस में चला गया और कमांड मॉड्यूल को लगभग पूरी तरह बंद कर दिया, ताकि उसकी आख़िरी बैटरियाँ धरती के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश के लिए बची रहें।
लूनर मॉड्यूल एक जीवनरक्षक नाव बन गया।
वह डिब्बा जो फ़िट नहीं होता था
एक्वेरियस में रहने से एक नया ख़तरा खड़ा हो गया। अंतरिक्ष यात्री जो भी साँस छोड़ते, उससे हवा में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती जाती। यान के एयर फ़िल्टर इसे सोखने के लिए लिथियम हाइड्रॉक्साइड नाम के रसायन के कनस्तरों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन लूनर मॉड्यूल में सिर्फ़ इतने ही कनस्तर थे जो दो लोगों की एक छोटी यात्रा के लिए काफ़ी हों।
कमांड मॉड्यूल में बहुत-से फ़ालतू कनस्तर थे, लेकिन वे चौकोर थे। लूनर मॉड्यूल के उपकरण में गोल कनस्तर लगते थे।
ज़मीन पर इंजीनियर काम में जुट गए। उन्होंने सिर्फ़ उसी तरह की चीज़ें इकट्ठा कीं जो दल के पास यान में थीं, जैसे प्लास्टिक की थैलियाँ, गत्ता, टेप और पाइप, और चौकोर कनस्तरों को लूनर मॉड्यूल के सिस्टम से जोड़ने का एक तरीक़ा निकाला। फिर उन्होंने उसे परखा और एक-एक क़दम के निर्देश लिखे, जो दल को रेडियो पर पढ़कर सुनाए गए।
अंतरिक्ष यात्रियों ने अपने हाथों से वह जोड़ने वाला पुर्ज़ा बनाया, और वह काम कर गया। कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर गिरने लगा।
ठंड, अँधेरा और सावधानी
घर वापसी का सफ़र बेहद तकलीफ़ भरा था। बिजली बचाने के लिए लगभग सब कुछ बंद कर दिया गया था। यान के अंदर का तापमान लगभग जमने तक गिर गया, और दीवारों और उपकरणों पर पानी की बूँदें जमने लगीं। दल ने बहुत कम नींद ली और पीने के पानी की भी कमी थी।
उन्हें यान की दिशा भी सँभालनी थी। अपोलो 13 चाँद के पिछले हिस्से का चक्कर लगाकर घूमा और लूनर मॉड्यूल के इंजन से धरती की ओर अपना रास्ता ठीक किया। इनमें से कुछ बार इंजन हाथ से चलाया गया, जब दल ने खिड़की से धरती को ही निशाना बनाकर यान को सीध में रखा।
इस बीच, केन मैटिंगली और ज़मीन पर दूसरे इंजीनियरों ने सिम्युलेटरों में लंबे घंटे बिताए। उन्होंने यह तरीक़ा निकाला कि बची हुई ज़रा-सी बिजली से ठंडे, जमे हुए कमांड मॉड्यूल में फिर से जान कैसे डाली जाए, और हर सिस्टम को किस क्रम में चालू किया जाए ताकि कुछ भी नाकाम न हो।
समुद्र में उतरना
17 अप्रैल 1970 को दल वापस कमांड मॉड्यूल में आया, और पहले सर्विस मॉड्यूल को, फिर एक्वेरियस को अलग कर दिया। कमांड मॉड्यूल तेज़ी से धरती के वायुमंडल में उतरा। फिर कई मिनट तक रेडियो पर ख़ामोशी रही, जो वायुमंडल में दोबारा प्रवेश के समय सामान्य बात थी, हालाँकि सुन रहे हर किसी को वह समय कहीं ज़्यादा लंबा लगा।
फिर पैराशूट खुल गए।
अपोलो 13 सुरक्षित रूप से दक्षिण प्रशांत महासागर में उतरा, और अंतरिक्ष यात्रियों को बचाव जहाज़ यूएसएस इवो जीमा ने उठा लिया।
इसे "कामयाब नाकामी" क्यों कहा जाता है
अपोलो 13 कभी चाँद पर नहीं उतरा। अपने लक्ष्यों के हिसाब से वह नाकाम रहा। फिर भी उसे अक्सर नासा के सबसे शानदार पलों में गिना जाता है, क्योंकि उसने दिखाया कि जब सब कुछ बिगड़ जाए, तब सोच-समझकर काम करने और मिलजुलकर टीम की तरह जुटने से क्या हासिल हो सकता है।
किसी ने अकेले यह समस्या नहीं सुलझाई। इसके लिए ज़रूरी था कि अंतरिक्ष यात्री शांत रहें, फ़्लाइट कंट्रोलर साफ़ फ़ैसले लें, इंजीनियर गत्ते और टेप से जुगाड़ करें, और ज़मीन पर रोक लिया गया एक अंतरिक्ष यात्री सिम्युलेटर में काम करे, ताकि उसके साथी घर लौट सकें।
संपादकीय टिप्पणी: समय और दूरियाँ लगभग हैं और नासा के सार्वजनिक रिकॉर्ड और नीचे दिए गए स्रोतों से ली गई हैं।