वह फफूँद जिसने लाखों जानें बचाईं
1928 में अलेक्ज़ेंडर फ़्लेमिंग छुट्टी से लौटे तो उन्होंने देखा कि बैक्टीरिया वाली एक तश्तरी पर फफूँद उग आई है। उनकी इस खोज को दवा में बदलने में बारह साल और लगे, और ऑक्सफ़र्ड की एक टीम की ज़रूरत पड़ी।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 10+
- Historical narrative
- 1920s–1940s
ध्यान दें: इस कहानी में गंभीर बीमारी और एक मरीज़ की मौत का ज़िक्र है।
बहुत पुरानी बात नहीं है, जब एक छोटा-सा कट भी जान ले सकता था।
1940 के दशक से पहले कोई एंटीबायोटिक दवा नहीं थी। अगर किसी घाव में बैक्टीरिया पहुँच जाते, तो डॉक्टर ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते थे। जो संक्रमण आज आसानी से ठीक हो जाते हैं, जैसे निमोनिया, ख़ून में ज़हर फैलना या गुलाब के काँटे की खरोंच का पक जाना, उनसे बड़ी संख्या में लोग मरते थे, बच्चे भी और बूढ़े भी। युद्ध में जितने सैनिक चोटों से मरते थे, उनसे कहीं ज़्यादा घावों में फैले संक्रमण से मरते थे।
बिखरी हुई प्रयोगशाला
अलेक्ज़ेंडर फ़्लेमिंग स्कॉटलैंड के एक वैज्ञानिक थे, जो लंदन के सेंट मैरी अस्पताल में काम करते थे। वे बैक्टीरिया पर शोध करते थे, और अपनी प्रतिभा के लिए तो मशहूर थे ही, अपनी काफ़ी बिखरी हुई प्रयोगशाला के लिए भी।
1928 की गर्मियों में वे छुट्टी पर गए। जाने से पहले उन्होंने काँच की कुछ तश्तरियाँ, जिन्हें पेट्री डिश कहते हैं, एक बेंच पर एक के ऊपर एक रख दीं। उनमें स्टैफ़िलोकॉकस की बस्तियाँ पनप रही थीं। ये वे बैक्टीरिया हैं जिनसे फोड़े और गंभीर संक्रमण होते हैं।
सितंबर की शुरुआत में जब वे लौटे, तो तश्तरियों को छाँटने लगे। उनमें से एक पर उन्हें कुछ अजीब दिखा। उस पर नीली-हरी फफूँद का एक धब्बा उग आया था, शायद हवा में उड़कर आए बीजाणुओं से। और फफूँद के चारों ओर बैक्टीरिया मर चुके थे। वहाँ एक साफ़ घेरा बन गया था, मानो फफूँद से निकली कोई चीज़ उन्हें मार रही हो।
फ़्लेमिंग की जिज्ञासा जाग उठी।
फफूँद का रस
उन्होंने उस फफूँद को, जो आगे चलकर पेनिसिलियम की एक किस्म निकली, एक तरल शोरबे में उगाया। उन्होंने पाया कि यह शोरबा, जिसे वे "फफूँद का रस" कहते थे, कई तरह के हानिकारक बैक्टीरिया को मार देता था, चाहे उसे कई गुना पतला क्यों न कर दिया जाए। ख़ून की सफ़ेद कोशिकाओं को इससे कोई नुक़सान होता नहीं दिखता था। उन्होंने इसके असरदार पदार्थ का नाम पेनिसिलिन रखा।
फ़्लेमिंग ने 1929 में अपनी खोज प्रकाशित की।
लेकिन एक दिक़्क़त थी। पेनिसिलिन को शुद्ध करना बहुत मुश्किल था, और वह बहुत अस्थिर था। फ़्लेमिंग और उनके सहायक उसकी बहुत थोड़ी-सी मात्रा ही बना पाते थे, और वह भी जल्दी ही अपना असर खो देती थी। वे रसायनशास्त्री नहीं थे, और उन्हें ऐसा कोई तरीक़ा नहीं सूझा जिससे इतना पेनिसिलिन बन सके कि मरीज़ों का इलाज हो पाए। क़रीब दस साल तक पेनिसिलिन लगभग भुला दिया गया, किसी पुरानी पत्रिका में दबी एक वैज्ञानिक जिज्ञासा भर बनकर।
ऑक्सफ़र्ड
1938 में ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिकों की एक टीम ने ऐसे प्राकृतिक पदार्थों की खोज शुरू की जो बैक्टीरिया से लड़ सकें। इस टीम की अगुवाई ऑस्ट्रेलियाई पैथोलॉजिस्ट हॉवर्ड फ़्लोरी कर रहे थे, और उनके साथ जर्मनी में जन्मे जैव-रसायनज्ञ अर्न्स्ट चेन थे। चेन को फ़्लेमिंग का वह पुराना शोध-पत्र मिल गया।
उन्होंने तय किया कि वे पेनिसिलिन को शुद्ध करने की कोशिश करेंगे।
यह कठिन और धीमा काम था। दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था, और पैसा और साज़-सामान दोनों कम थे। टीम के एक प्रतिभाशाली जैव-रसायनज्ञ, नॉर्मन हीटली, ने फफूँद उगाने और उससे पेनिसिलिन निकालने के तरीक़े ईजाद किए, और इसके लिए जो कुछ हाथ लगा, उसी से काम चलाया: दूध की बड़ी केनें, नहाने के टब, मरीज़ों के बेडपैन और ख़ास तौर पर बनवाए गए चीनी मिट्टी के बर्तन। प्रयोगशाला एक छोटी-सी फ़ैक्टरी बन गई, जिसमें काम करने वालों में कई नौजवान महिलाएँ थीं, जिन्हें "पेनिसिलिन गर्ल्स" कहा जाता था।
मई 1940 में उन्होंने जानलेवा बैक्टीरिया से संक्रमित चूहों पर पेनिसिलिन का परीक्षण किया। जिन चूहों को पेनिसिलिन नहीं दिया गया, वे मर गए। जिन्हें दिया गया, वे बच गए।
पहला मरीज़
फ़रवरी 1941 में उन्होंने पहली बार किसी इंसान पर पेनिसिलिन आज़माया। ऑक्सफ़र्ड के एक पुलिसकर्मी, एल्बर्ट अलेक्ज़ेंडर, को एक खरोंच के बाद भयानक संक्रमण हो गया था, जो उनके चेहरे और पूरे शरीर में फैल चुका था।
पेनिसिलिन मिलने के एक दिन के भीतर ही वे ठीक होने लगे। उनका बुख़ार उतर गया। वे फिर से खाना खाने लगे।
लेकिन उनके पास पर्याप्त पेनिसिलिन नहीं था। उन्होंने तो उनके पेशाब से भी पेनिसिलिन वापस इकट्ठा किया, ताकि उसे शुद्ध करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। कुछ दिनों बाद भंडार ख़त्म हो गया। संक्रमण लौट आया, और एल्बर्ट अलेक्ज़ेंडर की मौत हो गई।
इलाज ने काम किया था। बस उन्हें इसकी कहीं ज़्यादा मात्रा चाहिए थी।
बड़े पैमाने पर उत्पादन
युद्ध में उलझे ब्रिटेन के पास इसके लिए फ़ैक्टरियाँ नहीं थीं। इसलिए 1941 में फ़्लोरी और हीटली हवाई जहाज़ से अमेरिका गए। वहाँ इलिनॉय के पियोरिया शहर की एक सरकारी प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने विशाल टंकियों में फफूँद उगाने के बेहतर तरीक़े खोज निकाले। पेनिसिलियम की ज़्यादा ताक़तवर किस्मों की तलाश में स्थानीय बाज़ार से एक फफूँद लगा कैंटलूप ख़रबूज़ा मिला, जो फ़्लेमिंग की मूल किस्म से कहीं ज़्यादा पेनिसिलिन बनाता था।
अमेरिकी दवा कंपनियों ने तेज़ी से उत्पादन बढ़ाया। जून 1944 में डी-डे की लैंडिंग तक इतना पेनिसिलिन तैयार हो चुका था कि नॉर्मंडी पर हमले में घायल हुए मित्र राष्ट्रों के सैनिकों का इलाज किया जा सके।
नोबेल पुरस्कार
1945 में अलेक्ज़ेंडर फ़्लेमिंग, हॉवर्ड फ़्लोरी और अर्न्स्ट चेन को पेनिसिलिन की खोज और संक्रमणों के इलाज में उसके इस्तेमाल के लिए संयुक्त रूप से फ़िज़ियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार मिला।
अपने नोबेल व्याख्यान में फ़्लेमिंग ने चेतावनी दी कि अगर पेनिसिलिन का ग़लत इस्तेमाल हुआ, तो बैक्टीरिया उसके प्रति प्रतिरोधी बन सकते हैं। वे सही थे। एंटीबायोटिक प्रतिरोध आज चिकित्सा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
अनुमान है कि पेनिसिलिन और उसके बाद आई एंटीबायोटिक दवाओं ने दसियों करोड़ लोगों की जान बचाई है।
और पढ़ना चाहते हैं?
एरिक लैक्स की किताब The Mold in Dr. Florey's Coat ऑक्सफ़र्ड की उस टीम की पूरी कहानी बताती है, जिसका काम फ़्लेमिंग की खोज जितना मशहूर तो नहीं है, पर उतना ही अहम था। नोबेल पुरस्कार की वेबसाइट पर तीनों विजेताओं की जीवनियाँ और उनके नोबेल व्याख्यान मुफ़्त में उपलब्ध हैं।