मर्तबानों में दबे नाम
जर्मन क़ब्ज़े वाले वारसॉ में समाज-सेविका इरेना सेंडलर ने यहूदी बच्चों को चोरी-छिपे घेटो से बाहर निकालने में मदद की, और उनके असली नाम मर्तबानों में रखकर ज़मीन में गाड़ दिए, ताकि एक दिन उन्हें ढूँढ़ा जा सके।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- True story
- 1940s
ध्यान दें: इस कहानी में होलोकॉस्ट का ज़िक्र है, जिसमें माता-पिता की हत्या और बच्चों पर हुए अत्याचार शामिल हैं।
इरेना सेंडलर पोलैंड की राजधानी वारसॉ में एक समाज-सेविका थीं। वे छोटे क़द की थीं, धुन की पक्की थीं, और बचपन में उनके पिता ने, जो एक डॉक्टर थे, उन्हें सिखाया था कि अगर तुम किसी को डूबते देखो, तो उसे बचाने की कोशिश ज़रूर करो, चाहे तुम्हें तैरना आता हो या नहीं।
सितंबर 1939 में नाज़ी जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। एक साल बाद, क़ब्ज़ा जमाए बैठे जर्मन अधिकारियों ने वारसॉ की यहूदी आबादी को शहर के एक छोटे-से इलाक़े में ठूँस दिया, जिसके चारों ओर दीवार खड़ी कर दी गई थी: वारसॉ घेटो।
दीवार के पीछे
घेटो में 400,000 से ज़्यादा लोगों को ठूँस दिया गया था। खाना लगभग था ही नहीं, और दवाइयाँ भी नहीं थीं। भीड़ से भरी गलियों में टाइफ़स फैल गया। हर महीने हज़ारों लोग भूख और बीमारी से मर रहे थे।
इरेना शहर के समाज-कल्याण विभाग में काम करती थीं। छूत की बीमारियों पर क़ाबू रखने वाले कर्मचारियों के लिए बने एक पास के सहारे वे घेटो के अंदर जा पाती थीं। वे वहाँ खाना, दवाइयाँ और कपड़े ले जाती थीं। दीवारों के भीतर वे डेविड के सितारे वाली एक पट्टी भी बाँह पर पहनती थीं, ताकि वहाँ क़ैद लोगों के साथ अपनी एकजुटता जता सकें।
वहाँ उन्होंने जो देखा, उससे उन्हें यक़ीन हो गया कि अंदर के लोगों को सिर्फ़ भूखा नहीं मारा जा रहा था। उन्हें मार डाला जाने वाला था।
1942 की गर्मियों में जर्मनों ने घेटो के निवासियों को बड़ी तादाद में ट्रेब्लिंका के मृत्यु-शिविर भेजना शुरू कर दिया। अगले कुछ हफ़्तों में लाखों लोगों को मौत के मुँह में भेज दिया गया।
बच्चों को बाहर निकालना
इरेना ज़ेगोटा से जुड़ गईं। यह यहूदियों की मदद के लिए बनी परिषद थी, पोलिश प्रतिरोध का एक भूमिगत संगठन। वे उसके बाल-विभाग की प्रमुख बनीं।
भरोसेमंद साथियों के एक जाल के साथ, जिनमें ज़्यादातर महिलाएँ थीं, उन्होंने यहूदी बच्चों को चोरी-छिपे घेटो से बाहर निकालने में मदद की। उनके जीवनीकार जो तरीक़े बताते हैं, वे लगभग अविश्वसनीय लगते हैं। नन्हे शिशुओं को डिब्बों, बोरियों या औज़ारों के बक्सों में छिपाकर बाहर ले जाया जाता। बड़े बच्चों को सीवर के रास्ते निकाला जाता, या ऐसी इमारतों से, जिनके दरवाज़े घेटो की दीवार के दोनों तरफ़ खुलते थे, जैसे पुरानी कचहरी। कुछ बच्चों को एंबुलेंस में स्ट्रेचर के नीचे छिपाया जाता। कहा जाता है कि एक ड्राइवर अपने साथ एक कुत्ता रखता था, जिसे जर्मन पहरेदारों पर भौंकने के लिए सिखाया गया था, ताकि रोते हुए बच्चों की आवाज़ दब जाए।
बाद में इरेना ने बताया कि सबसे कठिन काम था माँ-बाप को अपने बच्चे सौंपने के लिए राज़ी करना। वे उनसे कोई वादा नहीं कर सकती थीं। माँ-बाप को चुनना पड़ता था कि वे अपने बच्चे को अपने पास रखें या उसे किसी अजनबी के हाथों सौंप दें, बस इस उम्मीद के सहारे कि वह ज़िंदा रहेगा।
नए नाम
बाहर पहुँचने के बाद बच्चों को झूठे पोलिश नाम और झूठे काग़ज़ दिए जाते। उन्हें पोलिश परिवारों, कॉन्वेंटों या अनाथालयों में रखा जाता, जहाँ उन्हें ईसाई प्रार्थनाएँ सीखनी पड़तीं और अपनी असली पहचान छिपाकर रखनी पड़ती। एक छोटी-सी चूक का मतलब हो सकता था बच्चे की मौत, और उन सबकी भी जो उसे छिपा रहे थे। क़ब्ज़े वाले पोलैंड में यहूदियों की मदद करने की सज़ा मौत थी।
इरेना जानती थीं कि अगर ये बच्चे बच गए, तो एक दिन उन्हें यह जानने की ज़रूरत पड़ेगी कि वे असल में कौन हैं। इसलिए उन्होंने एक रिकॉर्ड रखा। काग़ज़ की पतली पर्चियों पर, कूट भाषा में, उन्होंने हर बच्चे का असली नाम और उसकी नई पहचान लिखी। उन्होंने ये सूचियाँ काँच के मर्तबानों में रखीं और उन्हें एक सहेली के बगीचे में सेब के एक पेड़ के नीचे गाड़ दिया।
गिरफ़्तारी
अक्टूबर 1943 में गेस्टापो ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। उन्हें क़ैद में रखा गया और उनसे पूछताछ की गई, और बाद में उन्होंने ख़ुद जो बताया, उसके मुताबिक़ उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा गया कि उनकी टाँगें और पैर टूट गए। उन्होंने अपने साथियों या बच्चों के नाम बताने से इनकार कर दिया।
उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। लेकिन फाँसी की जगह ले जाते समय एक पहरेदार ने, जिसे ज़ेगोटा ने रिश्वत दी थी, उन्हें भाग जाने दिया। मारे गए लोगों की सूचियों में उनका नाम छपा। बाक़ी युद्ध उन्होंने एक झूठे नाम से छिपकर बिताया, और अपना काम जारी रखा।
युद्ध के बाद
युद्ध ख़त्म होने पर इरेना ने वे मर्तबान खोदकर निकाले। उन्होंने और उनके साथियों ने बच्चों को उनके परिवारों से मिलाने की कोशिश की। दुख की बात यह थी कि लगभग सभी माँ-बाप की हत्या हो चुकी थी। बहुत-से बच्चों को यहूदी अनाथालयों में ले जाया गया, और कुछ बाद में इज़राइल जाकर बस गए।
इरेना सेंडलर के जाल ने जितने बच्चों को बचाया, उनकी संख्या ज़्यादातर क़रीब 2,500 बताई जाती है। इतिहासकार कहते हैं कि सही संख्या पक्के तौर पर नहीं पता, और यह भी कि इरेना हमेशा ज़ोर देकर कहती थीं कि यह बहुत-से लोगों का काम था।
फिर से खोज
युद्ध के बाद पोलैंड की कम्युनिस्ट सरकार के दौर में उनके युद्धकालीन काम को ज़्यादातर कोई पहचान नहीं मिली। 1965 में इज़राइल के याद वाशेम ने उन्हें "राइचस अमंग द नेशंस" में शामिल करके सम्मानित किया। यह उपाधि उन ग़ैर-यहूदियों को दी जाती है जिन्होंने होलोकॉस्ट के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर यहूदियों को बचाया।
उनकी कहानी बड़े पैमाने पर लोगों तक 1999 में ही पहुँची, जब अमेरिका के कैनसस में स्कूली लड़कियों के एक समूह को इतिहास के एक प्रोजेक्ट पर काम करते हुए उनका एक छोटा-सा ज़िक्र मिला। उन्होंने उन पर Life in a Jar (मर्तबान में ज़िंदगी) नाम का एक नाटक लिखा, और उसे सैकड़ों बार मंच पर खेला। वे उनसे मिलने वारसॉ तक भी गईं।
इरेना सेंडलर का 2008 में 98 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें हीरो कहलाना पसंद नहीं था। वे कहती थीं कि उन्हें अफ़सोस है कि वे और ज़्यादा नहीं कर पाईं।
और पढ़ना चाहते हैं?
अन्ना मिएश्कोव्स्का की लिखी जीवनी ख़ुद इरेना सेंडलर से हुई लंबी बातचीत पर आधारित है। टिलर जे. मैज़ियो की Irena's Children आम पाठकों के लिए यह कहानी सुनाती है। याद वाशेम के "राइचस अमंग द नेशंस" के ऑनलाइन डेटाबेस में उनका और उनके कई साथियों का नाम दर्ज है।