हार
मातिल्ड एक जगमगाती रात के जलसे के लिए हीरों का एक हार उधार लेती है। जब वह खो जाता है, तो वह और उसका पति अपनी ज़िंदगी के दस साल देकर उसकी क़ीमत चुकाते हैं।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Classic retold
- 1880s
मातिल्ड लुआज़ेल सुंदर और मनमोहक थी, और उसे लगता था कि वह ठाठ-बाट की ज़िंदगी के लिए पैदा हुई है। लेकिन क़िस्मत की किसी भूल से उसका जन्म क्लर्कों के एक परिवार में हो गया था।
उसकी शादी एक शांत, भले आदमी से हुई, जो शिक्षा मंत्रालय में एक छोटा क्लर्क था। वे एक छोटे-से फ़्लैट में रहते थे, जिसकी दीवारें घिसी हुई थीं, कुर्सियाँ फटी-पुरानी थीं और पर्दे भद्दे थे। इस सब की सादगी मातिल्ड को हर दिन चुभती थी। वह सपने देखती रेशम से सजे ख़ामोश दालानों के, चाँदी के बर्तनों में परोसी जाने वाली शानदार दावतों के, ऐसे रईस मेहमानों के जो उसकी तारीफ़ करें।
उसके पास न अच्छे कपड़े थे, न गहने, कुछ भी नहीं। और उसे प्यार बस इन्हीं चीज़ों से था।
न्योता
एक शाम उसका पति बहुत ख़ुश होकर घर आया और उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया।
शिक्षा मंत्री और मदाम राम्पोनो, मंत्रालय में होने वाले सांध्य समारोह में मॉस्यू और मदाम लुआज़ेल की उपस्थिति का सम्मान चाहते हैं।
ख़ुश होने के बजाय मातिल्ड ने न्योता मेज़ पर फेंक दिया और फूट-फूटकर रोने लगी।
"मैं पहनूँगी क्या?" उसने कहा। "मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। यह न्योता अपने किसी साथी को दे दो, जिसकी बीवी के पास मुझसे अच्छे कपड़े हों।"
उसका पति दुखी हो गया। वह चार सौ फ़्रैंक जोड़ रहा था, ताकि गर्मियों में दोस्तों के साथ शिकार पर जाने के लिए एक बंदूक़ ख़रीद सके। उसने चुपचाप वह पैसा उसे ड्रेस के लिए दे दिया।
ड्रेस ख़रीद ली गई। लेकिन जैसे-जैसे जलसे का दिन पास आया, मातिल्ड फिर उदास रहने लगी।
"मेरे पास पहनने को एक भी गहना नहीं है," उसने कहा। "मैं एकदम कंगाल लगूँगी।"
"अपनी सहेली मदाम फ़ोरेस्तिए से मिल आओ," उसके पति ने कहा। "उनसे कुछ गहने उधार माँग लो।"
जलसा
मदाम फ़ोरेस्तिए, स्कूल के दिनों की एक अमीर सहेली, ने बिना हिचकिचाए अपना गहनों का डिब्बा खोल दिया। मातिल्ड ने कंगन पहनकर देखे, मोतियों का एक हार, नगों से जड़ा सोने का एक क्रॉस। फिर काले साटन की एक डिबिया में उसे हीरों का एक शानदार हार मिला। चाहत से उसका दिल धड़क उठा।
"क्या तुम मुझे यह दे सकती हो? बस यही?"
"हाँ-हाँ, क्यों नहीं।"
जलसे की रात मातिल्ड छा गई। वह वहाँ सबसे सुंदर औरत थी, सजी-धजी, मुस्कुराती हुई और ख़ुशी से बेसुध। सारे मर्द उसे देखते रहे और उसका नाम पूछते रहे। ख़ुद मंत्री की नज़र भी उस पर पड़ी। वह सुबह चार बजे तक ख़ुशी के बादलों में तैरती हुई नाचती रही, जबकि उसका पति तीन और पतियों के साथ एक छोटे-से बग़ल वाले कमरे में ऊँघता रहा।
जब वे निकले, तो पति ने उसे वही मामूली, रोज़ वाली शॉल ओढ़ा दी जो वह साथ लाई थी। दूसरी औरतों के फ़र के सामने उस पर शर्मिंदा होकर वह जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ उतर गई। ठंड में काफ़ी दूर पैदल चलने के बाद उन्हें एक बग्घी मिली, और वे उदास मन से घर पहुँचे।
आईने के सामने उसने शॉल उतारी, ताकि आख़िरी बार ख़ुद को पूरी शान में देख सके।
हार ग़ायब था।
तलाश
उन्होंने उसकी ड्रेस की तहों में ढूँढ़ा, शॉल की तहों में, जेबों में, हर जगह। उसका पति उस पूरे रास्ते पर वापस पैदल गया जिससे वे आए थे। वह पुलिस के पास गया, बग्घी वाली कंपनियों के पास, अख़बारों के दफ़्तरों में इनाम का ऐलान करवाने। कुछ नहीं मिला।
"हमें तुम्हारी सहेली को लिखना होगा," आख़िरकार उसने कहा, "कि तुमसे हार का हुक टूट गया है और तुम उसकी मरम्मत करवा रही हो। इससे हमें वक़्त मिल जाएगा।"
एक हफ़्ते बाद उनकी सारी उम्मीद टूट चुकी थी।
पाले रॉयाल की एक जौहरी की दुकान में उन्हें हीरों का एक हार मिला, जो बिल्कुल खोए हुए हार जैसा दिखता था। उसकी क़ीमत चालीस हज़ार फ़्रैंक थी। उन्हें वह छत्तीस हज़ार में मिल सकता था।
मॉस्यू लुआज़ेल के पास अठारह हज़ार फ़्रैंक थे, जो उनके पिता छोड़ गए थे। बाक़ी उन्होंने उधार लिया: किसी से एक हज़ार फ़्रैंक, किसी से पाँच सौ। उन्होंने रुक्कों पर दस्तख़त किए, सूदख़ोरों से ऐसे वादे किए जो उन्हें बर्बाद कर देते, और अपने दस्तख़त दाँव पर लगा दिए, बिना यह जाने कि कभी उनकी लाज रख भी पाएँगे या नहीं।
उन्होंने हार ख़रीद लिया। मातिल्ड उसे लौटाने मदाम फ़ोरेस्तिए के पास ले गई, जिन्होंने थोड़ी रूखाई से कहा, "तुम्हें इसे पहले लौटा देना चाहिए था। मुझे इसकी ज़रूरत पड़ सकती थी।" उन्होंने डिबिया खोलकर नहीं देखी।
दस साल
फिर मातिल्ड ने जाना कि ग़रीबी असल में क्या होती है।
उन्होंने अपनी नौकरानी को हटा दिया और एक छोटी-सी अटारी वाले कमरे में रहने चले गए। घर का भारी काम वह ख़ुद करती, चिकने बर्तन रगड़ती, मैले कपड़े-चादरें धोती, सीढ़ियों से पानी ऊपर ढोती और हर मोड़ पर रुककर साँस लेती। बाज़ार में वह एक-एक सिक्का गिनकर मोल-भाव करती। उसका पति शाम को काम करता, कुछ पैसे प्रति पन्ने के हिसाब से दस्तावेज़ों की नक़ल करता।
यह ज़िंदगी दस साल चली। दस साल के आख़िर में उन्होंने ब्याज समेत एक-एक फ़्रैंक चुका दिया था।
अब मातिल्ड बूढ़ी दिखने लगी थी। उसके हाथ लाल और खुरदुरे हो गए थे, बाल बिखरे रहते थे, आवाज़ ऊँची हो गई थी। कभी-कभी, जब उसका पति दफ़्तर गया होता, वह खिड़की के पास बैठकर बहुत पहले की उस शाम के बारे में सोचती, उस जलसे के बारे में, जहाँ वह इतनी सुंदर लगी थी।
सच
एक रविवार, शाँज़-एलिज़े पर टहलते हुए उसने एक बच्चे के साथ एक औरत को देखा। वह मदाम फ़ोरेस्तिए थीं, अब भी जवान, अब भी सुंदर।
मातिल्ड का मन भर आया। अब जब क़र्ज़ चुक गया था, वह उन्हें सब कुछ बता देगी।
"नमस्ते, ज़ान।"
उसकी सहेली ने उसे नहीं पहचाना। "लेकिन... मदाम... मुझे नहीं लगता..."
"नहीं। मैं मातिल्ड लुआज़ेल हूँ।"
"अरे, मेरी बेचारी मातिल्ड! तुम कितनी बदल गई हो!"
"हाँ, तुमसे पिछली बार मिलने के बाद मैंने बड़े कठिन दिन देखे हैं। और ढेर सारी मुसीबतें झेली हैं, और सब तुम्हारी वजह से।" और उसने उन्हें खोए हुए हार के बारे में बताया, नए हार के बारे में, दस साल की मेहनत के बारे में।
"तुमने मेरे हार की जगह हीरों का हार ख़रीदा था?"
"हाँ। तुम्हें पता नहीं चला? दोनों बहुत मिलते-जुलते थे।" और वह गर्व भरी, भोली ख़ुशी से मुस्कुराई।
मदाम फ़ोरेस्तिए ने गहरे भाव से भरकर उसके दोनों हाथ थाम लिए।
"ओह, मेरी बेचारी मातिल्ड। लेकिन मेरे वाले तो नक़ली थे। उनकी क़ीमत ज़्यादा से ज़्यादा पाँच सौ फ़्रैंक थी!"
इस कहानी के बारे में
गी द मोपासाँ (1850–1893) फ़्रांसीसी कहानी के उस्ताद थे, और "ला पारूर" शायद उनकी सबसे मशहूर कहानी है। इसकी आख़िरी पंक्ति साहित्य के सबसे जाने-माने अनपेक्षित मोड़ों में से एक है। यह उस कहानी का पुनर्कथन है; मूल कहानी पब्लिक डोमेन में है।