रामेश्वरम का अख़बार वाला लड़का
ए.पी.जे. अब्दुल कलाम बचपन में दक्षिण भारत के एक छोटे-से द्वीप-नगर में अख़बार बाँटते थे। बड़े होकर उन्होंने भारत के अंतरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रमों की अगुवाई की, और देश के सबसे प्यारे राष्ट्रपति बने।
- 3 मिनट का पाठ
- Ages 9+
- Biography
- 1930s–2010s
अवुल पकीर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को दक्षिण भारत में तमिलनाडु के तट के पास एक द्वीप पर बसे छोटे-से मंदिरों के नगर रामेश्वरम में हुआ था।
उनका परिवार अमीर नहीं था। उनके पिता जैनुलाब्दीन नावों के मालिक थे और बहुत धार्मिक इंसान थे, जिनकी समझदारी के लिए नगर में उनकी इज़्ज़त थी। उनकी माँ आशियम्मा अपने परिवार के अलावा और भी बहुत-से लोगों को अपने दस्तरख़्वान पर खाना खिलाती थीं। उनका घर विशाल रामनाथस्वामी मंदिर के पास की एक गली में था, और नन्हे कलाम ऐसे हिंदू और मुसलमान पड़ोसियों के बीच बड़े हुए जो आपस में गहरे दोस्त थे।
अख़बार वाला लड़का
जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ, तो हालात और कठिन हो गए। कलाम, जो तब भी बच्चे ही थे, अपने चचेरे भाई के साथ काम करके परिवार की मदद करने लगे, जो अख़बार बाँटने का काम करते थे। हर सुबह जब अख़बारों के बंडल ट्रेन से आते, तो कलाम उन्हें उठाते और पूरे नगर में घर-घर पहुँचाते।
बाद में उन्होंने लिखा कि अपने परिवार की मदद के लिए पैसे कमाकर उन्होंने पहली बार गर्व महसूस किया था।
वे मेहनती छात्र थे, हालाँकि कक्षा के सितारे नहीं थे। उनके स्कूल के एक शिक्षक, शिवसुब्रमणिया अय्यर, ने यह समझाकर कि पक्षी कैसे उड़ते हैं, उन पर गहरी छाप छोड़ी। वे अपनी कक्षा को पक्षियों को देखने के लिए समुद्र के किनारे ले गए थे। कलाम ने बाद में कहा कि यही वह पल था जब उन्होंने तय किया कि वे उड़ान के बारे में पढ़ाई करना चाहते हैं।
उड़ने का सपना
स्कूल के बाद कलाम ने तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ़ कॉलेज से भौतिकी पढ़ी। फिर उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उनकी फ़ीस भरने में मदद के लिए उनकी बहन ने अपने सोने के गहने गिरवी रख दिए थे।
उनका सबसे बड़ा सपना लड़ाकू विमान का पायलट बनना था। वे भारतीय वायुसेना के चयन के लिए देहरादून गए। आठ जगहें ख़ाली थीं। वे नौवें नंबर पर आए।
उनका दिल टूट गया। अपनी आत्मकथा में वे बताते हैं कि इसके बाद वे पास ही ऋषिकेश गए, जहाँ आध्यात्मिक गुरु स्वामी शिवानंद से हुई एक मुलाक़ात ने उन्हें इस निराशा को स्वीकार करने और एक अलग राह तलाशने में मदद की।
रॉकेट
कलाम एक वैज्ञानिक के रूप में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से जुड़े, और 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो, में आ गए। वहाँ उन्हें भारत के पहले उपग्रह प्रक्षेपण यान, एसएलवी-3, का परियोजना निदेशक बनाया गया।
अगस्त 1979 में एसएलवी-3 रॉकेट का पहला प्रक्षेपण नाकाम रहा। उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद रॉकेट बंगाल की खाड़ी में जा गिरा।
बाद में कलाम ने एक क़िस्सा सुनाया जो बहुत मशहूर हुआ। नाकामी के बाद इसरो के प्रमुख, प्रोफ़ेसर सतीश धवन, ख़ुद प्रेस कॉन्फ़्रेंस में गए और जो कुछ ग़लत हुआ था, उसकी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली। एक साल बाद, जुलाई 1980 में, एसएलवी-3 ने रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में पहुँचा दिया, और भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया जो अपने उपग्रह ख़ुद प्रक्षेपित कर सकते थे। इस बार प्रोफ़ेसर धवन ने प्रेस का सामना करने और श्रेय लेने के लिए कलाम को भेजा।
कलाम ने कहा कि नेतृत्व के बारे में उन्होंने जो सबसे अहम सबक़ सीखा, वह यही था।
मिसाइल मैन
1980 के दशक में कलाम रक्षा अनुसंधान में लौट आए और उन्होंने भारत की अपनी गाइडेड मिसाइलें बनाने के कार्यक्रम की अगुवाई की, जिनमें अग्नि और पृथ्वी भी शामिल थीं। पूरे देश में वे "भारत के मिसाइल मैन" के नाम से जाने जाने लगे। 1998 में पोखरण में हुए भारत के परमाणु परीक्षणों में भी उनकी केंद्रीय भूमिका रही।
उन्होंने कभी शादी नहीं की। वे सादगी से रहते थे, कविताएँ लिखते थे, तारों वाला वाद्य वीणा बजाते थे, और बच्चों और छात्रों से अपने लगाव के लिए मशहूर थे।
1997 में उन्हें भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान, भारत रत्न, मिला।
जनता के राष्ट्रपति
2002 में डॉ. कलाम भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति चुने गए। वे 2007 तक इस पद पर रहे।
उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाज़े आम लोगों के लिए, ख़ासकर बच्चों के लिए, खोल दिए। उन्होंने नौजवानों की हज़ारों चिट्ठियों और ईमेल के जवाब दिए। वे देश भर में घूम-घूमकर स्कूलों और कॉलेजों में बोलते, और छात्रों से बड़े सपने देखने और कड़ी मेहनत करने को कहते। लोग उन्हें "जनता का राष्ट्रपति" कहने लगे।
कार्यकाल ख़त्म होने के बाद वे फिर से पढ़ाने लगे, और भारत और विदेशों के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते रहे।
आख़िरी व्याख्यान
27 जुलाई 2015 को डॉ. कलाम पूर्वोत्तर भारत में शिलॉन्ग के भारतीय प्रबंध संस्थान में छात्रों को व्याख्यान दे रहे थे। बोलना शुरू किए कुछ ही मिनट हुए थे कि वे गिर पड़े। थोड़ी ही देर बाद, तिरासी साल की उम्र में, उनका निधन हो गया।
उन्होंने वही करते हुए दुनिया छोड़ी जो उन्हें सबसे ज़्यादा प्यारा था: नौजवानों को पढ़ाना।
उनके गृह राज्य तमिलनाडु में उनका जन्मदिन, 15 अक्टूबर, युवा पुनर्जागरण दिवस के रूप में मनाया जाता है, और उनकी किताबें, ख़ासकर Wings of Fire (अग्नि की उड़ान), लाखों भारतीय नौजवानों ने पढ़ी हैं।
और पढ़ना चाहते हैं?
अरुण तिवारी के साथ लिखी गई Wings of Fire डॉ. कलाम की 1992 तक की जीवन-कहानी उन्हीं के गर्मजोशी भरे, सरल शब्दों में बताती है। My Journey उनके बचपन और करियर की यादों का एक छोटा संग्रह है, जो ख़ास तौर पर युवा पाठकों के लिए लिखा गया है।