जिस रात दीवार खुली
28 साल तक एक दीवार ने बर्लिन को बाँटे रखा। 9 नवंबर 1989 को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दिए गए एक उलझे हुए जवाब ने हज़ारों लोगों को सरहद की ओर भेज दिया, और रातोंरात इतिहास बदल गया।
- 4 मिनट का पाठ
- Ages 12+
- Historical narrative
- 1980s
ध्यान दें: इस कहानी में सीमा पार करने की कोशिश में मारे गए लोगों का ज़िक्र है।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी बँट गया। पश्चिमी हिस्सा संघीय गणराज्य जर्मनी बना, एक लोकतंत्र, जो अमेरिका और पश्चिमी यूरोप का साथी था। पूर्वी हिस्सा जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, यानी जीडीआर, बना, एक कम्युनिस्ट देश, जिस पर सोवियत संघ का नियंत्रण था।
बर्लिन शहर पूर्वी जर्मनी के काफ़ी भीतर था। लेकिन वह भी बँटा हुआ था। पश्चिमी बर्लिन पश्चिम का एक टापू था, जो चारों तरफ़ से पूरब से घिरा हुआ था।
दीवार खड़ी होती है
1950 के दशक में लाखों पूर्वी जर्मन पश्चिम चले गए, और उनमें से बहुत-से बस पूर्वी बर्लिन से पश्चिमी बर्लिन में पैदल पार करके। पूर्वी जर्मनी की सरकार अपने डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और हुनरमंद कामगार खोती जा रही थी।
13 अगस्त 1961 की रात पूर्वी जर्मनी के सैनिकों और मज़दूरों ने बर्लिन में सरहद बंद कर दी। उन्होंने सड़कों के आर-पार, पार्कों के बीच से और नहरों के किनारे-किनारे कँटीले तार बिछा दिए। अगले दिनों और बरसों में यह कंक्रीट की एक दीवार बन गई, लगभग 155 किलोमीटर लंबी, जिसने पश्चिमी बर्लिन को चारों ओर से घेर लिया।
रातोंरात परिवार बिछड़ गए। दोस्त अब एक-दूसरे से मिलने नहीं जा सकते थे। जो लोग किसी सड़क के एक तरफ़ रहते थे, वे दूसरी तरफ़ नहीं जा सकते थे।
मौत की पट्टी
बरसों में दीवार और मज़बूत होती गई। पूर्वी तरफ़ एक दूसरी दीवार बनाई गई, और दोनों के बीच रेत की एक चौड़ी, सूनी पट्टी थी, जिस पर रात को रोशनी रहती थी, और जहाँ निगरानी-मीनारें, पहरे के कुत्ते, अलार्म और हथियारबंद पहरेदार थे, जिन्हें गोली चलाने का हुक्म था। लोग उसे "मौत की पट्टी" कहते थे।
फिर भी लोग भागने की कोशिश करते रहे। उन्होंने सुरंगें खोदीं, कारों में छिपे, घर में बने गुब्बारों से उड़े, तैरकर नदियाँ पार कीं। हज़ारों कामयाब हुए। कम से कम 140 लोगों के बारे में पता है कि वे बर्लिन की दीवार पर मारे गए, या उससे जुड़ी घटनाओं में उनकी जान गई।
अट्ठाईस साल तक यह दीवार यूरोप के बँटवारे का, और पूरब और पश्चिम के बीच शीत युद्ध का, सबसे मशहूर प्रतीक बनी रही।
1989
1989 में पूरे पूर्वी यूरोप में चीज़ें बदलने लगीं। सोवियत संघ में नेता मिख़ाइल गोर्बाचोव सुधार ला रहे थे और उन्होंने साफ़ कर दिया था कि कम्युनिस्ट सरकारों को सत्ता में बनाए रखने के लिए अब सोवियत टैंक नहीं भेजे जाएँगे। पोलैंड और हंगरी में कम्युनिस्ट पार्टियाँ सत्ता में दूसरों को साझेदार बनाने लगीं और सरहदें खोलने लगीं।
हज़ारों पूर्वी जर्मन हंगरी के रास्ते ऑस्ट्रिया भागने लगे। कुछ और लोग प्राग में पश्चिमी जर्मनी के दूतावास में भीड़ लगाकर जमा हो गए।
देश के भीतर, पूर्वी जर्मनी के शहरों में लोग विरोध करने लगे। लाइपज़िग में हर सोमवार की शाम सेंट निकोलस चर्च में प्रार्थना के बाद भीड़ जुटती और हाथों में मोमबत्तियाँ लिए शांति से सड़कों पर मार्च करती। शुरुआत में कुछ हज़ार लोग थे। अक्टूबर तक दसियों हज़ार हो गए, फिर लाखों। उनका नारा सीधा-सा था: Wir sind das Volk, "हम ही जनता हैं।"
हालात पर से पकड़ खोती सरकार ने यात्रा के नियम ढीले करने का फ़ैसला किया, इस उम्मीद में कि माहौल शांत हो जाएगा।
प्रेस कॉन्फ़्रेंस
9 नवंबर 1989 की शाम पूर्वी जर्मनी के एक अधिकारी, गुंटर शाबोव्स्की, ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की, जिसका टेलीविज़न पर सीधा प्रसारण हो रहा था। आख़िर में उन्होंने एक पर्ची पढ़कर सुनाई, जो उन्हें थोड़ी ही देर पहले थमाई गई थी। उसमें लिखा था कि पूर्वी जर्मनों को विदेश यात्रा के लिए अर्ज़ी देने की इजाज़त होगी, पश्चिमी बर्लिन में जाने वाली चौकियों के रास्ते भी।
उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। नए नियम अगले दिन से लागू होने थे, और उनके तहत वीज़ा के लिए बाक़ायदा अर्ज़ी देनी होती।
एक पत्रकार ने पूछा कि नए नियम कब से लागू होंगे।
शाबोव्स्की ने अपने काग़ज़ उलटे-पलटे, उलझे हुए दिखे, और बोले कि जहाँ तक उन्हें पता है, ये तुरंत, बिना देर किए लागू हैं: "sofort, unverzüglich."
सरहद की ओर
पश्चिमी जर्मनी के टेलीविज़न ने, जिसे ज़्यादातर पूर्वी जर्मन देखते थे, ख़बर दी कि दीवार खुल गई है।
कुछ ही घंटों में पूर्वी बर्लिन के हज़ारों लोग सरहद की चौकियों पर जमा हो गए और माँग करने लगे कि उन्हें जाने दिया जाए। सरहद के पहरेदारों को कोई आदेश नहीं मिला था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें।
बॉर्नहोल्मर श्ट्रासे की चौकी पर भीड़ बढ़ती गई और शोर भी। उस रात वहाँ के प्रभारी अधिकारी, हाराल्ड येगर, किसी ऐसे बड़े अधिकारी से संपर्क नहीं कर पाए जो फ़ैसला ले सके। एक विशाल, शांत भीड़ और किसी बड़े हादसे के ख़तरे के सामने, उस रात लगभग 11:30 बजे, उन्होंने फाटक खोलने का आदेश दे दिया।
लोग उमड़ पड़े। पूरे शहर में दूसरी चौकियाँ भी खुल गईं।
जश्न
उस रात बर्लिन ने ऐसा जश्न मनाया जैसा पहले कभी नहीं मनाया था। अजनबी एक-दूसरे को गले लगाकर रोए। पश्चिमी बर्लिन के लोगों ने पूर्वी बर्लिन वालों का फूलों और स्पार्कलिंग वाइन की बोतलों से स्वागत किया। लोग ब्रांडेनबर्ग गेट पर दीवार के ऊपर चढ़ गए और उस पर नाचे। कुछ लोग हथौड़ों और छेनियों से कंक्रीट के टुकड़े तोड़ने लगे।
एक भी गोली नहीं चली।
उसके बाद
एक साल के भीतर, 3 अक्टूबर 1990 को, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी फिर से एक देश बन गए। अगले दो सालों में पूरे पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारें गिर गईं, और 1991 में ख़ुद सोवियत संघ टूट गया।
बर्लिन की दीवार लगभग पूरी ढहा दी गई। आज शहर की सड़कों से होकर पत्थरों की एक दोहरी क़तार गुज़रती है, जो बताती है कि दीवार कभी कहाँ खड़ी थी, और बर्नाउअर श्ट्रासे पर उसका एक छोटा-सा हिस्सा स्मारक के रूप में सँभालकर रखा गया है।
और पढ़ना चाहते हैं?
मैरी एलीस सरॉटी की किताब The Collapse 9 नवंबर 1989 की कहानी घंटे-दर-घंटे बताती है, और दिखाती है कि इसमें से कितना कुछ संयोग से हुआ। बर्लिन वॉल मेमोरियल की वेबसाइट पर मुफ़्त प्रदर्शनियाँ हैं, और उन लोगों की कहानियाँ भी, जो पार जाने की कोशिश में मारे गए।