डोरी का टुकड़ा
नॉरमंडी के एक छोटे क़स्बे में बाज़ार के दिन, एक किफ़ायती बूढ़ा किसान सड़क से डोरी का एक टुकड़ा उठाने को झुकता है। उसका एक पुराना दुश्मन उसे ऐसा करते देख लेता है। शाम तक पूरा क़स्बा तय कर चुका होता है कि वह चोर है। अफ़वाह की ताक़त पर मोपासाँ की कहानी।
- 4 मिनट की कहानी
- Ages 12+
- Classic retold
- 1880s
ध्यान दें: यह कहानी शक के बोझ से टूट चुके एक आदमी की मृत्यु पर ख़त्म होती है।
गोदरविल में बाज़ार का दिन था, और आसपास के इलाक़े के किसान हर रास्ते से क़स्बे की ओर चले आ रहे थे।
आदमी धीरे-धीरे चलते, हर क़दम पर आगे को झुके हुए, उनके शरीर बरसों की जुताई और कटाई से झुक चुके थे। उनकी पत्नियाँ मुर्ग़ियों और बत्तख़ों की टोकरियाँ लिए पीछे चलतीं। चौक शोर से भरा था: मवेशियों का रँभाना, मोल-भाव की चीख़-पुकार, गोबर, पसीने और सूखी घास की गंध।
डोरी का टुकड़ा
भीड़ में मेत्र ओशकोर्न भी था, ब्रेओते गाँव का एक किसान। वह एक किफ़ायती आदमी था, एक सच्चा नॉरमन, जो मानता था कि काम की हर चीज़ उठा लेनी चाहिए।
चौक में आते हुए उसकी नज़र ज़मीन पर पड़े डोरी के एक छोटे-से टुकड़े पर पड़ी। वह गठिया की वजह से कुछ मुश्किल से झुका, और उसे उठा लिया। वह उसे सलीक़े से लपेटने लगा।
तभी उसने देखा कि अपने दरवाज़े पर मेत्र मालांदाँ खड़ा है, ज़ीन-लगाम बनाने वाला। दोनों आदमियों का एक बार एक लगाम को लेकर झगड़ा हुआ था, और तब से वे एक-दूसरे को नापसंद करते थे।
ओशकोर्न को थोड़ी शर्म आई कि उसके दुश्मन ने उसे कीचड़ से कूड़ा उठाते देख लिया। उसने जल्दी से डोरी जेब में ठूँस ली, फिर ऐसे ज़मीन टटोलने लगा मानो उसकी कोई और चीज़ खो गई हो। और वह सिर आगे झुकाए बाज़ार में चला गया।
मुनादी
दोपहर को किसान खाने के लिए सराय में भर गए। बड़े चूल्हे में आग धधक रही थी, और सीख पर मुर्ग़ियों और भेड़ की टाँगों की एक क़तार घूम रही थी।
अचानक बाहर ढोल बजा। वह क़स्बे का मुनादी वाला था। अटकती आवाज़ में उसने ऐलान किया कि आज सुबह गोदरविल की सड़क पर काले चमड़े का एक बटुआ खो गया है। उसमें पाँच सौ फ़्रैंक और कुछ कारोबारी काग़ज़ थे। जिसे भी मिले, उससे गुज़ारिश है कि वह उसे मेयर के दफ़्तर में, या उसके मालिक, मानविल के मेत्र फ़ॉर्च्युने उलब्रेक, को लौटा दे। बीस फ़्रैंक का इनाम मिलेगा।
किसान फिर अपने खाने में लग गए, और बातें करने लगे कि बटुआ मिलने की कितनी उम्मीद है।
उन्होंने अभी कॉफ़ी ख़त्म ही की थी कि दरवाज़े पर एक पुलिस वाला आ खड़ा हुआ।
मेयर के सामने
उसने मेत्र ओशकोर्न को पूछा, और बताया कि मेयर उनसे मिलना चाहते हैं।
मेयर, एक भारी-भरकम और गंभीर आदमी, अपनी मेज़ के पीछे बैठे थे। उन्होंने ओशकोर्न से कहा कि आज सुबह उसे खोया हुआ बटुआ उठाते देखा गया है।
बूढ़ा किसान सन्न रह गया। किसने ऐसी बात कही?
मेत्र मालांदाँ ने, ज़ीन-लगाम बनाने वाले ने। उसने उसे बटुआ उठाते देखा था।
ओशकोर्न तुरंत समझ गया। ग़ुस्से से लाल होकर उसने जेब से डोरी का टुकड़ा निकाला और ऊपर उठाया। उसने कहा कि उसने यही उठाया था। सिर्फ़ यही।
मेयर ने सिर हिलाया। उन्होंने कहा कि मालांदाँ भरोसेमंद आदमी है। वह डोरी के टुकड़े को बटुआ तो नहीं समझ सकता।
मालांदाँ को बुलाया गया और उसने अपनी बात दोहराई। दोनों बूढ़े एक घंटे तक बहस करते रहे। ओशकोर्न ने कहा कि उसकी तलाशी ली जाए, और ली गई। कुछ नहीं मिला।
आख़िरकार मेयर ने उसे जाने दिया, पर चेतावनी दी कि मामले की रिपोर्ट की जाएगी।
क़स्बे की चर्चा
ख़बर पहले ही फैल चुकी थी। जब ओशकोर्न बाहर निकला, तो लोग उसके चारों ओर जमा हो गए, उत्सुक और आधे हँसते हुए। उसने उन्हें डोरी के बारे में सब बताया। किसी ने यक़ीन नहीं किया। वे बस और ज़ोर से हँसे।
पूरी दोपहर, और घर लौटते हुए पूरे रास्ते, वह जो भी मिला उसे अपनी कहानी सुनाता रहा, जेबें उलटकर दिखाता रहा कि उसके पास कुछ नहीं है। लोगों ने कहा कि वह पुराना धूर्त है।
उस रात ग़ुस्से और शर्म से उसे नींद नहीं आई।
बटुआ लौटता है
अगले दिन, लगभग एक बजे, मारियस पोमेल नाम का एक खेतिहर मज़दूर बटुआ लेकर मेयर के दफ़्तर आया। उसे वह सड़क पर मिला था, और चूँकि वह पढ़ नहीं सकता था, वह उसे घर ले जाकर अपने मालिक को दे आया था।
ओशकोर्न की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। आख़िरकार उसका नाम साफ़ हो गया था। वह गाँव-गाँव गया, सबको कहानी का अंत सुनाता हुआ, जीत के गर्व से भरा।
पर कुछ अजीब हुआ। लोग सुनते, सिर हिलाते, और एक जानकार-सी मुस्कान मुस्कुराते।
एक आदमी ने उसे आँख मारी और कहा कि वह सचमुच बड़ा चालाक है। दूसरे ने कहा कि जिन्हें चीज़ें मिलती हैं, वे आमतौर पर इतना हंगामा नहीं करते। धीरे-धीरे ओशकोर्न समझ गया कि वे क्या सोच रहे हैं। उनका मानना था कि बटुआ उसी को मिला था, और पकड़े जाने के बाद उसने किसी दोस्त के हाथों उसे लौटवा दिया।
बूढ़े का अंत
उसने उन्हें यक़ीन दिलाने की और ज़्यादा कोशिश की। वह हर दिन कहानी सुनाता, नई बारीकियाँ, नए तर्क, नए सबूत जोड़ता। पर वह जितनी लंबी और चतुराई से सुनाता, लोग उतना ही कम यक़ीन करते। बाज़ार के मसख़रे बस हँसने के लिए उससे कहानी फिर से सुनाने को कहते।
वह दुबला होता गया। उसने ठीक से काम करना छोड़ दिया। जो बात सबसे ज़्यादा चुभती थी, वह यह थी कि वह नॉरमन था, और चतुर, और दिल ही दिल में जानता था कि वह ऐसी चाल चलने के पूरे क़ाबिल था, और लोग भी यह जानते थे।
दिसंबर के आख़िर में उसने बिस्तर पकड़ लिया। जनवरी की शुरुआत में वह मर गया। अपने आख़िरी बुख़ार में भी वह बड़बड़ाता रहा कि वह तो बस डोरी का एक छोटा-सा टुकड़ा था, और अपना ख़ाली हाथ आगे बढ़ाता रहा, मानो मेयर को दिखा रहा हो।
इस कहानी के बारे में
गी द मोपासाँ (1850–1893) नॉरमंडी में पले-बढ़े थे और उन्होंने वहाँ के तेज़-तर्रार, शक्की किसानों के बारे में बहुत सी कहानियाँ लिखीं। "ला फ़िसेल" पहली बार 1883 में छपी थी। यह संस्करण छोटा और सरल किया गया पुनर्कथन है।